प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2016
अंक -51

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

गीतों के छंद हो गये

आँखों से छलके मोती, गीतों के छंद हो गये।
अधरों पर हास खिल उठे, ऐसे स्वच्छन्द हो गये।।

नींद नहीं आँखों में, कसक उठे रातों में,
शिथिल गात पीत हो गये।
प्राण टंगे शाखों पर, पीर खिली पातों पर,
क्रन्दन की रीत हो गये।
सुधियों ने थपकी दे दी, भाव घन आनन्द हो गये।
आँखों से छलके मोती, गीतों के छंद हो गये।।

पुरवा कुछ-कुछ गाती, आँचल है सरकाती,
अँगना में शोर मचाती।
आती है साथ लिए, सुधियों की सँझवाती,
रैना की भोर न आती।
आएँगे प्रियतम कैसे, द्वार सभी बंद हो गये।
आँखों से छलके मोती, गीतों के छंद हो गये।।

झींगुर उत्पात करें, जाने क्या बात करें,
रात-रात कर रहे किलोल।
एकाकी जागूँ मैं, कातर सी भागूँ मैं,
काँपे तन-मन जाये डोल।
रजनी बैरन चिढ़ा रही, सुरभित मकरन्द हो गये।
आँखों से छलके मोती, गीतों के छंद हो गये।।

सब कुछ तो छोड़ दिया, रस का घट फोड़ दिया,
फिर कैसी दहकती अगन।
सबसे है मुँह मोड़ा, तुझ संग नाता जोड़ा,
तेरे संग लग गयी लगन।
नेह बिना बर्तिका जली, उजियारे मन्द हो गये।
आँखों से छलके मोती, गीतों के छंद हो गये।।

तन आकुल मन व्याकुल, क्या राधा क्या मीरा,
सबको है साथ जी लिया।
पारस की चाह जिसे, क्या सोना- क्या हीरा,
'विकल' तेरा नाम ही लिया।
मन जब रसखान हो गया, चहुँ दिशि आनन्द हो गये।
आँखों से छलके मोती, गीतों के छंद हो गये।।


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नव सृजन के गीत गाओ

स्वर मिलाकर, नव सृजन के गीत गाओ।
फिर, तिमिर के वक्ष पर दीपक जलाओ।।

भावना के मेह, सारे छँट चुके हैं,
कूप भी सब नेह के, अब पट चुके हैं।
फिर समन्दर के हृदय में, ज्वार की लहरें उठाओ।
फिर, तिमिर के वक्ष पर दीपक जलाओ।।

चाँदनी से, चाँद अब दहने लगा है,
केतु के घर, सूर्य अब रहने लगा है।
सौरमण्डल में, जतन से दीप्त, नव तारा उगाओ।
फिर, तिमिर के वक्ष पर दीपक जलाओ।।

वेदना बाज़ार में बिकने लगी है,
चेतना में नग्नता दिखने लगी है।
मनुजता के भाल पर, पुरुषार्थ का टीका लगाओ।
फिर, तिमिर के वक्ष पर दीपक जलाओ।।

शाख़ पर आते ही कलियाँ कट रही हैं,
सृष्टि की संभावनाएँ घट रही हैं।
भीरुता को त्याग, साहस-शक्ति का परचम उठाओ।
फिर, तिमिर के वक्ष पर दीपक जलाओ।।

क्रूरता हर हृदय में पलने लगी है,
भंगिमा अब न्याय की खलने लगी है।
राम का आदर्श- करुणा बुद्ध की, उर में सजाओ।
फिर, तिमिर के वक्ष पर दीपक जलाओ।।

कलुष-हारिणि, स्वयं मैली हो रही है,
हर अमिय संज्ञा विषैली हो रही है।
कर भगीरथ यत्न, शिव-संकल्प की सुरसरि बहाओ।
फिर, तिमिर के वक्ष पर दीपक जलाओ।।


- डॉ. राम ग़रीब विकल
 
रचनाकार परिचय
डॉ. राम ग़रीब विकल

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