प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2016
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

बाल-वाटिका

खुशबू की सौगात

 
बैठ हवा के झूले आई
खुशबू की सौगात
 
बरसा पानी रिमझिम रिमझिम
सौंधी मिट्टी महके
पाकर खुशबू अमराई की
तोता टें टें चहके
खोल रही खुशबू की पुड़िया
फूलों की हर पांत
 
फैल गई घर भर में खुशबू
माँ ने सेंकी रोटी
अम्मा अम्मा मुझको दे दो
बोली मुनिया छोटी
अम्मा बोली आओ मुनिया
हम तुम खाएं साथ
 
टॉफ़ी, बिस्कुट, लौंग, पुदीना
या हो अमिया कच्ची
सबकी खुशबू होती प्यारी
लगती मन को अच्छी
पर माँ की ममता-सी मीठी
खुशबू की क्या बात
 
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मैं गुस्सा हूँ
 
जाओ जी, मैं गुस्सा हूँ
 
भैया कहते कान न खाओ
उधम मचाना ठीक नहीं
मम्मी कहती बाहर खेलो
करो शरारत और कहीं
मुझे भगाते सभी यहाँ से
मैं भी घर का हिस्सा हूँ
 
यह मत खाओ, उसे मत छुओ
हरदम मुझ पर रोक लगे
रूठूँ न तो और क्या करूँ
मेरा मन अब दूर भगे
अपने ही घर में बेगाना
एक निराला किस्सा हूँ
 
मुनिया रोती शोर मचाती
पाती शीशी दूध भरी
लेकिन जब मैं करूँ शरारत
मुझको फौरन डांट पड़ी
मुनिया को ही प्यार करें सब
पर मैं भी तो उस सा हूँ
 
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गरमी की छुट्टी में
 
नानी जी के गांव चलेंगे
हम गरमी की छुट्टी में
 
जाने कब से हिरनों जैसा
मन भर रहा कुलाँचें
हरियाले आंगन में जाकर
मोरों जैसा नाचें
दौड़ लगाएं पगडंडी पर
खेलें कूदें मिट्टी में
 
चढ़ें भैंस पर राजा जैसे 
घूमें बाग-बगीचे
बकरी भेड़ गधे की सेना
आए पीछे-पीछे
लगा ठहाके कर लूँ सारी
खुशियाँ अपनी मुट्ठी में
 
दोना भर-भर के गुड़ खाएँ
पिएँ दही व मट्ठा
तोड़-तोड़ कर आम रसीले
कर लें खूब इकठ्ठा
बड़ा मज़ा है खूब रसीली
इमली खट्टी-मिट्ठी में
 
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मैं जो होता जादूगर
 
जंतर-मंतर पढता हरदम
मैं जो होता जादूगर
 
फूंक मारता तो पापाजी
झट बन जाते बच्चे
चुपके से पेड़ों पे चढ़ते
आम तोड़ते कच्चे
 
फिर पापा-सा बनकर उनको
डांट पिलाता मैं जी भर
 
छड़ी घुमाता, अंधा कालू
पाता रोशन आँखें
उसके मन में भी उग आतीं
उम्मीदों की पाँखें
उसकी आँखों में बस जाता
रंग-बिरंगा जग सुन्दर
 
दीदी की सब रूठा-रूठी
मैं गायब कर देता
भैया की तीखी बातों में
शरबत मैं भर देता
मम्मी का मिर्ची-सा गुस्सा
कर देता मैं छू- मंतर
 
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बच्चों का अख़बार
 
अपने हाथों से लिख-लिख कर
बच्चों ने अख़बार निकाला
 
खबर छपी, राजू के पापा
ने उसको बेमतलब डांटा
शन्नो की चाची ने उसको
गुस्से में कल मारा चांटा
टूट गया काका का चश्मा
रवि ने जब फुटबाल उछाला
 
मुन्नू पाता दूध मलाई
मुनिया को बस मिलती टाफी
रसगुल्लों की चोरी करके
सोनू जी मांगी माफ़ी
पिंजड़ा खुला देख उड़ भागा
माँ ने था जो तोता पाला
 
टीचर से पाई शाबाशी
रामू के छोटे भैया ने
तीन बाल्टी दूध दिया है
कल्लू की भूरी गैया ने
चार पदक पाकर राहुल ने
कर डाला है काम निराला

- डॉ. फ़हीम अहमद
 
रचनाकार परिचय
डॉ. फ़हीम अहमद

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बाल-वाटिका (1)