प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2016
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल

किसकी बातें हैं अनाकारी की
हद हुई जाती है मक्कारी की

देखिये अब इलाज़ कीजै कुछ
आदमी नाम की बीमारी की

घूस खाए न तो करे भी क्या
कितनी वेतन है करमचारी की?

सुन के थोड़ा क़रार आने लगा
जब चली बात, बेकरारी की

शेख़ जुम्मन-ओ-ख़ाला कैसे हैं
बुझ गई बात? माहवारी की

तो चलें 'दीप' कल मिलेंगे फिर
पोटली भर के दुनियादारी की


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ग़ज़ल

मुकम्मल शख़्स होता जा रहा हूँ
दिनों-दिन और खोता जा रहा हूँ

किसे परवाह कल कैसी फसल हो
मुसलसल बीज बोता जा रहा हूँ

न जाने कौन है मुन्शी-मुअइयन
चुकाऊँ लाख, जोता जा रहा हूँ

सुना है, बे-वुजू मिलते नहीं हैं?
लगा कर खूब गोता, जा रहा हूँ

खयालों-ख़्वाब में ही कुछ सुकूँ है
खुली है आँख, सोता जा रहा हूँ


- दीपक शर्मा दीप
 
रचनाकार परिचय
दीपक शर्मा दीप

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