प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2016
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

रचना-समीक्षा

समाज के महत्त्व को दर्शाती कविता ‘आज मैं अकेला हूँ’: आज़र ख़ान


हिंदी साहित्य के उत्कृष्ट प्रगतिवादी कवि त्रिलोचन शास्त्री जी की कविताएँ विविधताओं से भरी हुई हैं। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से मनुष्य मनुष्य को आपस में जोड़ने का प्रयास किया है। उनकी कविताओं में प्रेम है, प्रकृति है इन सबके बीच उन्होंने व्यक्ति और समाज को केंद्र में रखा है। अपनी व्यक्तिवादी कविताओं के माध्यम से भी वह समाज से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। उनकी कविताओं में उनकी निजी ज़िंदगी का भी परिचय मिलता है। उन्होंने कविताओं में अपनी जितनी चर्चा की है, उतनी उनके समकालीन किसी भी कवि ने नहीं की। इतनी आत्मचर्चा इनसे पहले या तो निराला ने की है या फिर तुलसीदास ने।

यह आत्मचर्चा इतनी है कि उनकी कविताओं के आधार पर आत्मचरित भी लिखा जा सकता है, लेकिन इसके साथ-साथ वह अनात्मवादी और निर्वैयक्तिक भी हैं। वे अपनी कविता के विषय भी हैं और विषयी भी, लेकिन विषयी से अधिक विषय हैं। कुल मिलाकर यह वही ‘मैं’ है, जो लोकजीवन की संवेदना से जुड़ा है। इस प्रकार उनकी कविता का विषय वह जीवन है, वह समाज है, जिसमें व्यक्ति और समाज के बीच कोई अलगाव नहीं है। फिर भी हर एक का अपना अनुभव है, अपनी दृष्टि है और अपना मत है।


त्रिलोचन की ‘मैं’ शैली में लिखी हुई कविता ‘आज मैं अकेला हूँ’ का कथ्य यही है। कवि इस कविता में अपने बारे में जो बात कह रहे हैं, वो समाज के हर व्यक्ति के लिए है। पाठक जब यह कविता पढ़ता है तो वह इसमें खुद को ही पाता है। आखिर अकेला व्यक्ति क्या महसूस कर सकता है? जीवन बड़ी अनमोल चीज़ है, लेकिन इसकी कीमत तभी पता चलती है, जब हम किसी के साथ होते हैं, समाज में रहते हैं, समाज के साथ चलते हैं वर्ना हम अपने में ही सिमट कर रह जाते हैं, निरर्थक हो जाते हैं। यह जीवन रत्न के समान है। यह कितना उपयोगी है, इसका मान क्या है, इसका पता हम अकेले रहकर नहीं लगा सकते। समाज के साथ रहकर ही परावर्तन के रूप में इसका मान, सम्मान और मूल्य का अहसास होता है। अकेले रहकर चाहे सुख आए या दुःख आए, रात या दिन आए कहने का तात्पर्य है, पल-पल का रस या सुख-दुःख हम अकेले नही सह सकते। जीवन चलने का दूसरा का नाम है, यह नदी की धारा के समान निरंतर बहता रहता है, लेकिन समाज से अलग हटकर हम निरंतर धारा के समान बह नहीं सकते।
इस प्रकार त्रिलोचन जी ने अपनी इस आत्मवाणी के माध्यम से संसार के सभी मनुष्यों की वाणी को व्यक्त किया है, जिसमें समाज की महत्ता प्रकट होती है।



समीक्ष्य कविता-

आज मैं अकेला हूँ
अकेले रहा नहीं जाता।
जीवन मिला है यह
रतन मिला है
धूल में
कि
फूल में
मिला है यह
तो
मिला है यह
मोल-तोल इसका
अकेले कहा नहीं जाता।

सुख आए, दुःख आए
दिन आए, रात आए
फूल में
कि
धूल में
आए
जैसे
जब आए
सुख दुःख एक भी
अकेले सहा नहीं जाता।

चरण हैं, चलता हूँ
चलता हूँ, चलता हूँ
फूल में
कि
धूल में
चलता
मन
चलता हूँ
ओखी धार दिन की
अकेले बहा नहीं जाता।

- त्रिलोचन शास्त्री


- आज़र ख़ान