जुलाई 2016
अंक - 16 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

बाल-वाटिका

 

बाल कहानी- हिंदोस्तान सचमुच महान है!
 
मुग़ल सम्राट जहाँगीर का दरबार लगा हुआ था। बादशाह रत्नजड़ित सिंहासन पर बैठे राज-काज की कार्रवाइयों में व्यस्त थे। तभी दरबार में एक आगंतुक ने प्रवेश किया। कानों को ढकते लंबे बाल, चौड़ा माथा, छोटी-छोटी नीली आँखें, भरी-भरी-सी मूँछें और सफेद कपड़ों पर पहना हुआ भूरे-कत्थई रंग का ओवरकोट, उसके विदेशी होने की गवाही दे रहा था। दरबार की मर्यादा के अनुसार उसने पा-बोसी (झुककर ज़मीन को चूमना) की और कुछ क़दम पीछे हटकर तीन बार तस्लीम (झुककर सलाम करना) करता हुआ बोला, "शहंशाह का इक़बाल बुलंद रहे। मैं अंग्रेज़ सम्राट का राजदूत थामस रो हूँ। सम्राट ने मुझे भारत से व्यापारिक संबंध् स्थापित करने के उद्देश्य से यहाँ भेजा है।"
 
सारे दरबारी हैरत से उसे देख रहे थे। उसका पहनावा-ओढ़ावा, शक्ल-सूरत और बोलने-बात करने का अंदाज़ एकदम अनोखा और आनंदपूर्ण था।
थामस रो अंग्रेज़ी राजदूत बनकर 1615 ई. के अंत में भारत आया था। उसका उद्देश्य भारत में अंग्रज़ी व्यापार को बढ़ावा देना था। ईस्ट इंडिया कंपनी की नींव मज़बूत करने वालों में उसका भी नाम लिया जाता है।
बादशाह ने उसे मेहमान ख़ाने में ठहरा दिया।
 
कुछ दिनों के बाद बादशाह थामस रो के साथ बाग़ में टहल रहे थे। मौसम सुहावना था। पक्षियों के कलरव से वातावरण गूँज रहा था। चारों तरफ फूलों की ख़ुशबू फैली हुई थी। रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडरा रही थी। सरोवर का पानी पिघले हुए पारे की तरह चमक रहा था। हंस और हंसिनी बेख़बर होकर किल्लोलें कर रहे थे।
बादशाह पुलकित होकर बोले, "कितना हसीन मौसम है। सचमुच, क़ुदरत ने दुनिया को किसी ख़ूबसूरत तस्वीर की तरह रचा है।"
थामस रो कुछ न बोला। उसे चुप देखकर बादशाह ने पूछा, "मेहमान, क्या तुम्हें यह हसीन माहौल अच्छा नहीं लग रहा?"
थामस रो हड़बड़ाकर बोला, "गुस्ताख़ी माफ़ हो हुज़ूर। मेरा ध्यान कहीं और था।"
"ज़रूर कुछ इस नज़ारे से भी हसीन होगा। तभी तुम्हारा ध्यान इधर नहीं लग पा रहा।"
"हाँ, हुज़ूर," थामस रो कहने लगा, "मैं अपने मुल्क के उन कलाकारों के बारे में सोच रहा था, जो क़ुदरत के इस नज़ारे को हूबहू अपनी कला से ज़िन्दा कर देते हैं।"
"क्या मतलब?"
"हुज़ूर, हमारे मुल्क ने कला के क्षेत्रा में असीम उन्नति की है। हमारे मुल्क के अदना से अदना कलाकार का भी मुक़ाबला दुनिया कर सकती।"
"लेकिन हम तुम्हारी बात का यक़ीन कैसे करें, मेहमान?" बादशाह मुस्कराकर बोले।
थामस रो एकाएक चुप हो गया। थोड़ी देर की चुप्पी के बाद वह संयत स्वर में बोला, "ठीक है हुज़ूर, कल दरबार में मैं अपने मुल्क की कलाकारी का नमूना पेश करूँगा।"
 
अगले दिन दरबार खचाखच भरा हुआ था। थामस रो दरबार में हाजि़र हुआ। उसके हाथ में रेशमी कपड़े से ढकी कोई वस्तु थी। सब उसे देखने को उत्सुक हो उठे। थामस रो ने झुककर बादशाह का अभिवादन किया और बोला, "हुज़ूर, वायदे के मुताबिक़ मैं अपने मुल्क की कलाकारी का एक अदना-सा नमूना पेश कर रहा हूँ। उम्मीद है इसे परखने के बाद हुज़ूर को मेरे दावे की सच्चाई का यक़ीन हो जाएगा।"
यह कहकर उसने रेशमी कपड़ा हटा लिया। एक सुंदर तैल-चित्र सबके सामने था। उसके रंगों और रेखाओं का संयोजन इतना संतुलित था कि वह एकदम जीवंत हो उठा था। लग रहा था कि प्रकृति उस छोटे-से चित्र में क़ैद हो गई है। सारा दरबार ठगा-सा रह गया। "वाह-वाह!", "अद्भुत", "आश्चर्यजनक" जैसे स्वर उठने लगे।
सारा दरबार चित्र की प्रशंसा में वाह-वाह कर रहा था, लेकिन बादशाह के माथे पर सिलवटें पड़ी हुई थीं। वे किसी गहरी सोच में डूबे हुए थे। यह देख थामस रो मन ही मन फूलता हुआ बोला, "जहाँपनाह, आपकी कला-प्रियता जग-ज़ाहिर है। उम्मीद है हुज़ूर ने तस्वीर की ख़ूबसूरती और कलाकार की कला को परख लिया होगा।"
बादशाह कुछ न बोले। वे चुपचाप उसी मुद्रा में बैठे रहे। थामस रो का मन बढ़ गया। कहने लगा, "हुज़ूर, गुस्ताख़ी माफ़, लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस जैसी दूसरी तस्वीर बना पाना हिंदुस्तानियों के लिए संभव नहीं है।"
यह सुनकर बादशाह हौले से मुस्कराए। उनके चेहरे का तनाव ढीला पड़ने लगा। वे बोले, "मेरे विलायती मेहमान, मैं जल्द ही तुम्हारी बात का जवाब दूँगा। बस, थोड़ा सब्र रखो।"
 
कुछ दिनों के बाद एक दिन अचानक बादशाह ने थामस रो को बुलवाया। थामस रो पहुँचा तो वे उससे कहने लगे, "तुम्हारे वतन की फ़नकारी वाक़ई लाजवाब है। तुम्हारी तस्वीर सचमुच ख़ूबसूरत है। उसकी जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है।" यह कहते बादशाह उधर मुड़े, जिधर कपड़े से ढकी कुछ तस्वीरें रखी हुई थीं। उन पर से कपड़ा हटाते हुए उन्होंने कहा, "मेहमान, इन तस्वीरों में से एक तस्वीर तुम्हारी भी है। तुम उसे पहचानकर ले जा सकते हो।"
थामस रो हतप्रभ रह गया। यह आँखों का भ्रम था या सच्चाई। हूबहू छः वैसी ही तस्वीरें वहाँ रखी थीं। वही रंग, वही आकार, वही सुंदरता। थामस रो चकित था। वह कभी इस तस्वीर को उठाता, तो कभी उस तस्वीर को। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसकी अपनी तस्वीर कौन-सी है। उसके असमंजस पर बादशाह दूर खड़े मंद-मंद मुस्करा रहे थे। आखि़रकार जब उसके चेहरे पर हार के चिह्न दिखाई देने लगे तो बादशाह कहने लगे, "सात समंदर पार के मेहमान, क्या तुम अब भी अपने दावे पर क़ायम हो?"
थामस रो का सिर झुक गया। उसके मुँह से सिर्फ इतना निकला, "हिंदोस्तान सचमुच महान है!"

- डॉ. मोहम्मद अरशद ख़ान

रचनाकार परिचय
डॉ. मोहम्मद अरशद ख़ान

पत्रिका में आपका योगदान . . .
बाल-वाटिका (1)