हस्ताक्षर रचना
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2016
अंक -41

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

साक्षात्कार

अब न साहित्य की कोई कद्र है और न साहित्यकार की ही कोई मर्यादा: डॉ. अशोक 'गुलशन'

 

डॉ.अशोक ‘गुलशन’ जी की साहित्यिक यात्रा को पढ़कर ही इनकी विशाल शख्सियत का अंदाज़ा स्वत:ही होने लगता है। गुलशन जी, हिन्दी तथा अवधी भाषा में प्रायः सभी विधाओं में लेखन करते हैं। देश-विदेश में इनकी चार हजार से भी अधिक रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। विभिन्न आडियो/वीडियो कैसेट्स/सी.डी. में इनके लिखे गीत/ग़ज़लें संकलित की गई हैं। आकाशवाणी लखनऊ, जनसंदेश टी.वी. तथा नेपालगंज के एफ. एम. चैनलों पर आपकी रचनाओं का प्रसारण हो चुका है। आप मंच के कवि भी हैं एवं आठ सौ अखिल भारतीय कवि सम्मेलन एवं मुशायरों में काव्यपाठ कर श्रोताओं के ज़हन में अपनी जगह बना चुके हैं। वर्ष 1978 से सतत लेखन तथा वर्ष 1986 से सतत प्रकाशन में व्यस्त गुलशन जी सौ से भी अधिक पुस्तकों की समीक्षा कर चुके हैं एवं लखनऊ वि.वि. द्वारा 'डॉ.अशोक गुलशन का हिन्दी साहित्य में योगदान'‘ विषय पर एक शोध छात्रा द्वारा एम.फिल. भी की गई है। विगत 28 वर्षों से उ.प्र. सरकार के अधीन प्रभारी चिकित्साधिकारी (आयुर्वेदिक) के पद पर कार्यरत गुलशन जी से, प्रीति 'अज्ञात' की मुलाक़ात जनवरी माह में थाईलैंड में हुई। आइये पढ़ते हैं, इसी मुलाक़ात के कुछ अंश-

 
प्रीति 'अज्ञात'- आपके मित्र आपको 'तहसीलदार' नाम से पुकारते हैं। यह नाम आपको किसने दिया?
अशोक 'गुलशन'- मैं जिस दिन जिस समय पैदा हुआ था, उसी दिन उसी समय मेरे घर पर उतरौला के तहसीलदार आये थे और उनके आने की सूचना किसी ने पिताजी को दी। तो उन्होंने कहा कि मेरे घर में भी एक तहसीलदार आये हैं और इस प्रकार मेरा नाम तहसीलदार पड़ गया।
 
प्रीति 'अज्ञात'- काफी रोचक किस्सा है, ये। लेकिन आप 'तहसीलदार' न बनकर चिकित्साधिकारी बने। बचपन से वहाँ तक की यात्रा कैसी रही?
अशोक 'गुलशन'- मेरा बचपन गाँव की गलियों-खेत-बाग़-खलिहानों में बीता। जहाँ  तक मुझे याद है कि मैं बचपन में नंगे घूमा करता था और माँ से रोज डांट खाता था। मनोविनोदी होने के नाते इधर-उधर घूमना और तेज गति से साईकिल चलाना मेरा बचपन का शौक़ रहा है। 
घर में माँ-बाप, बड़े भाई, एक मात्र बड़ी बहन और एक छोटा भाई परिवार के सदस्य थे। मैं एक भाई और एक बहन से छोटा और एक भाई से बड़ा था। पिताजी घाट का ठेका लेते थे और माँ गृहिणी थीं। बड़े भैया गाँव से 58 किलोमीटर की दूरी पर जिला मुख्यालय गोंडा में श्री गाँधी विद्या मंदिर इन्टर मीडिएट कॉलेज में अध्यापक थे। 
गाँव से डेढ़ किलोमीटर पर स्थित उच्च प्राथमिक विद्यालय अल्लीपुर बुज़ुर्ग में मैंने कक्षा 2 तक पढाई की उसके बाद लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर प्राथमिक विद्यालय कटरा से कक्षा 3 पास किया। 7 वर्ष की आयु में बड़े भैया के पास पढने जाना पड़ा, जहाँ से कक्षा 3 से लेकर 12 तक पढ़ाई की। कक्षा 3 में दोबारा इसलिए पढना पड़ा कि उस कॉलेज में कक्षा 3 से ही अंग्रेजी अनिवार्य थी। 1979 में इंटर करने के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बायोलॉजी ग्रुप से बी.एससी. प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया किन्तु 1 वर्ष बाद राजकीय आयुर्वेद महाविद्यालय एवं चिकित्सालय लखनऊ में बी.ए. एम.एस. में प्रवेश मिल गया और वहाँ से उपाधि प्राप्त कर 25 जून 1988 को उ.प्र. सरकार के अधीन चिकित्साधिकारी पद पर नियुक्ति मिल गयी और तबसे विभिन्न चिकित्सालयों में कार्यरत रहकर भरण-पोषण का दायित्व निभा रहा हूँ।
 
प्रीति 'अज्ञात'- साहित्य के प्रति रुझान कैसे हुआ? आप छन्दबद्ध रचनाएँ ही ज्यादा लिखते हैं, क्या प्रारम्भ से ही आपका झुकाव इस ओर रहा?
अशोक 'गुलशन'- 15 फरवरी 1978 से मैंने लेखन प्रारम्भ किया। यह भी महज एक संयोग था।  मैं स्काउट था और एन.सी.सी. का कैडेट भी। विभिन्न शिविरों में भाग लेता था। 1978 में ही 5 दिवसीय आठवीं राष्ट्रीय जम्बूरी कैंप में तमिलनाडू जाना पड़ा। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अभिरुचि थी और मेरी माँ भी बहुत अच्छा गाती थीं इसलिए मेरा झुकाव भी साहित्य और संगीत के प्रति होना स्वाभाविक था।
मेरी पहली रचना 'वो शाम जो रात भी थी' एक गद्य रचना थी जो 15 फरवरी 1978 को लिखी गयी और बाद में गोंडा के विचार भारती साप्ताहिक समाचार पत्र में 'एहसास' शीर्षक से 1986 में प्रकाशित हुई।
मैं कविता, ग़ज़ल, मुक्तक, अशआर, दोहे, गीत, हाइकू, तांका और कहानियाँ लिखता हूँ। मेरी प्रायः सभी रचनाएँ छन्दबद्ध होती हैं।
 
प्रीति 'अज्ञात'- आप एक चिकित्सा अधिकारी हैं और साहित्य के प्रति आपका प्रेम भी जगजाहिर है। इन दोनों में सामंजस्य कैसे बिठा पाते हैं?
अशोक 'गुलशन'- मैं अपने दायित्व का निर्वहन साहित्य और चिकित्सा दोनों क्षेत्रों में समान रूप से करता हूँ। चिकित्सा कार्य से अवकाश मिलते ही साहित्य सृजन करता हूँ। मेरे जीवन में ऐसी अनेक घटनायें घटित हुई हैं जिनसे मेरी लेखन क्षमता में अभिवृद्धि हुई है सच कहूँ तो किसी घटना से प्रभावित होकर ही मैं लेखक बना। 
 
प्रीति 'अज्ञात'- मंच पर जाने से पहले आप किस तरह की तैयारी करते हैं?
अशोक 'गुलशन'- मंच पर जाने के लिए मुझे किसी डायरी की आवश्यकता नहीं पड़ती और न किसी प्रकार की तैयारी ही करनी पड़ती है। जिस भी स्थिति में होता हूँ उसी स्थिति में मंच पर चला जाता हूँ। छोटे-बड़े लगभग 800 मंचों पर जाने का मुझे सौभाग्य मिला है और अभी तक हर मंच से मुझे यथोचित प्रेम, आदर और सम्मान मिला है। 
 
प्रीति 'अज्ञात'- एक रचनाकार के रूप में आपको किससे ज्यादा संतुष्टि मिलती है, सीधे श्रोताओं से जुड़ने में या पाठकों के हाथ अपनी रचनाएँ सौंप देने में?
अशोक 'गुलशन'- मैं मूलतः पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों का साहित्यकार हूँ इसलिए मुझे सीधे-सीधे पाठक तक अपनी रचनाएँ पहुँचाने में ज्यादा संतुष्टि मिलती है। 
 
प्रीति 'अज्ञात'- छोटे कस्बों या बड़े शहरों के श्रोतावर्ग में क्या मूलभूत अंतर है? आपकी लिखी ग़ज़लों में कौन-सी ऐसी ग़ज़ल है, जिसकी फ़रमाईश बार-बार होती है?
अशोक 'गुलशन'- श्रोता चाहे बड़े शहर का रहने वाला पढ़ा-लिखा हो या गाँव का ठेठ देहाती व अनपढ़ हो सबका एक जैसा मन और एक जैसा हृदय होता है इसलिए सबकी प्रतिक्रिया भी एक समान ही होती है। मेरी 'कबूतर' और 'बाबूजी' वाली ग़ज़ल बार-बार लोग सुनना चाहते हैं। 
 
प्रीति 'अज्ञात'- वर्तमान समय में आप हिंदी साहित्य का क्या भविष्य देखते हैं?
अशोक 'गुलशन'- वर्तमान समय में हिन्दी साहित्य मात्र राजनीतिज्ञों की रखैल बनकर रह गयी है। बड़े-बड़े सत्ताधारी नेता जिसे चाहें सम्मानित करें, जिसे चाहें नकार दें। सरकारी पुरस्कारों के लिए साहित्यकार एड़ी से चोटी का जोर लगाते हैं, बड़े-बड़े नेताओं के तलवे चाटते हैं और चापलूसी के बल पर बड़े-बड़े सम्मान अर्जित करते हैं इसलिए अब न साहित्य की कोई कद्र है और न साहित्यकार की ही कोई मर्यादा रह गयी है।
 
प्रीति 'अज्ञात'- सोशल मीडिया हर रोज सैकड़ों कवि पैदा कर रहा है। एक कविता लिखते ही (जिसका कविता होना भी तय नहीं) कुछ उत्साही युवा अपने नाम के आगे 'कवि', 'लेखक', 'ग़ज़लकार' लिखना प्रारम्भ कर देते हैं। क्या यह जिम्मेदारी पाठकों पर नहीं छोड़नी चाहिए कि वे तय करें कि आप कवि हैं भी या नहीं! आपका इस 'प्रथा' के बारे में क्या कहना है?
अशोक 'गुलशन'- सोशल मीडिया में ऐसा कोई साहित्यकार तो है ही नहीं, जो साहित्य का विश्लेषण करके उचित या अनुचित का भेद करके तथाकथित साहित्यकार की रचनायें प्रकाशित कर सके। जो जिसने लिख दिया वही प्रकाशित हो गया। किसी की योग्यता का आकलन उसकी रचनाओं से किया जाता है उसके नाम व पद से नहीं। पाठकगण तो इतने योग्य हैं ही जो रचना पढने के बाद यह बता सकें कि अमुक रचना किसी विद्वान द्वारा लिखी गयी है या किसी तथाकथित कवि या साहित्यकार द्वारा। 
 
प्रीति 'अज्ञात'- आज के दौर में क्या एक लेखक, अपनी लेखनी को रोज़गार का जरिया बना सकता है? क्योंकि अब तो उलटा पैसे देकर अपनी पुस्तकें छपवाने का रिवाज़ चल पड़ा है, ऐसे में आय की उम्मीद करना, अतिरेक आशावादिता का परिचायक ही माना जायेगा न?
अशोक 'गुलशन'- आम साहित्यकार अपनी लेखनी को कभी रोजगार का माध्यम नहीं बना सकता क्योंकि उसी साहित्यकार की पुस्तकें खरीदी जाती हैं जो चर्चित हो और उन्हीं चर्चित साहित्यकारों की पुस्तकें ही प्रकाशक निःशुल्क छापते भी हैं जिसकी पुस्तकें बिकती हैं या बिकने योग्य होती हैं।

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ग़ज़ल
 
बहुत दिन हो गये आँखों में वो मंज़र नहीं आते
तुम्हारी याद के चेहरे हमारे घर नहीं आते
 
हुआ है हाल ये अपना जो तुमसे दूर हो करके 
लिए अब हाथ में दुश्मन कभी खंज़र नहीं आते
 
समय के साथ मिलकर काम करना बुद्धिमानी है
हमेशा जिंदगी में एक से अवसर नहीं आते
 
तुम्हारे प्यार के खत को लगा दी है नज़र किसने 
बहुत दिन से कबूतर अब हमारे घर नहीं आते
 
हुए हमदर्द दुश्मन भी जुदाई में जरा देखो,
तुम्हारे बाद छत पर अब कभी पत्थर नहीं आते
 
बहुत है दूर मंजिल चल रहे हैं हम अकेले ही
सदायें सुन के भी नज़दीक अब रहबर नहीं आते 
 
न जाने क्या खता कर दी है हमने प्यार में ‘गुलशन’,
जिन्हें यह ज़िन्दगी सौंपी वही दिलवर नहीं आते
-डॉ.अशोक ‘गुलशन’
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ग़ज़ल
 
कभी बैठकर कभी लेटकर चल कर रोये बाबू जी
घर की छत पर बैठ अकेले जमकर रोये बाबू जी
 
अपनों का व्यवहार बुढ़ापे में गैरों सा लगता है,
इसी बात को मन ही मन में कह कर रोये बाबू जी
 
बहुत दिनों के बाद शहर से जब बेटा घर को आया
उसे देख कर खुश हो करके हॅस कर रोये बाबू जी
 
नाती-पोते बीबी-बच्चे जब-जब उनसे दूर हुये
अश्कों के गहरे सागर में बहकर रोये बाबू जी
 
जीवन भर की करम-कमाई जब उनकी बेकार हुई
पछतावे की ज्वाला में तब दहकर रोये बाबू जी
 
शक्तिहीन हो गये और जब अपनों ने ठुकराया तो
पीड़ा और घुटन को तब-तब सहकर रोये बाबू जी
 
हरदम हॅसते रहते थे वो किन्तु कभी जब रोये तो
सबसे अपनी आॅख बचाकर छुपकर रोये बाबू जी
 
तन्हाई में ‘गुलशन’ की जब याद बहुत ही आयी तो
याद-याद में रोते-रोते थक कर रोये बाबू जी
-डॉ.अशोक ‘गुलशन’

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साहित्यिक परिचय :
 
नाम- डॉ.अशोक कुमार पाण्डेय            परिचित नाम- डॉ.अशोक ‘गुलशन’
पिता- स्व. बृज बहादुर पाण्डेय            माता- स्व. शारदा देवी
धर्मपत्नी- डॉ. सुमन पाण्डेय
जन्मतिथि- 25 जून, 1963                   जन्मस्थान- पिपरा एकडंगा, बलरामपुर (उ.प्र.)
 
शिक्षा- बी.ए.एम.एस.(आयुर्वेदाचार्य) - लखनऊ वि.वि., साहित्याचार्य, एन.डी. (डिप्लोमा इन नेचुरोपैथी) - कोलकाता,  डी.एच.एम. (डिप्लोमा इन हर्बल मेडिसिन) - कोलकाता
मानद उपाधियाँ- आचार्य,  विद्या वाचस्पति  (पीएच.डी.) विद्या सागर (मानद),
पंजीकृत सदस्य- दि फिल्म राइटर्स एसोसियेशन, मुम्बई-1993
प्रकाशन-                    पुस्तक का नाम एवं विधा            प्रकाशन–वर्ष
 
1-गुलशन नामा                  ग़ज़ल/मुक्तक/शेर संग्रह                  -1992
2-अर्द्धशतक                     कविता संग्रह                                 -1992
3-मेहनत का फल                एकल कहानी                              -1996
4-मौन वृक्ष                     ग़ज़ल/मुक्तक संग्रह                           -1999
5-कागज के पंख                 कहानी संग्रह-                               -2008 
6-साँसों की समिधायें              गीत संग्रह                                  -2008
7-मुक्तकाँजलि                   मुक्तक संग्रह                                - 2008
8-तहरीरें                        मुक्तक/ अशआर संग्रह                       -2009
9-मोहब्बत दर्द है                 ग़ज़ल संग्रह                                  -2010 
10-मेंहदी वाले हाथ                दोहा संग्रह                                  -2012
11-वेदना के छन्द                 गीत संग्रह                                    -2012
12-मैं कभी ऐसा न था             मुक्तक संग्रह                               -2012
13-पानी की दीवार                काव्य संग्रह                                  -2012 
14-और कुछ भी नहीं              ग़ज़ल संग्रह                                  -2012
15-क्या कहूँ ? कैसे कहूँ ?       काव्य संग्रह                                  -2013 
16- लफ़्ज़ों का सफ़र                काव्य संग्रह                                - 2015
 
सम्पादन- 13 पुस्तकों का सम्पादन/सह सम्पादन।
प्राप्त सम्मान/पुरस्कार/उपाधियाँ – थाईलैंड , भूटान , नेपाल सहित भारत के 15 प्रान्तों की विभिन्न संस्थाओं द्वारा  327 (तीन सौ सत्ताईस) सम्मान, पुरस्कार, उपाधियाँ एवॅ अभिनन्दन प्राप्त। 
भारतीय राजदूतावास द्वारा आयोजित तीन दिवसीय साहित्यिक समारोह में काठमाण्डू में प्रतिभाग। चतुर्थ अन्तर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन थिम्पू (भूटान) में चार दिवसीय कार्यक्रम में प्रतिभाग तथा छठवें अन्तर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन बैंकाक (थाईलैंड) में पांच दिवसीय कार्यक्रम में प्रतिभाग
विशेष- भारत सरकार द्वारा प्रदान किये जाने वाले पद्म पुरस्कार हेतु वर्ष-2011 में क्रमांक 646 ,वर्ष 2013 में क्रमांक 527 , वर्ष 2014 में क्रमांक 500 तथा वर्ष 2015 में क्रमांक 482 पर नामांकन तथा राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान लखनऊ की ओर से उ०प्र० शासन के मुख्य सचिव श्री आलोक रंजन द्वारा कहानी संग्रह ’ काग़ज के पंख’ पर  51000 रू0 का अमृत लाल नागर पुरस्कार।
 
सम्पर्क- कानूनगोपुरा उत्तरी, बहराइच (उ0प्र0)-271801
मोबाइल- 09450427019
ई-मेल [email protected]

 


- प्रीति अज्ञात
 
रचनाकार परिचय
प्रीति अज्ञात

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