हस्ताक्षर रचना
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2016
अंक -41

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

शिक्षा और व्यवस्था

वर्तमान समय में बिहार की शिक्षा-व्यवस्था का जो मखौल बन रहा, वह अत्यन्त चिंतनीय एवं निराशाजनक है। चिंता उनकी नहीं, जिन विद्यार्थियों को फर्ज़ी तरीके से टॉपर बनाया गया; बल्कि उनकी है जो ऐसे माहौल में भी पूरी ईमानदारी से अध्ययन कर अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होते आये हैं। इस सबके बीच उन जैसे न जाने कितने प्रतिभावान छात्र कुंठा के दौर से गुजर रहे होंगें, जब उनकी अंकसूची की ओर कई सशंकित नज़रें देखतीं होंगी। आखिर क्यों, वर्षों से हर राज्य के कई क्षेत्रों में योग्यता दूसरे पायदान पर खड़ी दिखती है और पहली सीढ़ी किसी ताक़तवर द्वारा हथिया ली जाती है?


यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हर घटना को प्रांत से जोड़कर उस पर खुशहाल/बदहाल, रामराज्य/ जंगलराज का ठप्पा लगा दिया जाता है और फिर पक्ष/विपक्ष में आसीन होकर या तो उसके क़सीदे काढ़े जाते हैं या फिर धज्जियाँ उड़ाकर बिखेर दिया जाता है। क्या यह स्थिति मात्र बिहार की है? अन्य राज्यों की परीक्षाओं में ऐसा कभी नहीं होता? समस्याएँ दूसरों को बुरा कहकर, अपना कॉलर चढ़ा, कंधे उचकाने से नहीं सुलझ जातीं। खोट प्रणाली में ही है। पहले यह देखिये कि सिखा कौन रहा है? कहीं इन शिक्षकों की भर्ती, ऊपर से आई सिफारिश का परिणाम तो नहीं? तो फिर दोष किसका? जो योग्य हैं वो tution को धर्म की तरह निभा अपनी आमदनी बढ़ाने की कोशिश में जुटे हैं, कई ने कोचिंग संस्थान खोल डिग्रियाँ दिलवाने और बच्चों को मेरिट में लाने की जिम्मेदारी ले रखी है। इन पर रोक लगे, tution system बंद हो और विद्यालय उस शिक्षा को सुचारु रूप से सिखाने का कर्तव्य निर्वहन करे, जिस एकमात्र उद्देश्य से उसकी स्थापना हुई है। जिन बच्चों के माता-पिता उन्हें समय दे पाने या घर में पढ़ा पाने में सक्षम नहीं, उन बच्चों को विद्यालय में ही अतिरिक्त कक्षा प्रारम्भ कर सिखाया जाए और शिक्षकों को घंटों के हिसाब से उचित वेतनमान मिले। अंकों के लिए नहीं बल्कि ज्ञानार्जन के लिए पढ़ा जाए। जिन बच्चों की पढ़ाई में रूचि है, उन्हें कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं। जिनकी अभिरुचि नहीं है, उनमें जागृत की जाए और जिन्हें कुछ सीखने से मतलब ही नहीं; उन्हें और उनके माता-पिता को शिक्षा का उद्देश्य साफ़ तौर पर बताया जाए कि यह लड़के/लड़की वालों को लुभाने के लिए गलत माध्यम से प्राप्त कर लेने वाली विधा नहीं बल्कि जीवन यात्रा में हर समय साथ देने वाली योग्यता है, जिसे सीखना ही होता है। यदि नहीं सीख सकते तो कई ऐसी कलाएँ हैं, जिनमें माहिर होकर पैसा और नाम दोनों कमाया जा सकता है लेकिन गलत रास्ते पर चले बिना, बेसिक भाषा और संख्या का ज्ञान तो फिर भी होना ही चाहिए।
 
मेरिट के आधार पर महाविद्यालयों में प्रवेश क्यों हो? जिस विद्यार्थी की; जिस विषय में रूचि है, उसे चुनने औेर पढ़ने का अधिकार उसे मिलना ही चाहिए। सीट्स और स्टाफ दोनों बढ़ाये जाना उतना मुश्किल नहीं जितना कि विद्यार्थी के लिए उस विषय से जूझना है, जिसमें उसे कोई दिलचस्पी ही नहीं। क्या अंक वाकई योग्यता निर्धारित करते हैं या व्यावहारिक ज्ञान, कुशलता अधिक आवश्यक है? इसका उत्तर किसी भी क्षेत्र के उच्च पदों पर विराजमान अधिकारियों की अंकसूची खंगालने से मिल जाएगा। स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा, और बेहतर करने की ललक पैदा करती है, होनी भी चाहिए पर ये जिम्मेदारी स्वयं विद्यार्थी की है। यदि उसका मन पढाई में नहीं लगता तो असफल होने दीजिये उसे। जबरन टॉपर बनाकर क्या मिलेगा? असफलता से बड़ा और कोई शिक्षक नहीं। परिवार के सदस्य, राजनीतिक संपर्क या किसी भी प्रलोभन/दवाब के वशीभूत होकर अयोग्य को श्रेष्ठ सिद्ध किया जाना निहायत ही निंदनीय और शर्मनाक कृत्य है। यह भी विचारणीय है कि इस तरह आगे बढ़ने वाले लोग असल जीवन में सबसे पीछे ही खड़े मिलते हैं क्योंकि इन्होंने अपने बलबूते कभी कुछ अर्जित किया ही नहीं।
 
मुद्दा ये है कि हमें इन घटनाओं से हताश नहीं होना है बल्कि उन निर्दोषों के बारे में सोचना है जो इसकी बलिवेदी पर चढ़ाए गए हैं। किसी एक घटना के मद्देनजर पूरे प्रांत को शंका की दृष्टि से देखना उन मेहनती बच्चों और उनकी भावनाओं के साथ अन्याय है, जो इस तरह की मानसिकता के बीच रहते हुए भी अपनी जिद और उसूल के साथ जीना पसंद करते हैं। उनके अंकों को आप अपने शक़ के दायरे में किसी क़ीमत पर नहीं रख सकते। यदि धिक्कारना ही है, तो इस व्यवस्था को धिक्कारो; उन सबको लानत भेजो जो शिक्षा के मुँह पर कालिख पोतने वाली इस योजना में शामिल हुए लेकिन सब विद्यार्थियों को दोषी ठहराना उचित नहीं। क्या उनकी अंकसूची को आप इसलिए अविश्वास से देखेंगे क्योंकि वे एक ख़ास प्रांत से आये हैं? क्या देश का एक भी राज्य ऐसा है, जहाँ कभी नकल न हुई हो या जो शिक्षा-माफ़िया के चंगुल में न फंसा हो? हो-हल्ला करने से उपाय नहीं निकलते, यदि इस समस्या से छुटकारा पाना है तो इस शिक्षा-माफिया पर नकेल कसनी होगी और प्रारंभिक स्कूल से ही नकल करने वाले विद्यार्थियों और उनकी सहायता करने वालों के लिए पर्याप्त दण्ड के प्रावधान बनाने होंगे तथा जो कागजों पर बने हुए हैं उन्हें बेहिचक लागू करना होगा। अपराध और अपराधी वहीं शरण लेते हैं, जहाँ पकडे जाने का भय नहीं होता। दुर्दशा यूँ ही नहीं होती, इसे फलने-फूलने के लिए पर्याप्त पनाह दी जाती है।
 
अपनी जन्मभूमि से सभी को स्वाभाविक स्नेह होता है क्योंकि इससे हमारी कई स्मृतियाँ जुड़ी होती हैं। इसमें कुछ गलत नहीं। लेकिन मौका पड़ने पर हम भारतीयों को अपने-अपने प्रांत से बाहर निकलकर सोचना अत्यन्त आवश्यक है। आप फलाने प्रांत के हैं और वहाँ दंगे, आगजनी, लूटपाट, बलात्कार, हत्या जैसी जघन्य घटनाएँ हुईं, चोरी घोटाले हुए तो अधिकांश जन आहत होकर या तो मामले की सफाई देने में लग जाते हैं या फिर अपने राज्य से जुड़े सारे महापुरुषों की जीवनी सुनाने में व्यस्त हो जाते हैं। साथ ही ये अन्य राज्यों की बुराइयाँ ढूँढ-ढूँढकर दिखाने में सुकून का अनुभव करना भी नहीं भूलते। समस्या और निदान कहीं हाशिये पर पड़े रह जाते हैं और मौका देखते ही राजनीति हावी हो जाती है।
क्या किसी राज्य की शर्मनाक घटना से हम इसलिए शर्मिंदा नहीं होते क्योंकि वो हमारा नहीं? हम अपनी-अपनी सुविधानुसार सरकार को दोषी ठहराकर तसल्ली पा लेते हैं। वो सरकार जो समय-समय पर हम सबने ही चुनी है।
 
सोशल मीडिया पर ऐसे कई ग्रुप और पेज हैं, जहाँ सबने अपना-अपना झंडा गाड़ा हुआ है। वहाँ सिर्फ गर्व की ही बातें होती हैं और बुरी घटनाओं पर सफाई दी जाती है कि ऐसा तो इस राज्य में भी हुआ, उसमें भी होता रहता है। लेकिन यहाँ दूसरे प्रदेशों की प्रशंसा नगण्य रूप से ही दृष्टिगोचर होती है। क्या हमारी भारतीयता सिर्फ ओलंपिक और विश्वकप तक ही सीमित रह गई है? क्या हर राज्य की परेशानी हमारी अपनी नहीं? क्या हर प्रांत हमारा नहीं? उसके सुख-दुःख से हमें कोई फर्क़ नहीं पड़ता? यदि पड़ता है तो विचारणीय है कि ये आरोप-प्रत्यारोप, छींटाकशी और दूसरों को हेय दृष्टि से देखने की मानसिकता ने कब और कैसे हमारे समाज में जन्म ले लिया? आखिर ये 'प्रांतवाद' कौन फैला रहा है?
 
जो कमजोर है, हमें उसे ताकत देनी है, हाथ थाम उसकी सहायता करनी है और जो बुरा हुआ वो अब कहीं भी, कभी भी, किसी के भी साथ न हो, इस दिशा में क़दम उठाने हैं। जो घटना पकड़ में आ गई, सिर्फ़ वही हुई हो ऐसा बिल्कुल नहीं है। पर कहते हैं न, 'बद अच्छा बदनाम बुरा!'
 
'तोड़ना आसान है, जोड़ने में सदियाँ लग जाती हैं।' देश हमारा है, इसको सँभालने की जिम्मेदारी भी हमारी ही है। विश्व के मानचित्र पर इसकी उज्ज्वल छवि बनाए रखने के लिए हमें मिल-जुलकर सामूहिक प्रयास करने होंगें। हमारे घर की चिंता हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा भला!
'गर्व से कहो कि हम भारतीय हैं पर उसे आत्मसात कर महसूसना भी होगा!'
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चलते-चलते:
* IAS टॉपरों को लेकर भी जो बवाल मचा, उसने एक बार फिर 'आरक्षण' को कटघरे में खड़ा कर दिया। आर्थिक आधार पर सुविधा देना समझ में आता है पर 'विकास-युग' में जातिगत आरक्षण हमें सदियों पीछे धकेल देता है। आर्थिक रूप से कमजोर, मेधावी छात्रों को प्रोत्साहित करना प्रशंसनीय है लेकिन जो उनसे कहीं ज्यादा योग्य हैं उन्हें नकारा जाना उनकी प्रतिभा के साथ अन्याय है। 
* इधर हास्य के नाम पर जो बेहूदगी परोसी जा रही है, उसकी हदें अब टूट चुकीं हैं। लेकिन प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि किसी सेलिब्रिटी/भारतरत्न का मजाक क्यों बनाया गया, बल्कि इस बात पर चिंतन होना चाहिए कि क्या हास्य का यही रूप रह गया है? जहाँ तक खिल्ली उड़ाने और आहत होने की बात है, तो तीन वर्ष के बच्चे को केंद्र बिंदु बनाकर आप हँसेंगे तो उसे भी उतनी ही तकलीफ़ होगी जितनी किसी वयस्क को होती है। सम्मान पाने का अधिकार हर उम्र में सभी का है। भावनाओं का पद-प्रतिष्ठा से कोई सम्बन्ध नहीं होता।   
* रामवृक्ष जीवित हैं या मृत, इसकी पुष्टि जब होगी; होती रहेगी पर ध्यान देना होगा कि यदि जड़ से न उखाड़ा जाए तो हर मानसून में सूखे वृक्ष से भी कोंपलें फूटने लगतीं हैं। जंगल में कई छोटे पौधे भी होते हैं जो वृक्ष के गिरते ही अपने पाँव पसारना प्रारम्भ कर देते हैं।
* फिल्मों को लेकर सेंसर बोर्ड का रवैया इस बार भी समझ के बाहर है। द्विअर्थी संवाद, गालियों से भरे भद्दे गीत, बेहूदे नृत्य और अश्लील भाव भंगिमाओं से लबरेज़ निरर्थक फिल्में आँख मूँदकर पास कर दी जाती हैं और सामाजिक सरोकार से जुड़ी, तथ्यपरक फिल्मों पर आपत्तियाँ दर्ज़ होती हैं। जहाँ एक अच्छी और सत्य पर आधारित फिल्म आई नहीं कि इनकी बौखलाहट शुरू हो जाती है। क्या यह राजनीतिक दवाब में कार्य करने की विवशता है कि A- प्रमाणपत्र के बाद भी इतनी कैंची चलानी पड़ रही है? ख़ैर...तथ्यों  के पूर्ण रूप से स्पष्ट होने के बाद कुछ कहना अधिक उचित होगा। अभी सच खुलकर सामने नहीं आया है।
आइये, तब तक झुलसते मौसम की तपिश में सच की बारिशों और थोड़ी राहत का इंतज़ार करते हैं। :)

 


- प्रीति अज्ञात
 
रचनाकार परिचय
प्रीति अज्ञात

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