प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2016
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मिर्ची वाले परांठे
आज भी यादों के झरोखों में जब भी झांकती हूँ, कुछ यादें दिल से जाती नहीं है। उन्हें याद करके यकायक ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। दो भाइयों की इकलौती बहन होने का खूब फायदा उठाती ही रहती थी। पहली बार बड़े भैया से किसी बात पर तकरार हो गयी। हम उस समय ज्यादा बड़े नहीं थे, दस -ग्यारह साल के होंगे। पहली बार बड़े भैया ने मुझे एक चांटा मारा। मुझे बहुत गुस्सा आ गया,और में उनसे बदला लेने की सोचने लगी।
अगले दिन मम्मी ने बड़े भैया के लिए पराठे बनाने को मुझे कहा। मैं खुश हो गयी क्योंकि बदला लेने का अच्छा मौका था। मैंने बड़े भैया के लिए लाल मिर्च भरकर परांठे बनाए। घर में हल्की-हल्की मिर्च की महक भी भर गई पर किसी को भनक नहीं लगी।
 
खाना लगाकर बड़े भैया को मम्मी ने दिया ,तो भैया ने जैसे ही एक निवाला मुँह में डाला,उन्हें मिर्ची लग गई। उन्होंने मम्मी को बुलाया और परांठा दिखाया मिर्ची वाला। मम्मी ने मुझे बुलाकर पूछा कि तुमने ये क्यों किया। मैंने तुरंत बताया कि "बड़े भैया से मार का बदला लेने के लिए।"
मम्मी ने मुझे बहुत डाँटा और मिर्ची वाले परांठे मुझे जबरदस्ती खिलाए।मैं उन्हें खाकर रो रही थी और भैया जोर -जोर से हंस रहे थे।
सच! यादें कितनी अनमोल होती है ।
 

- सपना परिहार
 
रचनाकार परिचय
सपना परिहार

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