प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2016
अंक -51

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- आखिरी दस्तक


दो दिन बाद दफ्तर पहुँचने पर चिट्ठियों के बीच यह शादी का कार्ड मिला। श्रीमती सुनंदा अपने सुपुत्र हिमाद्रि के अनीषा संग शुभ-विवाह के अवसर पर नवदंपत्ति को आशीर्वाद प्रदान करने एवं प्रीतिभोज हेतु आपको सादर आमंत्रित करती हैं। नीचे समय, दिनाँक, स्थान और हर्बल मेडिकल फर्म का नाम व टेलिफोन नंबर भी लिखा था। बुक-पोस्ट से भेजे इस कार्ड को भूरे रंग की शीट पर मेहरुन और हरे रंग की छपाई से खूबसूरत बनाने की भद्दी-सी कोशिश की गई थी। मैं ऐसा बेमेल कार्ड कभी नहीं छपाता। हाँ, कार्ड संक्षिप्त ज़रूर था। लेकिन उसमें भी तीन गलतियाँ छपी थीं। पर अभी इन सब बातों से ज्यादा ध्यान देने की बात उस पर छपी तारीख थी, जो कल ही की थी।
ऐसी हालत में निर्णय लेने की ज़रूरत होने पर मेरे दिमाग में अक्सर एक सन्नाटा गूंजने लगता है और तब, मेरे लाख चाहने पर भी मुझे कोई विचार, कोई रास्ता सूझता ही नहीं।
ठीक इसी समय श्रुति का फोन आया। मैंने सकून की सांस लेते हुए उसे बताया कि मैं आज सुबह ही लौटा हूँ। और, कल हेमू की शादी है।
पल भर जैसे श्रुति ने मेरी बताई सूचना को समझने में समय लगाया। फिर तुरंत निर्णय लेकर कहा- "मैं अभी पंद्रह मिनट में आपके पास पहुँचती हूँ। तब तक आप सैकेट्री को आज और कल का सारा काम समझा दीजिए, परसों तो रविवार है ही....." तुरंत ही मेरे दिल-दिमाग हल्के हो गये। आमतौर पर बहुत धीमी गति की श्रुति मुसीबत के समय बहुत सटीक और शीघ्र निर्णय लेने में माहिर है।


मैंने सैकेट्री को बुलाया, कुछ ज़रूरी फाइलों पर दस्तखत किये, अगले दिन की मीटिंगें सोमवार पर कीं, कुछ ज़रूरी चिट्ठियों के जवाब लिखवा रहा था, तब तक श्रुति आ गई। वह हमेशा की तरह शांत और आत्मीय लग रही थी। चाय पीते हुए उसने कहा कि शादी में ड्राईवर को लेकर उसकी कार से भी जाया जा सकता है, पर मैं पिछले तीन दिनों से आॅफिस की कार से सफर करते-करते थक चुका था। इसलिए कल सुबह की ट्रेन से जाना तय हुआ, जो रात 7.30 बजे तक मुझे वहाँ पहुँचा ही देगी।
उसने जिद करके मेरे पी.एफ. एकाऊंट से दो लाख का ‘फाइनल विदड्रा’ का भी ‘ड्राफ्ट’ बनवा लिया और फिर मेरे साथ चलकर दूल्हा-दुल्हन के लिए कपड़े व सोने की दो-चार चीजें, सुनंदा के लिए कपड़ों के साथ एक कीमती नेकलेस और मेरी झुंझलाहट के बावजूद मेरे लिए नया सूट खरीदा।
मैं घर लौटने तक थक चुका था। सुस्ताते हुए न जाने कब मेरी आँख भी लग गई। खाना लगाने के बाद उसने मुझे जगाया। बाकी कामों से निपट कर रात दस बजे वह जाने को हुई तो मैंने उसे इतनी देर होने के कारण रात यही रुक जाने का कहा। पर, उसने बताया कि आॅफिस की कुछ ज़रूरी फाईलें वह साथ ही लाई है, जिन्हें जल्दी निपटा कर उन्हें रात ही में फैक्स भी करना है। कल सुबह वह मुझे लेने के लिए जल्दी पहुँच जाएगी।


मैं अपनी थकान मिटा पाऊँ उससे पहले सुबह के साढ़े चार बजे का अलार्म बज गया।
पाँच से पहले श्रुति भी आ गई। वह नाश्ता और खाना बना कर ही ले आई थी।
ट्रेन में सीट पर बैठने के बाद उसने मेरे लिए लाया अपना शाॅल, काॅफी का फ्लास्क, दो किताबें, उस दिन का अखबार और पत्रिकाएँ रखी। उसकी आँखों में मेरे लिए अब भी चिंता थी। गाड़ी रवाना होने पर मैंने हँसकर हाथ हिलाया, उसने मुस्कराने की कोशिश की। श्रुति का शाॅल ओढ़ा तो मैं उसकी गंध की आगोश में पहुँच गया। कुछ देर बाद मैं सचमुच सो चुका था।


ट्रेन हमेशा की तरह कुछ देर से ही पहुँची। मैं शादी के शामियाने में पहुँचा, तब तक रात के साढ़े नौ बज चुके थे। सड़क रोक कर मध्यम दर्जे का टैंट लगाया हुआ था। सजावट भी बस ठीक-ठाक ही थी। लोग भी ज्यादा नहीं थे। कुछ ही लोग जोड़े में थे, अधिकतर हेमू के दोस्त या मुहल्ले के लड़के ही लग रहे थे। स्टेज पर लोग नये जोड़े के साथ फोटो खिंचवा रहे थे। वीडियोग्राफर शायद नहीं बुलाया गया था। हेमू ने शादी के मौके पर भी दाढ़ी बढ़ा रखी थी। गहरे भूरे रंग के सूट में वह सांवला लग रहा था। फिर भी उसे देखते ही उससे लिपटने के लिए मैं बेचैन हो गया।
हेमू अलग-अलग लोगों के साथ औपचारिकता और आत्मीयता से मुस्कराता-बतियाता हुआ फोटो खिंचवा रहा था। उसकी तुलना में दुल्हन साधारण नाक-नक्श के बावजूद अपनी गंभीरता और सौम्यता के कारण अधिक सुंदर दिखाई दे रही थी।
मैंने गौर से देखा तो मालूम हुआ कि हेमू इस समय भी मुँह में गुटखा दबाए हुआ था। उसकी इस आदत पर उन दिनों मैं बेहद गुस्सा हुआ करता था। माँ-बेटा तो मुझे पहले ही गुस्सैल आदमी घोषित कर चुके थे। एक खराब पिता के रूप में मैं चर्चित किया जा चुका था। एक ही छत के नीचे साफ तौर पर दो पक्ष बनाये जा चुके थे। एक पक्ष के रूप में मैं खुद को हमेशा अकेला और उन दोनों को एक साथ पाने लगा था।


आखिरकार माँ-बेटे ने मेरे साथ बैठ सब-कुछ तय कर फिर कभी न लौटने के लिए वह घर, वह शहर छोड़ दिया। उसी सुबह हेमू का रिजल्ट आया था और वह काॅलेज में पहले ही साल फेल हो चुका था। उसने इसका सीधा आरोप मुझ पर लगाया। वह घर छोड़ने तक लगातार बड़बड़ाता रहा- "पता नहीं क्या समझते हैं अपने-आपको, मेरे हर काम में मीन-मेख निकालेंगे, अपने मशविरे देते रहेंगे, ऐसे में कोई कैसे पढ़ सकता है.....?"
पर उस दिन सुनंदा अपनी आदत के विपरीत चीखने-चिल्लाने की बजाय चुप थी। वह गहनों-पैसों को सहेजकर सूटकेस में रख चुकी थी। मुझसे लिये एडवांस चैकों को ध्यान से गिन कर कपड़ों के बीच रख रही थी। किसी वकील की सलाह पर उसने टाईप किये एक स्टांप-पेपर पर मुझसे दस्तखत करवाए, उसकी एक काॅपी मुझे भी दी।
घर से जाते हुए दोनों में से किसी ने मुझसे न तो एक शब्द कहा, न ही मेरी ओर मुड़ कर भी देखा। आॅटो रवाना होने की आवाज सुनकर मैं बाहर पहुँचा, तब तक वहाँ धुएँ की गंध भर थी। मुझे लगा शायद यही ठीक था। रोज के तनाव से बेहतर है- एक-दूसरे से मुक्ति। पर बरसों तक मैं उदासी से उबर नहीं पाया।


उन्हीं दिनों एक शाम मुझे दिल का दौरा पड़ा। श्रुति उस शाम पहली बार घर आई थी। वह अंदर आकर कुर्सी पर बैठे, उससे पहले मैं कुर्सी से लुढ़क चुका था। उस शाम वह न होती तो यह कहानी यहीं पर अनकही ही ठहर जाती।
इसके एक-डेढ़ महीने बाद एक सुबह श्रुति रोज की तरह जल्दी आकर मुझे तैयार कर, नाश्ता और दवाई खिलाकर अपने आॅफिस के लिए निकली ही थी कि घंटी बजी।
मैंने लेटे हुए ही कहा- "दरवाजा खुला है।"
हेमू को भीतर आते देख मैं चौंक गया। उसे छूने के लिए मेरा शरीर, मेरा मन थरथराने लगा। पर वह बेड के पास रखी कुर्सी पर आकर चुपचाप बैठ गया। पास में छोटी टेबल पर रखी दवाइयों को उसने कुछ आश्चर्य से देखा। पर फिर काफी देर चुप रहने के बाद बोला- "कैसे हैं आप?"
"ठीक हूँ।"
"कार नहीं दिख रही है!"
उसके सवालों से निराश होते हुए मैंने बेमन से जवाब दिया- "बेच दी।"
कुछ पल चुप्पी छाई रहने के बाद मैंने ही पूछा- "कैसे हो तुम लोग।"
उसने भी उतना ही छोटा जवाब दिया- "ठीक हैं।"
"क्या कर रहे हो?"
"बिजनस की सोच रहा हूँ।"
कुछ पलों की चुप्पी के बाद मैंने कहा- "पानी पी लो, अपने लिए चाय बना लो, उधर ब्रेड-बटर रखा है।"
"नहीं, बस ठीक है।"
खुद को लाख रोकने के बावजूद मैंने कहा- "तुम दाढ़ी नहीं रखो तो ज्यादा सुंदर लगोगे।"
वह कुछ नहीं बोला। दूसरी ओर देखता रहा।
कुछ देर बाद मेरी ओर देख कुर्सी से उठते हुए बोला- "चलता हूँ।"
मैंने हड़बड़ाकर पूछा- "कैसे आये थे? मुझसे कोई काम है?"

मेरी इच्छा हुई उसका हाथ पकड़ अपनी ओर खींचकर उसे खुद से लिपटा लूँ। पर वह दो कदम दूर होता हुआ बोला- "नहीं, ऐसे ही किसी काम से आया था। घंटे भर बाद ही कहीं जाना है।" और फिर, बिना मेरी ओर देखे दरवाजे की ओर बढ़ गया। बिना पीछे मुड़े उसने दरवाजा बंद कर दिया। मेरे दिमाग में फिर सन्नाटा पसर गया था। कुछ देर बाद मैं सोच रहा था- मैंने नींद की गोली की खुमारी में कोई सपना देखा था या सचमुच हेमू आया था। उसके आने का कोई प्रमाण नहीं था, सिवाय इसके कि मेरे पलंग के पास रखी कुर्सी कुछ दूर खिसकी हुई और तिरछी रखी थी।

तभी दूल्हा बने हेमू की नजर मुझ पर पड़ी। फोटो खिंचाने के लिए अब कोई स्टेज पर नहीं था और वे दोनों सजे हुए सिंहासनों पर बैठ चुके थे। पर मुझसे नजर मिलते ही वह जैसे अनजाने ही उठ खड़ा हुआ। असमंजस में उठ खड़ी हुई अनीषा को शायद वह मेरे बारे में ही कुछ कह रहा था।
थरथराते हुए कदमों से मैं स्टेज पर पहुँचा। हेमू तब तक संभल चुका था। वह मेरे निकट पहुँचने पर भी आँख बचाते हुए स्थिर खड़ा रहा। अनीषा प्रणाम के लिए ज़रूर झुकी। उसके सिर पर हाथ रखते हुए मैंने सारे पैकेट उसे सौंप दिये। पल भर असमंजस में खड़े रहने के बाद मैं पलट कर स्टेज से नीचे उतर आया। ठीक उसी समय मैंने पाया कि सुनंदा कुछ मेहमानों के साथ खड़ी मुझे ही देख रही थी। गहरे मेकअप और गहनों से लदी हुई वह उनसे बातें कर रही थी। मेहमानों द्वारा दिये जा रहे लिफाफे वह थोड़ी ना-नुकुर के बाद अपने पर्स में रख रही थी। उसका रंग और सांवला, शरीर और भारी हो गया था।
मैं शामियाने में रखी एक खाली कुर्सी पर बैठ गया। हेमू के इक्के-दुक्के दोस्तों और पाँच-सात अन्य लोगों के अलावा शामियाने में टैंट-हाऊस के बेयरे थे। दूल्हा-दुल्हन को स्टेज से उतार कर खाने के लिए ले जाया जा रहा था। हेमू मेरी ओर आधी नजर से देखते हुए आगे बढ़ गया। उसी समय सुनंदा आकर मेरी पास की कुर्सी पर बैठ गई। उसने कोई बेहद तेज सैंट लगा रखा था। अपनी नापसंदगी को मैंने चेहरे पर भरसक न आने दिया।


दो पल की खामोशी के बाद उसने पूछा- "खाना खा लिया?"
उसका सवाल मेरे भीतर पहुँचने की बजाय मेरे आस-पास ही घूमता रहा। तभी किसी ने तेजी से पास आते हुए ऊँचे स्वर में उससे कहा- "अरे, वहाँ सभी तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं और तुम यहाँ बैठी हो?"
उसने बेहद अधिकार से सुनंदा की बाँह पकड़ कर उठाना चाहा। वह सकपका गई। फिर स्थिर आवाज में बोली- "आप चलिये, मैं आ रही हूँ।"
वह व्यक्ति मुझे नापसंद नजरों से घूरता हुआ चला गया।
उसने जैसे खुद को सहज करने के लिए मुझसे पूछा- "कैसे हो?"
मैंने सिर हिला दिया।
वह अपनी कलाई पर बांधी घड़ी देख उठते हुए बोली- "खाना खा लो।" पर फिर टेबलों पर से समेटे जा रहे सामान को देखकर कहा- "अंदर आकर खा लो।"
मैंने बड़ी मुश्किल से कहा- "तुम चलो, मैं आ रहा हूँ।" वह पल भर मुझे देख दूसरी ओर चली गई। मेरे दिमाग में फिर सन्नाटा पसर गया।
और तभी मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए एक जानी-पहचानी आवाज ने मुझसे सवाल किया- "आपकी तबियत ठीक है न!"


मैंने चौंककर देखा। मेरे पास श्रुति खड़ी थी। पूरे शामियाने में सामान समेटते थके हुए मजदूरों, चमक खो रही हेलोजन लाइटों, बेजान कुर्सियों, निरीह-बिखरी हुई प्लेटों-गिलासों के अलावा हम दोनों ही थे। पल भर के लिए मैंने दूल्हा-दुल्हन के खाली सिंहासनों को देखा, फिर श्रुति का हाथ पकड़कर खड़ा हो गया। मेरे दिमाग का सन्नाटा पिघलने लगा। बाहर खड़ी श्रुति की कार तक पहुँचने से पहले उसने अचानक पूछा- "वह सामान और ड्राफ्ट तो दे दिया न?"
मैंने अचकचा कर अपनी जेब टटोली। ड्राफ्ट मेरी जेब में ही था। पर फिर तसल्ली से कहा- "नहीं, ड्राफ्ट मेरे पास ही है।"
वह कुछ कहने लगी पर मैंने उसे रोकते हुए कहा- "रहने दो, बस ठीक है।"
उसने ड्राइवर से कहा- "चलो।"


सर्दियों के बावजूद कार चलते ही ठंडी हवा से मुझे सकून मिला। मैंने सीट पर सिर टिकाकर आँखें मूंद लीं। पर नींद आने से पहले उसने मेरे हाथ में खाने की प्लेट थमा दी। मैंने चकित होकर उसकी ओर देखा तो उसने झेंपते हुए बताया कि मुझे गाड़ी से विदा करने के बाद उसे विचार आया कि मैं शादी का खाना तो डाॅक्टर की सलाह के मुताबिक खा ही नहीं सकता। और इतनी रात मैं किसी होटल में नहीं जा पाता। इसलिए ड्राइवर को बुलाकर यहाँ चली आई। चूंकि यहाँ जल्दी पहुँच गई, इसलिए एक सहेली के यहाँ रुक कर मेरे लायक खाना भी पका लाई।
मुझे लगा मेरा सब-कुछ पिघल कर यहीं बह जाएगा। और फिर कुछ भी सहन नहीं हुआ तो मैंने उसकी कलाई थाम ली। वह एक नजर से ड्राइवर को देखते हुए बेहद संकोच से मुझे सीधा बिठाने की कोशिश कर रही थी।


- डॉ. हरीदास व्यास
 
रचनाकार परिचय
डॉ. हरीदास व्यास

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