हस्ताक्षर रचना
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2016
अंक -41

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ख़ास-मुलाक़ात

पानी रुक जाए तो उस पर काई जम जाती है: आशा शैली

 
 
 
आज हम ‘ख़ास मुलाक़ात’ के तहत बात करेंगे वरिष्ठ साहित्यकार व ‘शैल-सूत्र’ की संपादक आशा शैली जी से, जिन्होंने अपने जीवन का एक लम्बा अरसा साहित्य को अर्पित किया है। आशा जी कहने को तो उम्र के सालों का 73 वाँ आंकड़ा पार कर चुकी हैं लेकिन इनमें फूर्ती, जोश और जज़्बा आज के युवाओं से रत्ती भर भी कम नहीं है। अभी तक इनकी विभिन्न विधाओं की 22 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं तथा साथ ही ये 9 वर्षों से ‘शैल-सूत्र’ नामक एक साहित्यिक पत्रिका का संपादन करती आ रही हैं। साहित्य और निजी जीवन के कई मुद्दों पर ‘हस्ताक्षर’ के प्रधान संपादक के. पी. अनमोल जी और आशा शैली जी के बीच हुई बातचीत आप सभी के लिए प्रस्तुत है-
 
 
के.पी. अनमोल - आपका जन्म रावलपिण्डी (पाकिस्तान) का है। जन्म के समय की परिस्थितियाँ और बचपन की कुछ यादें जानना चाहेंगे।
आशा जी- मैं जिन स्थितियों से गुज़री हूँ, उनकी कथा कहना भी अजीब सी बात है। सच कहूँ तो मेरा संघर्ष जन्म के साथ ही शुरू हो गया था। माँ के अनुसार 'मेरे माता-पिता के विवाह के ग्यारह मास बाद ही, लगते श्रावण में मेरा जन्म हो गया था। मेरी दादी सौतेली थीं, अतः परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि माँ-पिता जी को घर छोड़कर रावलपिण्डी अपने ताऊ के बेटे अर्थात अपने बड़े भाई के पास आना पड़ा। अभाव झेलते नासमझ और कम उम्र दम्पति को आने वाले दस महीने में दूसरी कन्या का मुख देखना पड़ा। इसलिए माँ का दूध भी नसीब न होने के कारण मैं अपच की रोगी रहती थी। माँ के दूसरे प्रसव के समय सफ़ाई करने के डर से दादी रात को मुझे भूखा रखतीं।’ भूखे पेट सोना तो बड़ों के लिए भी कठिन होता है, फिर नौ-दस मास का बच्चा कैसे सोता और क्यों सोने देता?
अस्तु पिता जी धीरे-धीरे व्यवस्थित और आत्मनिर्भर होते गए। चार वर्ष अच्छे गुजर गए। उन दिनों पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चे को स्कूल में भर्ती नहीं किया जा सकता था। मैं बहुत नटखट और शैतान थी। पिताजी ने मेरी उम्र में दो वर्ष बढ़ाकर स्कूल में मेरा नाम लिखवा दिया, ‘सुदेश कुमारी’। पर सुदेश कुमारी स्कूल नहीं जा सकी, क्योंकि पिता की लाडली बेटी नौकर को धमकाकर कभी मौसी के घर चली जाती और कभी अपनी सुन्दर-सी फ्रॉक को अंगुलियों से फाड़ देती और कभी अपनी दो घोड़ों वाली बग्घी में से अपने ज़री के जूते ही फेंक देती और रोते-रोते घर वापस लौट आती। हाँ, कभी-कभार स्कूल जाने के कारण थोड़ी हिन्दी समझने लगी थी और फिर इसी बीच दंगे भड़कने शुरू हो गए।
 
के.पी. अनमोल- मायका हर युवती का एक अस्थायी बसेरा होता है। समझ आते आते भरी-पूरी जानी-पहचानी सी अपनी दुनिया छोड़कर एक नयी जगह जाना होता है। ख़ुद एक दुनिया बनानी और संवारनी होती है। आपकी बनायी दुनिया के बारे में कुछ बताएँगे?
आशा जी- साढ़े तेरह वर्ष की आयु में मैं एक सुन्दर अनाथ युवक की पत्नी बना दी गई और सुदेश कुमारी अपने से नौ वर्ष बड़े पति के पास श्रीमती मोहन लाल बनकर शिमला की ऊँची पहाड़ियों पर जा बसी। अनाथ युवक मोहन लाल ने दूसरों के सहारे गुज़ारे अपने जीवन में स्नेह, प्यार और अपनापन देखा ही नहीं था, सो गुड़िया-सी अल्हड़ और चंचल पत्नी को अपनी आशाओं का प्रतिरूप देखकर ‘आशा’ नाम दे दिया।
पहली बार किसी ने प्यार से गले लगाया। किस रूप में? यह बिल्कुल दूसरी बात है। बचपन में देखा था लाड़-प्यार, किन्तु बचपन के दो-तीन साल किसे याद रहते हैं। होश में आने के बाद तो एक जिम्मेदार गृहिणी ही देखी, जिसे बस हुक्म मानना है।
 
के.पी. अनमोल- साहित्य से लगाव कब और कैसे हुआ? कलम को जज़्बातों को बयां करने का ज़रिया कब बनाया?
आशा जी- एक थीं कमला बिष्ट, हमारी क्राफ्ट टीचर। असल में मुझे कविता के लिए जो चुनौती मिली, जाने-अनजाने सम्भवतया उसका कारण यही कमला बिष्ट थीं।
हुआ यूँ था कि ललित महिला विद्यालय (हल्द्वानी) में एक कविता प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। मैंने भी उसमें कविता सुनाई, जिसे कोई स्थान नहीं मिला। उन दिनों अतुकान्त कविता को कविता तो कोई कहता नहीं था और मैंने अतुकांत ही लिखा था। बाद में कमला बहन जी ने क्लास में आकर मुझसे कहा, "अगर
तुम्हें कविता सुनानी थी तो मुझसे क्यों नहीं कहा? मैं तुम्हें अच्छी-सी कविता लिखकर दे देती और तुम्हें पुरस्कार मिल जाता।"
मैं नहीं जानती कि मेरे मुख से जवाब कैसे फूटा क्योंकि उन दिनों मैं कम ही बोलती थी (वैसे आज बहुत बोलती हूँ) और बड़ों के सामने तो बोलने का प्रश्न ही नहीं था, अस्तु! मैंने जो उत्तर उन्हें दिया वह मुझे आज भी याद है, मेरे मुख से निकला, "मुझे नहीं चाहिए किसी का उधार। जो करना है मैं खुद करूँगी।"  इस बात पर मुझे इतनी जोर का तमाचा कमला बहन जी के हाथ से खाना पड़ा कि आज तक याद है। यह घटना जब भी याद आती है मेरा हाथ अनायास ही गाल पर चला जाता है। मेरे घर पहुँचने से पहले ही मेरी शिकायत माँ तक पहुँच गई थी। घर में मार पड़ी सो अलग। दोष था बड़ों के सामने मुँह खोलने का, परन्तु कहीं न कहीं वह फाँस खटकती रही और संवेदना पलती रही।
 
के.पी. अनमोल- आपके नव रचनाकार को किस तरह का साहित्यिक माहौल मिला? उस दौर की यादों को टटोलते हुए जानना चाहेंगे कि शुरूआती प्रकाशन कैसे हुए? किस तरह के लोग मिले, सहयोग मिला?
आशा जी- बचपन की लिखी एक कविता के बाद कभी कविता का नाम नहीं लिया। फिर विवाह के बाद पता नहीं कब कविता लिखने लगी और ताई की भोली, माता-पिता की सुदेश और पति की आशा, ‘आशा शैली’ हो गई। काव्य की धारा गीत, ग़ज़ल, लघुकथा तक फैल गई तो छोटे अनुज केवल कृष्ण ढल; सम्पादक-प्रकाशक लघुभारत सा. ने अम्बाला छावनी का पता दिया और डॉ. महाराजकृष्ण जैन जी के मार्ग-दर्शन में मैंने कहानी लेखन का कोर्स पूरा किया। हाँ, इस सब में मेरे पति ने कभी बाधा नहीं दी।
 
के.पी. अनमोल- कुछ लोग जो आपके जीवन में बहुत नज़दीक रहे। जिनसे ज़िंदगी को जीने का सलीक़ा मिला, वक़्त से क़दम मिलाकर चलने का हौसला मिला, अकेले खड़े होकर कारवाँ जुटाने का साहस मिला। ख़ास पारिवारिक जन, गुरु या कोई अन्य जिनसे आपने सीखा, जो आपका आदर्श रहा। उन व्यक्तित्वों पर प्रकाश डालेंगे?
आशा जी- मेरा भाई स्व.केवल कृष्ण ढल, डॉ. महाराज कृष्ण जैन और ज्ञानचन्द सुहेल। हाँ, उर्दू ग़ज़ल के मामले में इनका कोई दख़ल नहीं है। डॉ. जैन के सम्पर्क में आने से कहानी की यात्रा में नये पड़ाव आए। पति देव ने शुरू में मेरे लेखन को मज़ाक के तौर पर लिया था, परन्तु धीरे-धीरे उनका सहयोग मिलने लगा। खण्ड विकास अधिकारी श्री ज्ञानचन्द सुहेल का पदार्पण हमारे संसार में हुआ।
एक दिन, एक छोटे-से लकड़ी के टुकड़े पर मैंने रंगों से एक छोटी-सी गुजरिया बनाकर घर के एक कोने में सजा दी। (यहाँ मैं यह स्पष्ट करना चाहूँगी कि चित्रकला से मुझे बचपन से ही लगाव रहा है। कविता लिखने के बारे में कभी सोचा नहीं परन्तु रंगों से खेलने की इच्छा सदा ही बलवती रही है)। सुहेल जब क्षेत्र में निरीक्षण के लिए दौरे पर आए तो उन्हें घर पर आना ही था। भोजन भी वहीं करना था और हमारे साथ थोड़ा समय भी गुज़ारना था। जब वे कक्ष में, जहाँ वह रंगीन गुड़िया रखी थी, आए तो दरवाजे पर ही ठिठक गए। क्योंकि भीतर आने पर सबसे पहले नज़र उसी गुजरिया पर पड़नी थी। सुहेल ने एक नज़र गुड़िया पर डाली और फिर पलटकर मुझसे पूछा, "यह किसने बनाई है?"
बड़े गर्व से कंधे उचका कर मैंने उत्तर दिया, "मैंने।"
"मर गई तू। अरे जाकर शीशे में अपनी शक्ल तो देख। तू बनाएगी ऐसी सुन्दर कलाकृति? पागल।"
"नहीं भाई साहब, इसी ने बनाई है।" पीछे खड़े मेरे पति ने उत्तर दिया
"मुझे यह सब नहीं आता और मेरे पास समय भी तो नहीं है।"
अब सुहेल ने मुझे सिर से पैर तक कई बार घूरकर देखा, तो मैं घबरा गई, परन्तु फिर वे हँस दिए, "अच्छा! तो अब समझ में आया तुम्हारे क्रोध का कारण।" मैं रुआँसी हो रही थी और अभी भी उन्हें हैरान-परेशान-सी देख रही थी, "अरे जा न! चाय लेकर आ। फिर बताता हूँ।" कहकर उन्होंने मुझे वहाँ से भगा दिया और मेरे पति से बातें करने लगे।
जब मैं चाय लेकर आई तो उन्होंने बड़े स्नेह से मुझे अपने पास बैठाकर समझाया, "देखो! तुम्हारे भीतर एक कलाकार छिपा बैठा है, जो अभिव्यक्ति चाहता है। दरअसल तुम्हें जो इतना गुस्सा आता है, उसका कारण यही कलाकार है। तुम जो कहना चाहती हो, वह कह नहीं पातीं। शायद तुम्हें कहने की कला नहीं आती, इसीलिए तुम खीजती हो। अपने मन की बात कहने की कला सीखो, देखो तुम्हारा स्वभाव कितना शान्त हो जाएगा।"
मेरे पति भी बड़े ध्यान से उनकी बातें सुन रहे थे। सुहेल ने उन्हें भी कई बातें समझाईं। अगली बार निरीक्षण पर जब वे हमारे गाँव ‘गौरा’ आए तो एक छोटी-सी आरी ले आए, साथ ही अपने बनाए कुछ चित्र भी लाए थे। अब मुझे पता चला कि वे स्वयं भी बहुत अच्छे चित्रकार थे। दुकान पर चाय आदि सामान प्लाइवुड की पेटियों में आता था। पेटियाँ टूट-फूट जातीं और ईंधन के ही काम आतीं। सुहेल ने उस आरी से टूटी पेटियों के बीच में से साफ-साफ टुकड़े निकाले और मुझे दो विषय दिए चित्र बनाने के लिए। यह भी कह दिया कि मैं जब दोबारा आऊँ तो ये चित्र बने होने चाहिए। बस जुट गई मैं अपने खाली समय का सदुपयोग करने में। कपड़ों पर चित्रकारी करने के लिए मेरे पास फेब्रिक रंग थे ही, मैंने उनका उपयोग प्लाई के टुकड़ों पर चित्र बनाने के लिए किया। एक चित्र का विषय दिया गया था, एक ऐसी गाँव की स्त्री, जिसका पति परदेस में है और वह पति को पत्र लिख रही है। चित्र बने। अधकचरी कविता की शुरुआत तो हो ही चुकी थी, अब चित्रकला भी साथ कदम मिलाने लगी तो कविता पीछे छूटने लगी। मैं हर फेंकी जाने वाली वस्तु को उठाकर उसमें सौंदर्य खोजती। लगभग छः महीने बाद एक दिन सुहेल फिर आए। इस बार वे सरकारी दौरे पर नहीं थे। टूटी प्लेटों, लकड़ी और चकले पर, गाड़ी की हैडलाइट के शीशों पर बनी कलाकृतियों को देखकर उन्होंने मेरी पीठ थपथपाई। इस बार वे दो दिन रहे, तो अधिकतर मेरी कविताएँ-ग़ज़लें सुनते और सुधारते रहे।
 
के.पी. अनमोल- आपका आदर्श रचनाकार जिसने कलम पकड़ने को उकसाया। और जिसे पढ़कर बार-बार पढ़ना चाहा।
आशा जी- उपन्यासकार कुशवाहा कान्त, गोविन्द वल्लभ पंत, ‘धरती धन न अपना’ के लेखक जगदीश चन्द्र (जिन्हें हम वैद्य जी कहते थे), राहुल सांकृत्यायन और मीरा।
 
के.पी. अनमोल- किसी महान साहित्यिक शख्सियत के साथ ऐसा कोई खट्टा-मीठा वाकया जो आप हमारे पाठकों के साथ साझा करना चाहेंगे।
आशा जी- साहित्यिक शख्सियतों से तो मुझे कहीं खींच-तान नहीं करनी पड़ी। हाँ, कुछ सम्पादक और प्रकाशक नाम के जीवों से अवश्य टक्कर लेनी पड़ी। इनमें से एक नाम आकाशवाणी शिमला के प्रस्तोता अनूप महाजन का भी है। पर वे अधिक समय तक टिक नहीं पाए।
 
के.पी. अनमोल- एक कथाकार, कवयित्री, ग़ज़लकार, गीतकार, लेखिका, अनुवादक, संपादक, प्रकाशक और उस पर सिवाया ये कि सब अपने आपमें समर्थ। किस रूप में याद किया जाना चाहेंगी?
आशा जी- इसका निर्णय मैं नहीं, समय करेगा।
 
के.पी. अनमोल- समय का जब वज्रपात होता है तो इंसान का खड़े रह पाना मुश्किल हो जाता है। अमूमन लोग टूटकर बिखर जाते हैं। आपके अंदर वह कौनसी संजीवनी बूटी थी जिसने न केवल आपको थामे रखा। बल्कि इस तरह प्राण फूँके कि आपको सैकड़ों वर्षों तक याद किये जाने के क़ाबिल बना दिया।
 
आशा जी- आस्था! मुझे लगता है कि जब हम किसी के प्रति भी आस्थावान होते हैं तो वह व्यक्ति नहीं, हमें हमारी आस्था बल देती है। मेरी माँ ने बचपन से ही हमें गीता पढ़ना सिखाया था। कोई माने या न माने, गीता हमें दृष्टा बनने का सामर्थ्य अवश्य ही देती है। बस वही दृष्टा भाव शायद मुझे बल देता रहा। यहाँ मैं एक बात और कहना चाहूँगी और वो यह कि सनातन (मैं हिन्दू नहीं कहूँगी) धर्म, अपने आप में जीने की एक कला है। अनासक्ति से किया गया कोई भी काम आपको बाँधता नहीं है। यही सनातन धर्म है, मैंने इसे समझा और उसमें विचरण किया। सम्भवतया यही मेरा सबसे बड़ा सम्बल रहा है।
 
के.पी. अनमोल- एक संपादक से पूछना चाहूँगा कि हिन्दी के साहित्यिक भविष्य के बारे में वे क्या राय रखती हैं? नए रचनाकारों से क्या उम्मीदें हैं? नई पत्र-पत्रिकाओं से क्या अपेक्षाएँ हैं?
आशा जी- आपको हिन्दी साहित्य का भविष्य क्यों संकट में लगता है? मुझे तो कभी भी नहीं लगा। आज भाषा का स्वरूप अवश्य बिगाड़ा जा रहा है, फिर भी मेरा मानना है कि हिन्दी साहित्य का भविष्य उज्ज्वल ही रहेगा। मुझे भी पत्रिका शुरू करते समय कहा गया था, बेकार है, उलझ रही हो.....वगैरह-वगैरह। पर आज सब मान रहे हैं और मेरी लगन की दाद दे रहे हैं। इसे आप क्या कहेंगे?
नए रचनाकार तो नए ही होते हैं, अभ्यास और मेहनत समय के साथ उन्हें परिपक्व बना देता है। अपना शुरुआती दौर का लिखा आज हमें इतना बचकाना लगता है कि उसे देखकर हँसी आती है। हाँ, नई पत्रिकाओं से कभी-कभी निराशा तब होती है जब वे धन कमाने के उद्देश्य को सामने रखकर साहित्य को बलिवेदी पर टांग देती हैं।
 
के.पी. अनमोल- ‘शैल-सूत्र’। पत्रिका नहीं कहूँगा......एक पुल जिसके माध्यम से पहाड़ी जीवन और साहित्य को सबके सामने लाने और आपसी नजदीकियाँ बढ़ाने का सपना संजोया गया था। 9 साल के सफ़र के बाद ख़ुद को स्थापित कर चुकी है। आगे की क्या योजनाएँ हैं?
आशा जी- पत्रिका अपने सफर पर रवां-दवां है। आपने इसे पुल का नाम दिया अच्छा लगा। मेरा उद्देश्य यही था कि कम से कम पर्वतीय संस्कृति आपस में एक-दूसरे से परिचित तो हो। आज वह उद्देश्य किसी हद तक पूरा हुआ। कम से कम दो पहाड़ी राज्य एक-दूसरे को पहचानने लगे हैं। किसी हद तक जम्मू-कश्मीर को भी साथ मिलाने की चेष्टा कर रही हूँ। हलका ही सही असम में भी घुसने की चेष्ठा की है। इस तरह एक से दूसरे शैल का सूत्र जुड़ता चला जा रहा है। जो शुभ लक्षण है। आगे तो भविष्य के गर्भ में है। हमारी योजना बनाने से कुछ नहीं होता।
 
के.पी. अनमोल- एक लम्बी साहित्यिक यात्रा, हज़ारों रचनाएँ, ढेर सारी किताबें और सफ़र जारी है। सफ़र के दरमियान पानी कितना ही पियो, प्यास बनी ही रहती है। कोई उपलब्धि जिसे पाना शेष हो।
आशा जी- प्यास तो प्यास है। थोड़ी-थोड़ी देर बाद लगती ही है। आप चाहे सफर में हों या घर में।
 
के.पी. अनमोल- शैल-सूत्र, कवि सम्मलेन, इन्टरनेट पर बराबर सक्रियता। इस उम्र में भी इतनी ऊर्जा। लाती कहाँ से हैं?
आशा जी- सक्रियता ही जीवन है। पानी रुक जाए तो उस पर काई जम जाती है।
 
के.पी. अनमोल -पिछले दिनों आपको उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री महोदय ने अपने हाथों से प्रदेश के प्रसिद्ध ‘तीलू रौतेली’ सम्मान से नवाज़ा है। बधाई इस उपलब्धि के लिए। कुछ कहना चाहेंगी इसके बारे में?
आशा जी- मेरे प्रकरण में भाग्य अपनी भूमिका निभाता लग रहा है, अन्यथा आज इस आपाधापी और जोड़-तोड़ के माहौल में तीलू रौतेली जैसा राज्य पुरस्कार बिना किसी सिफारिश के मेरी झोली में कहाँ से आ पड़ता।
 
के.पी. अनमोल- हमारे पाठकों के लिए कोई संदेश?
आशा जी- चलते रहो, चलते रहो। सोच सकारात्मक रखो। सारा जग अपना है। पराया कोई है ही नहीं।
 
के.पी. अनमोल- आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा। पत्रिका को अपना कीमती समय देने के लिए शुक्रिया। शुभकामनाएँ।
आशा जी- शुक्रिया!

- के. पी. अनमोल
 
रचनाकार परिचय
के. पी. अनमोल

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