अप्रैल 2015
अंक - 2 | कुल अंक - 56
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कहानी- गढ़ती नज़र
घर के एक कोने में बैठा सुभाष अख़बार पढ़ने में इतना मसरूफ़ था कि उसके पास रखी चाय भी अब पानी बनती जा रही थी। वह कुछ ढूंढ रहा था। बड़ी देर से पाँव के भार बैठे रहने से उसकी आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा, तब जाकर उसने अपने बैठने की मुद्रा को आँखें मलते हुये बदला। लेकिन अभी भी उसकी नज़र ख़ानाबदोश थी। कहीं रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी।
उसकी पत्नी रश्मि पास बैठी थी, सब देख रही थी फिर भी उसने कुछ नहीं कहा। बस वो धूप में बैठी अपनी सिलाई-बुनाई में व्यस्त हो गयी। रश्मि ये सब रोज़ ही देखा करती, उसके लिए ये कोई नई बात नहीं थी। सुभाष भी रोज़ अख़बार पढ़ता और कुछ ढूँढने में व्यस्त रहता।
 
कुछ समय पहले सब ठीक-ठाक था, रश्मि चाय बनाती, सुभाष अखबार पढ़ते हुये उसे पी लिया करता। लेकिन कुछ महीनों से सुभाष का व्यवहार न जाने क्यों बदल रहा था। जब भी वह अख़बार पढ़ता, उसे गुस्सा आ जाता। उसके हाथ में जो कुछ भी आ जाता उसे दीवार पर दे मारता। भूख कम लगती, नींद कम आती। उसके मन में कुछ चल रहा था जो वो किसी से न कहता। परिस्थितियाँ इतनी गंभीर होती जा रही थीं कि अब वह अपने मन का सारा क्रोध और गुब्बार रश्मि पर उतारने लगा था। रश्मि समझदार थी, वह सुभाष की बातों और परिस्थितियों को समझकर बहुत कम बोलती। जिससे घर का माहौल थोड़ा शांत रहता।
 
“रश्मि, रश्मि कहाँ हो तुम, लो यहाँ बैठी हो। क्या हो रहा है? भई कभी हमें भी याद-वाद कर लिया करो”, एक युवती ने घर के आँगन में आते ही सवालों की झड़ी लगा दी। पड़ोस की रूपाली देसाई, रश्मि की एक अच्छी सहेली के साथ एक अच्छी पड़ोसी भी थी। उसका उनके घर में अक्सर आना-जाना हुआ करता था। रूपाली ने एक मीठी-सी मुस्कराहट से रश्मि को गले लगाया। जैसे ही रूपाली ने रश्मि को गले लगाया रश्मि की आँखें छलक गयी। रूपाली के कांधे ने रश्मि की आँखों की नमी को पहचान लिया। रूपाली 2 मिनट तक रश्मि को आँखों ही आँखों में ढाढ़स देती रही। फिर दोनों ने एक साथ सुभाष को देखा। सुभाष पहले ही रूपाली को आता देख उनकी तरफ पीठ करके बैठ गया था। उसे उन दोनों महिलाओं की बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी।
 
रश्मि ने रूपाली को हाथ की उँगलियाँ हिलाकर घर में चलने का इशारा किया और दोनों घर के भीतर चली गयीं। घर के भीतर प्रवेश करते ही रुपाली ने सवाल किया- "कैसे हैं सुभाष जी अब?" रश्मि की आँखें फिर भर आई, "वैसे ही हैं। अपनी तस्वीर, अपना नाम अखबार में खोजते रहते हैं।”, रश्मि ने अपने दुपट्टे से अपनी आँखें पोंछते हुये कहा।
“उदास मत हो पगली, सब ठीक हो जाएगा। कई बार बुरी परिस्थितियाँ हमें कुछ समय के लिए डरा देती हैं, लेकिन बुरा समय कभी स्थाई तो नहीं रहता है न!!” कहकर रूपाली ने रश्मि के कांधे पर हाथ रखा। रश्मि ने भी सहमति से सिर हिला दिया। "जानती हो रूपाली जब तक ये (अपने पति सुभाष की ओर इशारा करके) इंस्पेक्टर थे, इन्होंने खूब नाम कमाया, इनकी ईमानदारी की चर्चा अक्सर अख़बार की सुर्खियों में छाई रहती। घर का माहौल भी खुशनुमा रहता। बच्चे भी जब छुट्टियों में घर आते तो हम सब कहीं बाहर घूमने जाते। लेकिन जैसे हमारे घर को कलयुग की बुरी नज़र लग गयी हो। ईमानदारी का सिला इन्हें तबादलों के रूप में मिलता रहा। इन्होंने उसकी भी कभी परवाह नहीं की और अपना काम कर्तव्य-निष्ठा से करते रहे। इतने से भी कलयुग के ठेकेदारों का जी नहीं भरा  तो इनकी नौकरी भी इनसे छीन ली। बिना नौकरी के एक ईमानदार इंसान का घर भला किन हालातों में चल पायेगा? तुम तो जानती हो न रूपाली", रश्मि ने रूपाली की तरफ देखकर कहा। हाँ, मैं जानती हूँ, रूपाली धीमी आवाज़ में बोली।
 
अब तो बच्चे भी घर नहीं आते, कहते हैं पापा हमे बेवजह डांटते हैं, पापा और लोगों की तरह क्यूँ नहीं हो जाते? उन्हें भी अब इनकी ईमानदारी से चिढ़ होने लगी है। इस माहौल में एक ईमानदार पिता को बच्चे भी गलत समझते हैं, कह कर रश्मि ने सिर पर हाथ रख लिया। इस बार रूपाली के पास उसे समझने के लिए शब्दों की कमी पड़ रही थी। रश्मि की वेदना उसे उसके ढाढ़स देने वाले शब्दों से कहीं बड़ी लग रही थी। और एक ये हैं जो अख़बार के पन्नों में सच्चाई की बातें ,कहानियाँ, किस्से पढ़ने के लिए अख़बार में नज़र गढ़ाए रहते हैं ।
 अब तो ईमानदारी शब्द अख़बार के आखिरी पन्ने की, अंतिम पंक्ति  के अंतिम शब्द तक कहीं देखने को नहीं मिलता। फिर भी देखो हम न केवल ईमानदारी देख रहे हैं, पढ़ रहे हैं बल्कि ईमानदारी झेल भी रहे हैं।
 
इस बार रश्मि उदास नहीं हुई बल्कि थोड़ा मुस्कराने लगी। रश्मि को अपना दुख छुपाना अच्छे से आता था तभी तो वह मुस्करा दी। उसकी हिम्मत की वजह से ही तो घर में शांति का माहौल बन पाया था । सच में रश्मि तुम सहनशीलता की एक मिसाल हो कह कर रूपाली ने रश्मि को कस कर पकड़ लिया ।उसके मन की स्थिति को रूपाली भलीभाँति समझ रही थी । अच्छा अब मैं चलती हूँ मेरी उजियारी किरण,मेरी रश्मि । रूपाली चलने के लिए खड़ी हो गयी । 
कभी -कभी आ जाया करो रूपाली ,तुम आती हो तो मुझे अच्छा लगता है ।ऐसा लगता है जैसे मेरे मायके से मेरी छोटी बहन आई है । रूपाली ने हल्की सी मुस्कराहट से रश्मि का एक गाल दबाया और बोली ,ठीक है बड़ी दीदी-आ जाया करूंगी ,अब खुश ?कह कर रूपाली चली गयी । रश्मि भी उसे दरवाजे तक छोडने गयी और वापिस अपनी सिलाई –बुनाई में लग गयी । सुभाष की आँखें अभी भी अख़बार में ही गढ़ी थी।

- श्रुति शर्मा

रचनाकार परिचय
श्रुति शर्मा

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