प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जुलाई 2016
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- नेग

 
 
"दर्द उतना ही, खर्च उतना ही लेकिन फायदा...फायदा कुछ नहीं। जनी तो फिर लड़की। दो-दो तो पहले ही थीं अब एक और लो...कितना कहा कि अगर लड़की हो तो सफाई..."
"पर माँ...अब किया ही क्या जाए...मैंने भी बहुत समझाया पर मानी ही नहीं...अब इन बेकार की बातों से क्या फायदा?"
"हाँ-हाँ... मैं तो बेकार की बातें करती हूँ...मैं हूँ ही बेकार...घर से निकाल दो मुझे तुम सब...मैंने क्या गलत कह दिया...यही कि दो-दो लड़कियाँ पहले से ही थीं...अब की बार अगर लड़का हो जाता तो...मुझे क्या है मेरे आगे तो तू है ही तेरे ही आगे कोई नहीं होगा...तुझे ही तीन-तीन लड़कियों का...मैंने तो शरम के मारे किसी को बताया भी नहीं है कि सुधीर की बहू के तीसरी लड़की हुई है...कितनी बदनामी होगी पूरे मुहल्ले में? किसी के भी घर में तीन-तीन लड़कियाँ नहीं हैं...बस यह मनहूसियत हमारे ही घर में..."
"अरे माँ...मैंने तो खर्च करने से ही मना कर दिया था। मैंने तो पहले ही कह दिया था कि अगर लड़की ही पैदा करनी है तो मेरे पास डिलीवरी के खर्च के पैसे नहीं हैं...लेकिन उसकी किस्मत भी तो अच्छी है डॉक्टर ने मुफ्त में ही डिलीवरी कर दी" सुधीर ने थोड़ा तीखे स्वर में कहा, "अब मैं अपने हाथों से मार तो नहीं सकता था न...तो क्या करता घर तो लाना ही था।"
 
अन्दर कमरे में अपनी नवजात कन्या को बगल में लिटाए हुए सुमन बाहर आँगन में चल रहे वाद-विवाद को सुन रही थी। मन-ही-मन कभी खुद कोसती तो कभी अपनी किस्मत को। उसे रह-रहकर अपने पति सुधीर की बातें याद आतीं, "इस बार बेटा दे देना...नहीं तो..." वह फिर उस घड़ी को कोसती जब उसने अपने माता-पिता के विरुद्ध जाकर सुधीर से प्रेम विवाह किया था। उसे लगा था कि सुधीर बहुत खुले विचारों का सुलझा हुआ इंसान है लेकिन यह तो अपनी माँ के पल्लू से ही चिपका रहने वाला है। वह सोचने लगी कि "पहले ही मैंने मना किया था कि अगर फिर लड़की हो गई तो...पर नहीं माने...उस दिन अल्ट्रासाउंड करवाते समय भी कहा था कि अगर लड़की है तो...। तब तो माता जी ने न जाने कौन-कौन सी जड़ी-बूटियाँ, अर्क, काढ़े, भस्म पिलाए थे कि अगर कोख में लड़की भी होगी तो लड़का बन जाएगा...कैसे अंधविश्वासी लोग हैं ये...उफ अब ज़िन्दगी भर दिन-रात के ताने तो मैं सुनूँगी। एक मन तो हुआ कि नवजात कन्या के मुँह पर तकिया रखकर हमेशा के लिए...लेकिन अगले ही पल जब नवजात कन्या ने अँगड़ाई ली तो वह वात्सल्य से भर उठी और उसे अपने कलेजे से लगाकर सोचने लगी, "कुछ भी हो जाए...मैं अपनी बेटी को आँच तक नहीं आने दूँगी...अपनी तीनों बेटियों को पढ़ा-लिखा कर किसी काबिल बनाऊँगी...चाहे मुझे कुछ भी करना पड़े.." लेकिन अगले ही पल उसे जैसे कोई दंश चुभा "हाय, तीन-तीन लड़कियाँ...उफ सास-ननद की तो छोड़ो मायके में भाभियाँ कितना मज़ाक उड़ाएँगी।" वह खुद को संभाल पाती कि अचानक दरवाज़े पर शोर सुनाई दिया।
 
बड़ी कर्कश आवाज़ और तालियों के साथ कोई बोल रहा था, "अरे...हाँ...री....दरवाजा खोलो...लाओ...हमारा नेग लाओ... सुना है...बच्चा हुआ है...लाओ...चाची लाओ..." कहते हुए पाँच हिजड़े घर में घुस आये। उनके पीछे-पीछे मुहल्ले के दो-चार बच्चे और गली की औरतें भी घुस पड़ीं।
"उफ हिजड़े भी आ गये...एक और मुसीबत...जचगी का खर्च कम था जो अब ये..." रमादेवी ने हिजड़ों की तरफ मुँह करके कहा, "देखो..ऑपरेशन से बच्चा हुआ है...अभी हम इस हालत में नहीं हैं कि..."
"आय हाय...छोड़ो भी चाची...ऐसी बातें करे हो....लाओ...हमारा नेग दो...पूरे ढ़ाई हजार..." ताली पीटते हुए एक हिजड़े ने कहा।
"क्या कहा ढ़ाई हजार? दिमाग़ खराब हुआ है क्या...पिछली बार तो ग्यारह सौ लिए थे...इस बार ढ़ाई हजार..." रमादेवी ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा।
"और नहीं तो क्या...पोता हुआ है...कोई मज़ाक है...निकालो पूरे ढ़ाई हजार रुपये और ऊपर से साड़ी ब्लाउज़ भी..." कहकर हिजड़ा ताली बजा बजाकर नाचने लगा। उसके साथ आये दूसरे हिजड़ों में एक ढोलक पर थाप देने लगा और अन्य हिजड़े एक दम से गा उठे..."अरे तुम तो ठहरे परदेसी...साथ क्या निभाओगे...तुम तो ठहरे परदेसी...साथ क्या निभाओगे...राजा...सुबह पहली गाड़ी से....घर को लौट जाओगे...."
अपनी छाती और नितम्ब मटकाते हुए वह हिजड़ा सुधीर की ओर इशारा करने लगा। सुधीर बिना कुछ कहे ही एक ओर बैठकर उन हिजड़ों को घूरकर देखने लगा। मुहल्ले के बच्चे हँसने लगे और गली की औरतें पल्लू से अपनी हँसी दबाने लगीं।
 
रमा देवी ने खिसियाकर उन्हें रोकते हुए कहा, "बन्द करो अपनी बकवास...और दफा हो जाओ यहाँ से...मुझे कुछ नहीं सुनना और न ही कुछ देना है..."
गाना तुरन्त बन्द हो गया लेकिन ताली अभी भी पीटी जा रही थीं। एक हिजड़ा बोला, "अए हाय...चाची...इतनी गरमी किसे दिखा रही हो...हम हिजड़ों को...अरे हमें गरमी दिखाकर क्या मिलेगा...हमें तो हमारा नेग दे दो हम...चली जाएँगीं..." जोर जोर से ताली पीटने लगा, "दो-दो लड़कियों के बाद लल्ला हुआ है...क्या इतना भी हक़ नहीं है हमारा...अरे गाओ री..." और गाना बजाना फिर शुरू हो गया।
रमादेवी ने अब तक किसी को नहीं बताया था कि सुमन ने तीसरी कन्या को जन्म दिया है। बतातीं भी कैसे? पूरे मुहल्ले में कह जो दिया था कि देखना इस बार सुधीर की बहू के बेटा ही होगा। आखिर इतनी मनौती मनाईं थीं बरगद वाले बाबा की, गंगा मइया की और शाह बाबा के मज़ार पर चादर चढाने को भी तो बोला था। न जाने क्या-क्या उपाय किए थे कि बहू के इस बार लड़का पैदा हो जाए। अरे उसे तो पूरा यकीन था तभी तो गोला-बताशे लाकर पहले ही रख लिया था कि सुमन अस्पताल से गोद में लड़का लेकर जैसे ही आएगी, पूरे मुहल्ले में घर-घर जाकर वह गोला-बताशे बाँटती, पर "हाय री किस्मत। अब कैसे कहे कि बहू ने इस बार भी....अच्छी मनहूस पल्ले पड़ गयी।" मन में विचार चल ही रहे थे कि पड़ोसन बसन्ती ने कह ही दिया, "क्यों रमा जिज्जी, लल्ला की मुँह दिखलाई कब करवाओगी...अरी इतना भी पर्दे में क्या रखना....जाओ कमरे में से बहू और लल्ला को ले आओ।"
रमादेवी को कुछ समझ नहीं आया। हड़बड़ाहट में झूठ ही बोल दिया, "हाँ-हाँ करा दूँगी मुँह दिखलाई...पर अभी रुको...अभी बहू और लल्ला की तबियत ठीक नहीं है। आराम करने दो दोनों को।"
हिजड़े गाते रहे, "साजन मेरा उस पार है....मिलने को दिल बेकरार है..."
 
बसन्ती को दाल में कुछ काला नज़र आया। वह एकदम बोल पड़ी, "अरे जिज्जी, लाओ हम ही चले जाते हैं अन्दर...लल्ला को देखने।" वह कमरे की ओर जैसे ही बढ़ी, रमादेवी ने लपककर उसका हाथ पकड़ लिया, "नहीं...अभी नहीं...बाद में..." और बसन्ती अन्दर न जाकर वापस अपनी जगह खड़ी हो गयी। 
इतने में एक हिजड़े ने ताली पीटते हुए कहा, "लाओ चाची...हमारा नेग दो...और हमें विदा करो...एक साड़ी ब्लाउज और ढ़ाई हज़ार रुपये...लाओ जल्दी करो।"
रमा देवी सकपका गयी, "करे तो क्या करे...अगर सच बोला तो मुहल्ले भर में बदनामी और अगर सच न बोला तो ढ़ाई हज़ार रुपये और साड़ी ब्लाउज लिए बिना तो ये जाएँगे नहीं...उफ क्या करूँ मैं?"
रमादेवी ने सख्ती से कहा, "कहा न कि नहीं दे सकती मैं कुछ भी...ऑपरेशन से बच्चा हुआ है और खर्चा बहुत हो गया है...निकलो यहाँ से तुम लोग..."
इस बार एक हिजड़ा तैश में आ गया, "आय...हाय...हम हिजड़ों के मुँह मत लग...हमारी बद्दुआ मत ले...सीधे से हमारा नेग दे और हमें विदा कर...ज्यादा बातें न करनी हैं...न सुननी हैं...सीधे सीधे हमारा नेग दे दो नहीं तो..."
"नहीं तो क्या करेगा बे..." अब सुधीर भी तैश में आ गया, "क्या कर लोगे बताओ?"
"आय हाय...हमसे सीना जोरी करेगा...ले ले...यह कर लेंगे..." कहते हुए हिजड़ा अपनी साड़ी घुटनों से ऊपर तक उठा चुका था।
"अरे...अरे...क्या बदतमीजी है...नीचे करो साड़ी...बच्चे हैं...दिखाई नहीं देता" रमादेवी ने कहा।
"तो अपने लल्ला को क्यों नहीं समझातीं चाची...हमारा नेग दो और हमें राजी-खुशी विदा करो क्यों हमसे बदतमीजी कर रहा है यह... अरी खुशी का मौका है हम भी खुशी में ही माँगने आए हैं।" हिजड़े ने बात को हल्का करते हुए कहा।
"जरूरी है कि तुम्हें हर बच्चे में दिया जाए..." सुधीर ने तल्ख होते हुए कहा।
"अए हाय....राजा इतनी नाराज़गी..." उस हिजड़े ने कहते हुए सुधीर के गाल पर हाथ फेरा कि सुधीर ने एक तमाचा उस हिजड़े को मारा, "क्या बदतमीजी है...हाथ पीछे हटा...बे....साले...."
 
यह देखकर सारे हिजड़े खड़े हो गये और ताली बजा-बजा कर रमादेवी को बुरा भला कहने लगे। जिसके तमाचा पड़ा था वह बोला, "अरे हम हिजडों पर हाथ उठाता है...हिजड़ा तो तू है तू...अरे तूने हमारे सीधेपन का फायदा उठाया है...हम तुझे बद्दुआ देते हैं कि..." हिजड़ा अपना वाक्य पूरा भी नहीं कर पाया था कि सुमन अपने कमरे से बाहर निकल आई और उसने नवजात बच्ची को उस हिजड़े के पैरों में डाल दिया, "लो...ले जाओ इसे...इसके पैदा होने की कोई खुशी इस घर में नहीं है...मातम मना रहे हैं घरवाले...अगर इसके जन्म का नेग नहीं दे सकते तो इसी को ले जाओ...इसने यह अपराध किया है कि यह लड़की बनकर पैदा हुई है। इसके साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है जैसे यह खुद मेरी कोख में आ गई।" कहकर सुमन वहीं दीवार से टिककर बैठ गयी और सुबकने लगी।
घर में एकदम सन्नाटा छा गया। हिजड़े ने बच्ची को उठाया और उसे अपनी छाती से लगाकर प्यार करने लगा। अपने ब्लाउज में से पाँच सौ का नोट निकाला और बच्ची की न्योछावर की। फिर बच्ची को सुमन की गोद में देते हुए उसने अपना पर्स खोला और उसमें से पाँच-पाँच सौ के चार नोट और निकाले तथा न्योछावर वाले पाँच सौ मिलाकर कुल ढ़ाई हजार रुपए सिगरेट की तरह गोल कर बच्ची की बन्द मुट्ठी में फँसाकर कहा, "लो चाची...हमारी तरफ से नेग...तुम्हारे घर में लक्ष्मी आई है...यह बताने में शर्म कैसी? अरे जब सरकार लड़की पैदा होने पर इतना कुछ कर रही है। अस्पतालों में लड़की होती है तो कोई खर्चा नहीं देना पड़ता वैसे ही हम हिजड़ों ने भी फैसला किया है कि जिन घरों में लड़की होगी उन घरों में अपने पास से नेग देंगे।" हिजड़े ने रमादेवी की ओर देखकर कहा, "अरे चाची ऐसे मातमी चेहरा मत बनाओ, खुशियाँ मनाओ कि तुम्हारे घर को जोड़ने वाली बेटी आयी है जिसके लिए तुम्हें सबकुछ जोड़ना है। अगर बेटा आता तो बाँटना पड़ता। अरे चाची लड़का तो लड़कर अपना हक़ माँगता है, लेकिन लड़की अपना हक़ छोड़कर चली जाती है, जैसे तुम चली आई अपने मायके में सब छोड़कर। समझ रही हो न चाची?" कहकर हिजड़े ताली बजाते हुए घर से बाहर जाने लगे कि अचानक रमादेवी ने उन्हें रोक लिया और बोलीं, "मेरी लक्ष्मी के लिए बधाई तो गाते जाओ।"
 
शायद रमादेवी को हिजड़े की बातों का मर्म समझ में आ गया था तभी तो उनकी आँखों में नमी थी। हिजड़ों ने एक बार फिर गाना शुरू कर दिया और सुधीर सुमन को उठाकर कमरे के अन्दर ले गया।

- डॉ. लवलेश दत्त
 
रचनाकार परिचय
डॉ. लवलेश दत्त

पत्रिका में आपका योगदान . . .
गीत-गंगा (1)कथा-कुसुम (7)आलेख/विमर्श (2)ख़ास-मुलाक़ात (1)