प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जुलाई 2016
अंक -42

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल की बात

ग़ज़ल की बात (किश्त- 6)

 
साथियो नमस्कार!
 
पिछले पाँच अंकों में हम विभिन्न प्रकार की लहरों सतत, मिश्र एवं रूपांतरित पर विस्तृत चर्चा कर चुके हैं। समस्त सामग्री, हिंदी में ग़ज़ल का अभ्यास करने वाले साधकों को ध्यान में रखकर प्रस्तुत की गई थी। इसमें उर्दू बहरों को सरल भाषा में निम्न मिसरे द्वारा हृदयंगम करने का सुझाव था।
 
तराना\ झूमकर\ मुहब्बत का\ गुनगुनाओ\ हँसते रहो\ उदास कभी\ न रहो सनम
122 \ 212 \ 1222 \ 2122 \ 2212 \ 12112 \ 11212
 
अंत में सारणी द्वारा उर्दू बहरों एवं हिंदी सूत्रों को एक साथ दिया गया था, ताकि भ्रम न रहे। बहरों के साथ उनके समतुल्य हिंदी छंद भी दिए गए थे, इसका उद्देश्य मात्र इतना था कि केवल उर्दू भाषा न आने के कारण कोई ग़ज़ल से विमुख न हो। हो सकता है उर्दू छंद-शास्त्र के लिहाज़ से त्रुटियाँ हों, जिसके लिए मैं अपने अल्पज्ञान को दोषी मानते हुए क्षमाप्रार्थी हूँ। मेरा उद्देश्य हिंदी ग़ज़ल के नवसाधकों (मेरे जैसों) के लिए मार्गदर्शन भर था।
 
इस अंक में दो महत्वपूर्ण गुणों काफ़िया और रदीफ़ पर सामान्य चर्चा करेगें।
 
काफ़िया– यह अरबी शब्द है, जिसका अर्थ हिंदी के अन्त्यानुप्रास से है। सामान्य भाषा में इसे तुक कहते हैं। यह ग़ज़ल का आभूषण है। तुक पर ही पूरे शेर का भाव केन्द्रित रहता है।
देखिए–
मुझे तेरी मुहब्बत का सहारा मिल गया होता
यहाँ संभावित काफ़िये हैं– किनारा, नज़ारा, सितारा। अब जिस शेर में ‘सितारा’ काफ़िया लेना है, उस शेर में सभी भाव इस तरह संकेंद्रित होंगे कि ‘सितारा’ का अर्थ विस्फोटित हो। देखा जाए तो काफ़िया ही शेर निकालता है।
 
काफ़िये दो तरह के होते हैं–
1) स्वर का काफ़िया– आ, ए, ई, ऊ, ओ के काफ़िये
2) व्यंजन का काफ़िया– क, त, न, र, ल, स, य आदि के काफ़िये
 
जहाँ अनुप्रास यानि ध्वनि– साम्य होता है, उसे तुक कहेंगे।
तुक के बाद के वर्ण (स्वर या व्यंजन) को तुकानु (तुक+अनु) कहेंगे।
तुक के पहले के वर्ण (स्वर या व्यंजन) को तुकाग्र (तुक+अग्र) कहेंगे।
ये तीनों मिलकर पूर्ण तुक बनेंगे। पूर्ण तुक= तुकाग्र+तुक+तुकानु।\
 
काफ़िया बंदी यानि तुक संयोजन के लिए निम्न चरण सहायक सिद्ध होंगे।
*तुक हमेशा मतले यानि पहले शेर में ही तय हो जाएगा, शेष अशआर में उसी तुक को भिड़ाया जाएगा। बीच में कोई दूसरा तुक नहीं लाया जाता है।
*तुक तय हो जाने के बाद, तुक के दायीं तरफ तुकानु की पहचान की जानी चाहिए।
*तुक के बायीं तरफ तुकाग्र भी पहचाना जाना चाहिए।
*पूर्ण तुक= तुकाग्र + तुक + तुकानु होता है। सभी अशआर में इसका पूरा ध्यान रखा जाए कि पूर्ण तुक (तुकाग्र + तुक + तुकानु) समान हों। सभी अशआर में यानि मतले से लेकर मक्ते तक प्रयुक्त पूर्ण तुक (तुकाग्र + तुक + तुकानु) वाले शब्द काफ़िया कहलाते हैं।
उदाहरण–
मकान और थकान
ये ‘काफ़िये’ हैं और इनका पूर्ण तुक ‘अकान’ है। नीचे समझाया गया है
यहाँ मुख्य तुक ‘क’ है।
अब ‘क़’ के दायीं तरफ़ दो समान वर्ण हैं, एक ‘आ’ का स्वर, दूसरा व्यंजन ‘न’। यानि तुकानु  हुआ ‘आन’। तुक + तुकानु = कान  (क + आन)
और ‘क़’ के बायीं तरफ़ जाने पर एक समान स्वर ‘अ’ मिलता है। अतः तुकाग्र हुआ ‘अ’। यानि तुकाग्र + तुक = अका (अ + का)।
पूर्ण तुक= तुकाग्र + तुक + तुकानु = ‘अ’ + क + आन = अकान
अब हर अशआर में अन्त्यानुप्रास अकान रहना चाहिए।
 
हो गई है थकान रस्ते में 
मिल गया इक मकान रस्ते में
इस मतले में थकान/ मकान काफ़िये लेने से पूर्ण तुक ‘अकान’ तय हो गया है। अब इस ग़ज़ल में कोई सानी मिसरा यूं नहीं होगा–
देखकर इक मचान रस्ते में
हो गया कुछ गुमान रस्ते में
गिर पड़ा इक पठान रस्ते में
इन सबमें ‘आन’ तो आ रहा है लेकिन ‘क’ गायब है। कई भाई तो, रुमाल रस्ते में, कतार रस्ते में भिड़ाकर भी खुश हो जाते हैं।
*सबसे महत्वपूर्ण है– काफ़िया में से पूर्ण तुक निकाल देने पर कोई सार्थक शब्द नहीं बचना चाहिए। यानि काफ़िया– पूर्ण तुक = निरर्थक शब्द। जैसे –
मकान – अकान = म्  (निरर्थक शब्द)
थकान – अकान = थ्  (निरर्थक शब्द) 
देखें---  उछलना और निखरना
यहाँ तुक = न , तुकानु = आ , तुकाग्र = अ , इसलिए पूर्ण तुक = अना
अब इन काफियों में से अना को निकाल दें तो निम्न शेष रहेंगे– 
उछलना – अना = उछल, निखरना – अना = निखर, ‘उछल’ और ‘निखर’ दोनों सार्थक शब्द हैं अतः ये काफ़िये खारिज़ माने जायेंगे। ( हिंदी गीतों में केवल तुकांत पर बल दिया जाता है, अत: अंत में ‘ना’ समान होने से तुक भिड़ जाएगा। किन्तु ग़ज़ल में खारिज़ है)
अगर उछलना के साथ मचलना लिया जाए तो-
यहाँ तुक = ल , तुकानु = ना , तुकाग्र = अ , इसलिय पूर्ण तुक = अलना
अब इन काफ़ियों में से अलना को निकाल दें तो शेष रहेंगे–
उछलना – अलना = उछ , मचलना – अलना = मच , ‘उछ’ और ‘मच’ दोनों निरर्थक शब्द हैं अतः ये काफ़िये सही माने जायेंगे। ‘अलना’ पूर्ण तुक को निभाते हुए आगे के अशआर हो यथा-
उछलना/ मचलना/ निकलना/ पिघलना/ बदलना/ संभलना/ फिसलना
कई उस्ताद इस बात पर अड़े रहते हैं कि क्रिया-शब्द (verb) को काफ़िया न बनाया जाए। साथियो उर्दू अदब की किताबें क्रिया-शब्द के काफ़ियों से भरी पड़ी है। क्रिया-शब्द ( verb ) में से यदि पूर्ण तुक को हटा देने पर निरर्थक शब्द बचता हो तो क्रिया-शब्द का काफ़िया लिया जा सकता है। यानि काफ़िया का निम्न सूत्र सिद्ध होना ज़रूरी है।
काफ़िया – पूर्ण तुक = निरर्थक शब्द
जैसे – बचा/ रचा/ मचा/ पचा, काफ़ियों में से पूर्ण तुक ‘अचा’ को निकाल दें, तो निम्न निरर्थक शब्द बचते हैं--- ब / र / म / प  , यानि काफ़िया सही है।
लेकिन– बचा / सुना / दिखा / रखा / चला, काफ़ियों में पूर्ण तुक केवल ‘आ’ की मात्रा है, इसे निकाल देने पर--- बच / सुन / दिख / रख / चल शेष रहते हैं। इनमें सुन, रख और चल सार्थक शब्द हैं, इसलिए ये काफ़िये खारिज़ हैं। क्रिया-शब्द (verb) के काफ़िये वाले कुछ अशआर आपकी नज़र हैं। इन पर काफ़िया– पूर्ण तुक = निरर्थक शब्द , का नियम लागु है।
 
इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या
आगे आगे देखिए होता है क्या (मीर तकी मीर)
 
ख़्वाब इन आँखों से अब कोई चुरा कर ले जाए
क़ब्र के सूखे हुए फूल उठा कर ले जाए (बशीर बद्र)
 
ये सभी नियम आदर्श ग़ज़ल के लिए है, लेकिन बड़ी बात है शेरीयत। अगर शेरीयत प्रभावित होती हो तो नियम तोड़े भी जा सकते हैं।
काफ़िया–बंदी (तुक-संयोजन) के सामान्य नियम---
 
*काफ़िये में तुक के साथ-साथ तुकानु और तुकाग्र की समानता भी होनी चाहिए। उदा.–
‘हवा और दावा’ दोनों में तुक व्यंजन ‘व’ है, तुकानु ‘आ’ की मात्रा है। यानि दोनों में अन्त्यानुप्रास ‘वा’ है, फिर भी ये काफ़िया सही नहीं है क्योंकि तुक ‘व’ से पहले तुकाग्र जुदा है।
हवा में ‘व’ से पहले ‘अ’ स्वर है जबकि दावा में ‘व’ से पहले ‘आ’ स्वर है।
हवा में पूर्ण तुक ‘अवा’ है जबकि दावा में पूर्ण तुक ‘आवा’ है। अतः हवा के साथ दवा और दावा के साथ लावा का काफ़िया भिड़ेगा।
*काफ़ियों का वज़्न यानि मात्रा-क्रम समान होना चाहिए। उदाहरण–
कहानी और नादानी दोनों में तुक ‘न’, तुकानु ‘ई’ और तुकाग्र ‘आ’ है। यानि पूर्ण तुक ‘आनी’ है, फिर भी दोनों खारिज़ हैं, क्यूंकि कहानी का मात्रा–क्रम = 122 जबकि नादानी = 222। अतः कहानी के साथ पुरानी और नादानी के साथ आसानी सही काफ़िया है।
*अनुस्वार/ अनुनासिक के काफ़िये लेते समय शब्द-ज्ञान अति आवश्यक है। कहाँ के साथ रहा या जवां के साथ हवा आदि खारिज़ हो जायेंगे। यानि तुकानु या तुक अनुनासिक/ अनुस्वार युक्त हो तो सभी काफ़ियों में अनुनासिक/ अनुस्वार हो।
*संयुक्ताक्षर/ आधे वर्ण के काफ़ियों में भी तुक का विशेष ध्यान रखा जाए। जैसे पक्का के साथ चक्का तो बैठ जाएगा पक्का/चक्का के साथ चस्का या हिस्सा /क़िस्सा के साथ रिक्शा आदि खारिज़ हो जायेंगे।
*समीपस्थ  वर्ण यानि जिनमें उच्चारण साम्य हो, उनमें भी तुक की गल्तियाँ हो जाती हैं।
समीपस्थ वर्ण – क/ ख, ग/घ, च/छ, ज/झ, त/थ, स/श आदि। उदाहरण–
साथ और बात, निराशा और दिलासा, उदास और तलाश। इनमें अति आवश्यक होने पर दूसरे वर्ण को पहले जैसा कर देते हैं, जैसे– हाथ को हात, तलाश को तलास।
*कुछ काफ़िये जिनमें हिंदी का हर ग़ज़लकार शुरुआत में गच्चा खा जाता है–
कर्ज़= 21, अर्ज़= 21 जबकि मरज़= 12, ग़रज़= 12
शह्र= 21 जबकि लहर= 12, अम्न= 21 जबकि चमन= 12
ज़हर= 21 जबकि सहर= 12, शरर= 12, अस्ल= 21
*हिंदी में ‘ट’ वर्ग के शब्दों में विशेष ध्यान रखें। जैसे–
‘पढ़ा’ और चढ़ा के साथ ‘लड़ा’ और ‘बड़ा’  गलत हैं।
‘ठाठ’ और ‘पाठ’ के साथ ‘जाट’ और ‘बाट’ गलत हैं।
*कई बार शीघ्र उच्चारण भी काफ़िये गलत करा देता है, जैसे ‘कंटक’ और ‘संकट’ गलत हैं।
*सबसे महत्वपूर्ण यह है कि काफ़िये के पूर्ण तुक में ज़िहाफत (मात्रा–पतन) सही नहीं है। जैसे ‘निराला’ या ‘कहानी’ ‘दीवाना’ आदि अगर काफ़िये हैं तो इनमें ‘ला’, ‘नी’ और ‘ना’ की मात्रा गिराकर इन्हें 122/ 222 से 121/ 221 नहीं कर सकते हैं।
 
कुछ अति प्रचलित ‘स्वर’ के काफ़िये---
 
‘आ’ के काफ़िये– दुआ/ खता/ सजा/ दवा/ नया/ (रा) स्ता/ ( आ )इना/ रिदा/ फिज़ा/ हवा/ कज़ा/ सुना/ रहा/ मिला/ पता/ शिफ़ा/ वफ़ा/ ख़ुदा/ (ना) ख़ुदा/ (दिल) रुबा
 
‘ई’ के काफ़िये– ख़ुशी/ नई/ कली/ (ज़िं)दगी/ (शा)यरी/ (रो)शनी/ (ती)रगी/ (बे) ख़ुदी/ (आ)शिक़ी/ (मैक)शी/ (ख़ुद)कुशी/ (आप)की/ (बं)दगी/ (ता)ज़गी/ गली/
 
‘ऊ’ के काफ़िये – तू / (गुफ़्त)गू / (खुश)बू / (रू ब) रू / (कू ब) कू / (र)फ़ू / छू / (हर)सू / (आ)रज़ू / (हू ब) हू / (जुस्त) ज़ू / (आब) रू / जादू  / पहलू 
 
(आं) के काफ़िये – यां / जां / (दास्) तां / (नात) वां / (म) कां / (आस्) तां / (ज)हां / (बाद)बां 
 
कुछ अतिप्रचलित व्यंजन के काफ़िये--       
 
‘क’ के काफ़िये – महक / चमक / ललक / झलक / नमक / सबक 
 
‘त’ के काफ़िये – मुहब्बत / शराफ़त / रवायत / कयामत / इबादत / नफ़रत / उल्फ़त 
 
‘न’ के काफ़िये – चमन / अगन / सुख़न / थकन / चुभन / जलन / तपन / सघन 
              कहानी / पुरानी / सुहानी / निशानी / छेड़खानी / रवानी 
              सुहाना / सयाना / पुराना / खज़ाना / ठिकाना / फ़साना / लुभाना / ज़माना 
 
‘ल’ के काफ़िये --  कमल / महल / सफ़ल / ग़ज़ल / सरल / वायरल / अटल / तरल / गरल 
                उजाला / निराला / संभाला / खंगाला / काला / पाला / छाला / जाला / ताला 
               
‘र’ के काफ़िये – समर / शजर / शरर / लहर / असर / नज़र / बशर / सफ़र / अधर / इधर 
             मुकद्दर / खंज़र / सागर / समंदर / अक्सर / मंज़र / मंदर / अक्षर / कबूतर 
             सहारा / किनारा / सितारा / धारा / हमारा / नज़ारा / सहारा / इशारा / शिकारा 
 
‘ब’ के काफ़िये – अज़ीब / करीब / ग़रीब / नसीब / रकीब / हबीब / सलीब / अदीब  
 
‘म’ के काफ़िये – शाम / नाम / आम / जाम / काम / राम / गाम / दाम / फ़ाम / बाम / लाम 
 
 
 
रदीफ़ (अनुगामी)– काफ़िया के बाद, पूर्ण तुक के साथ उच्चारित वह शब्द, जो काफ़िये के अर्थ को पूर्णता प्रदान करता है और सानी मिसरे की खूबसूरती बढ़ा देता है। रदीफ़ किसी भी शेर के सानी मिसरे का रब्त वापस मतले से जोड़ देता है और ग़ज़ल में मतला ता मक्ता एक रवानी बरकरार रखता है। हिंदी भजनों और आरतियों में जो टेर या संपुट होता है, वह रदीफ़ का ही रूप है। यहाँ तक कि वैदिक सूक्तों में भी रदीफ़ का प्रयोग देखने को मिलता है।
सूक्तों के अंत में जो ‘स्वस्तये’,  ‘स्वाहा’, ‘हवामहे’, ‘नमो–नमो’, ‘प्रचोदयात’, ‘नमस्तुभ्य’, ‘भूयासम’, ‘शिवसंकल्पमस्तु’ आदि का उच्चारण हैं, वह रदीफ़ की पुष्टि करता है।
 
रदीफ़ के अपने कुछ नियम हैं----
 
*रदीफ़ का काफ़िये के साथ पूर्ण तालमेल हो यानि काफ़िया और रदीफ़ एक सार्थक जोड़ी बनाते हो और बेमेल न हों। जैसे–
फ़साना सुनाओ/ तराना सुनाओ के साथ ‘कोई गीत पुराना सुनाओ’ तो चलेगा लेकिन ‘मुझे दिल चुराना सुनाओ‘ कैसे फिट होगा, क्योंकि चुराना सिखाओ हो सकता है, सुनाओ कैसे होगा?
*काफ़िये के लिंग, वचन और काल का रदीफ़ के साथ रब्त होना चाहिए। जैसे–
खता हो गई/ दुआ हो गई/ हवा हो गई के साथ ‘भला हो गई’ का कोई रब्त नहीं है, क्योंकि यहाँ ‘भला हो गया’ सही है।
रिसाला मिला/ उजाला मिला/ निवाला मिला के साथ ‘सबके होठों पर ताला मिला’ सही नहीं है क्योंकि ‘सबके होठों पर ताले मिले’ सही होगा।
*सबसे महत्वपूर्ण मतले के दोनों मिसरों और हर शेर के सानी मिसरे (दूसरी पंक्ति) के अलावा रदीफ़ (और उसकी मात्रा भी) किसी अन्य मिसरे (पंक्ति) के अंत में न आए, क्योंकि केवल मतले के ही दोनों मिसरों में रदीफ़ आता है, दूसरे अशआर के दोनों मिसरों में रदीफ़ आने पर मतला और सानी मिसरे तय करना मुश्किल हो जाएगा। देखें–
 
आज फिर मुझको पुकारा आपने
दी सदा  करके  इशारा  आपने
रब्त मुझसे तोड़कर भी आपने
दे दिया मुझको सहारा आपने
 
अच्छे शेर या बात निकलती हो तो सारे नियम अपवाद हैं। लेकिन यूँ ही नियम तोड़कर ग़ज़ल की ख़ूबसूरती और मूल स्वरूप से छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। आशा है आपको यह लेख पसंद आएगा।
 
 
आपके स्नेह का आकांक्षी
 

- ख़ुर्शीद खैराड़ी