प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2016
अंक -35

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- ब्रेकअप के बाद

 
हवा तेज थी या मेरी बाईक इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था। पहाड़ी क्षेत्र में गाडी चलाते समय बहुत ध्यान रखना होता है। हवा से बाईक उड़ने लगती है और ऐसे में पास से कोई बड़ा वाहन निकले और बाईक की स्पीड कम न हो तो दुर्घटना हो भी सकती है। बड़े वाहन के नीचे बाईक घुस भी सकती है। लेकिन बाईक के पीछे बैठी सवारी कहे "क्या यार, तेज चलाओं ना।" तो विवेक खो जाता है। ऐसा मेरे साथ कई बार हुआ फिर भी दुर्घटना नहीं हुई।
 
हम लिव इन रिलेशनशीप में थे, जैसा कि सबके साथ होता है प्रेम, तकरार, झगड़ा, मजाक सब कुछ होता था। साथ रहते-रहते चार माह हो गए थे। वह अपने जॉब पर जाती है मैं अपने। शाम को साथ होता, घर में काम करते या होटल मे खाना खाते, कहीं लम्बी यात्रा में जाते और तब वह वाहन तेज चलाने का आग्रह करती।
 
एक दिन अज्ञात फोन आया। मैंने विश्वास नहीं किया। उससे सच-झूठ का पूछने का सवाल भी नहीं था, पर शक का कीड़ा तो घुस ही गया था। एक दिन दोपहर में वह सब्जी मंडी में दिख गई। हमें तो सब्जी की जरूरत नहीं फिर क्यूँ? वह खरीद नहीं रही थी बाईक के पास खड़ी थी, एक युवक खरीद रहा था। मैंने कहा, "चल रही है क्या?" उसने इशारे से कहा, "इसके साथ हूँ।" मैंने फिर कहा, "चल तुझसे बात करनी है।" उसने युवक की तरफ देखा, जो हमें नहीं देख रहा था पर कान हमारी बात पर ही लगे थे। मैंने फिर कहा, "चल तुझसे जरूरी बात करनी है।" उसने कहा, "जो कहना है यहीं कह दो।" मेरे फिर से आग्रह पर उसने युवक से पूछा, "जाऊं क्या?" युवक ने गर्दन हिलाकर कहा, "हाँ।"
 
मैंने उसको बाईक पर बैठे-बैठे ही समझाया, "हमारे रिश्ते के लिए, लम्बे रिश्ते के लिए यह ठीक नहीं, मेरे साथ रहती हो तो दुसरा रिश्ता बनाना ठीक नहीं, विश्वास कायम रहना चाहिए।" बहुत तरह की ऊँच-नीच बताई, वह हाँ-ना करती रही, कभी कुछ स्पष्टीकरण देती रही।
जब हम अपने क्वाटर पहुंचे, मैंने बाईक रोकी तो देखा की वह युवक भी पीछे आकर रूक गया है। उसने सिर के ईशारे से पूछा, "क्या हुआ?" इसने भी ईशारे से कहा, "कुछ नहीं।" मेरा मन उदास था, उसे खोने का डर समा गया था। मैं समझ गया था कि सबकुछ पहले जैसा नहीं रहा। ब्रेकअप हो गया है। मैंने बाईक स्टार्ट की और दोस्त के यहाँ चला गया। तीन-चार घंटे बाद वापस आया तो जैसी आशंका थी वही हुआ। वह अपना सामान, अटैची लेकर चली गई थी।
 
मेरा सिर दर्द करने लगा, नसें खिचनें लगीं, पुरानी बीमारी, डिप्रेशन हावी हो गई थी। उसका साथ था तो खुशी, हंसी-मजाक था, जिससे उदासी गायब थी लेकिन अब वह नहीं थी। पूरी रात नींद आती-जाती रही। मन में खयालात आते-जाते रहे। क्या कमी थी मुझमें, जो उसने मुझे छोड दिया? पर क्या अच्छाई थी दूसरे युवक में जो वो उसके साथ चली गई। रोजाना 8-9 बजे उठने वाला मैं 5 बजे सुबह ही उठ बैठने लगा। काम पर जाता बार-बार उंगलियां मोबाईल को छूतीं उसे कॉल करूँ फिर उसके नम्बर डिलिट कर दिए।
लेकिन जीवन मे कुछ भी डिलिट करना आसान नहीं। काश हमारा दिमाग भी ऐसा होता कि एक डिलिट और यादें गायब। दूसरे दिन व्हाट्स अप के एक ग्रुप से वापस उसका नम्बर सेव किया। दिमागी तकलीफ़ बढती ही जा रही थी। उदासी बढी, वजन कम होने लगा, काम में मन नहीं लगता, सोशल साईट दो-पांच मिनट चलाता पर कोई पोस्ट, स्टेटस नहीं डालता। किताब लेकर पढने बैठता या टी.वी. देखने लगता तो कुछ ही देर में ऊब जाता। 
प्रश्न यही बार-बार उठता कि उसने मुझे क्यों छोड दिया। रह-रहकर उसकी बातें याद आतीं। वैसे हमारे बीच रूठना-मनाना जैसी स्थिति कभी नहीं बनती थी। अब लगता है कि एक तरफा था सबकुछ। मैं ही उसके साथ था वो मेरे साथ नहीं थी।
 
मनोचिकित्सक के पास गया। खून जांच हुई। प्रश्नोत्तर हुए। दिनचर्या पुछी गई। खाना अच्छा लगता है या नहीं, डाईट कम तो नहीं हो गई, पेट साफ हो जाता है या नहीं, जबड़ा दर्द करता है या नहीं, मुड कैसा रहता है, वजन कितना घटा .....आदि। 100 दिन की  गोलियां दी गयीं। रात को एक प्रिगेलीन सुबह सेटलिन।
वह बाजार में दिख जाती है कभी-कभी उस युवक के साथ। हंसती, खिलखिलाती, मेरी तरफ देखती भी नहीं और मैं अब भी यह माने बैठा हूँ कि वह फिर मेरे जीवन में आएगी। एक महीना हो गया है ब्रेकअप को....लग रहा है युग गुजर गया। 
 

- भारत दोसी
 
रचनाकार परिचय
भारत दोसी

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