जून 2016
अंक - 15 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

रचना-समीक्षा

अकेलेपन और संबंधों के टूटन का वेदनामय प्रगीत है 'आखिरी दस्तक' : के. डी. चारण

 

पांच पात्र, जिंदगी की उठापटक वाला विस्तृत फलक जिसमें चारों ओर शोर है लेकिन सब कुछ अकेलेपन और खीझ से आवृत। कुछ ऐसे ही वातावरण में घटित कहानी है 'आखिरी दस्तक'। हस्ताक्षर के पिछले अंक में प्रकाशित डॉ. हरिदास व्यास लिखित 'आखिरी दस्तक' कहानी मनोविज्ञान के कई शब्दों के आस-पास अपने कथ्य का बुनाव रचती है जिसमें तनाव, अवसाद, दुश्चिंता, कुंठा जैसी स्थितियां आती है। कहानी का मुख्य पात्र 'मैं' इन सारी स्थितियों के बीच ही उलझता-सुलझता है। उसमें अकेलापन और परिवार की टूटन इस कदर हावी है कि वह अपनी जिंदगी के मूलभूत फैसले तक लेने के लिए किसी और पर निर्भर रहता है। वह स्वीकार भी करता है कि उसके पास निर्णय क्षमता है मगर वह इन विचलन वाली परिस्थितियों में स्वयं निर्णय न लेकर श्रुति पर यह काम छोड़ देता है। हो सकता है वह अपने द्विधात्मक संघर्ष से हार गया हो या श्रुति के प्रति उसके मन में कोई अनुराग बीज उपज रहा हो?

'आखिरी दस्तक' का सबसे सशक्त पक्ष इसकी प्रवाहशीलता और पटाक्षेप है। कहानीकार ने घटनाओं को यति-गति इस प्रकार दी है कि वे एक सार गति में प्रवाहमान है। एक-दो जगह ऐसा आभास ज़रुर होता है कि मानो कहानी की घटनाएं ठहर-सी गयी हैं मगर कहानीकार ने उस घटना के पार्श्व में जो वातावरण बुना है, वह पाठक के अवचेतन से यक-ब-यक घटनाएं खींचकर उसका प्रवाह पुनः दुरस्त कर देता है।

पश्चिम के बुद्धिवाद ने भारतीय मध्यमवर्गीय परिवार के ताने-बाने में कुछ ऐसी कलुषित मनोवृतियाँ भर दी हैं जो मैकाले व उनके सरपरस्त अंग्रेज़ आका अपनी शिक्षा नीतियों से नहीं भर पाए थे। हालांकि पश्चिम में बुद्धिवाद व स्वच्छंद जीवन तंत्र कुंठाओं से इतना ग्रस्त नहीं है, जितना भारतीय मध्यमवर्गीय परिवारों में देखा जाता है। वहाँ अलगाव के बाद सामान्यतः स्वतंत्रता रुपी एक ऐसी परिस्थिति काम करती है जो उन लोगों को कुंठाओं से मुक्त करती है लेकिन भारत में पति-पत्नी अलगाव के बाद भी एक-दूसरे को पूर्णरूपेण स्वतंत्र नहीं कर पाते है और उनमें एक-दूसरे के लिए भीतर ही भीतर जो कुंठा और ईर्ष्या उपजती है, वह सबसे ज्यादा खतरनाक होती है। इस कहानी के पात्र 'मैं' और 'सुनंदा' भी इसी बुद्धिवाद के कुचक्र में फंसे हुए से जान पड़ते हैं। उन्हें लगता है कि 'मुक्ति' बेहतर है लेकिन वे एक दूसरे को सही अर्थों में मुक्ति दे कहाँ पाते है???

माता-पिता के तनाव भरे रिश्तों के बीच उनकी संतान का क्या हश्र होता है? कहानीकार ने 'हेमू' के माध्यम से उसे भी बखूबी उकेरा है। वह स्वयं को कहीं भी फिट बिठा पाने में असमर्थ है। उसका पिता हालांकि हर बार अपना प्रेम उसके प्रति जाहिर करने को अधीर हो उठता है लेकिन कर नहीं पाता है क्योंकि उसे लगता है कि अब ऐसा करना महज बुढ़ापे में सहारे की लाठी ढूंढने जैसा ही होगा, इसलिए वह हर बार मन मसोस कर रह जाता है। 'मैं' को 'हेमू' का गुटखा चबाना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता मगर वह उसे मना भी नहीं करता, शायद उसे लगता है कि इससे बच्चे की स्वतंत्रता/स्वच्छन्दता को धक्का लगेगा और वह महज खीझकर रह जाता है।

कहानी के पटाक्षेप के साथ कहानीकार पाठकों को एक वैचारिक डोज़ देता है। जैसे ही कहानी नाटकीय मोड़ पर खत्म होती है, पाठक को एक दम से सन्न कर देती है और वह फ़्लैश बेक में जाकर कहानी की परिणति जानना चाहता है लेकिन उसके हाथ लगती है टूटी हुई व्यथाएं, टूटा हुआ वातावरण, संबंधों की टूटन और उन पर बनता एक नया रिश्ता। यानि जहाँ कहानी खत्म होती है, वहां से एक नई कहानी का प्रस्फुटन भी होता है।

इस कहानी का कथ्य ज़रुर निर्मल वर्मा ट्रेंड का है लेकिन भाषा व शिल्प के आधार पर यह इससे थोड़ी जुदा है। असल में ऐसे कथ्य की कहानियां घटनाओं की बनिस्बत मनोविज्ञान की शब्दावली को सरलीकृत करती ज्यादा नज़र आती हैं मगर 'आखिरी दस्तक' में कहानीकार ने इसके मनोवैज्ञानिक पक्ष को घटनाओं के सरलीकरण से जोड़कर इसे सहज पाठ्य बनाया है।
वहीं इस जात की कहानियों में नेरेटर भी हावी रहता है जो सामान्य पाठकों को बोझिल तो लगता ही है और कहानी के आकार को भी रबर की तरह खींचकर लम्बा कर देता है। रचनाकार ने इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए संक्षिप्त व सरलतम रूप में एक सर्वग्राह्य कहानी बुनी है। न सिर्फ सामान्य पाठकों के लिए बल्कि मनोविश्लेश्नात्मक तत्वों की खोजबीन व विचार विश्लेषण करने वाले पाठकों के लिए भी यह कहानी भरपूर मात्रा में मानसिक खुराक उपलब्ध करवाती है।




आप समीक्ष्य कहानी 'आखिरी दस्तक' इस लिंक पर जाकर पुनः पढ़ सकते हैं

http://www.hastaksher.com/rachna.php?id=403 


- के.डी. चारण