प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2016
अंक -38

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संपादकीय
सफ़र जारी है अभी.....!
 
 
बीते माह भी बहुत-सी घटनाएं हुई। कैलेंडर तारीखें पलटता रहा, चेहरे बदलते रहे और किस्सा हूबहू! एक ईमानदार, जुझारू अफसर को सरेआम गोलियों से भून दिया गया पर इस समाचार का वही हाल हुआ जो होता आया है क्योंकि इसमें न ग्लैमर था, न मसाला। उभरती हुई कलाकार की आत्महत्या की ख़बर ने ज्यादा सुर्खियाँ बटोरीं। यह भी निश्चित तौर पर एक गंभीर, दुःखद घटना थी पर नितांत व्यक्तिगत। यदि जीते-जी इंसान की सुध लेने वाला मात्र एक भी अपना हो, तो इस तरह की प्रवृत्ति में कमी आ सकती है। दुर्भाग्य से आधुनिक सभ्यता में 'गुज़र' जाने के बाद रोने का रिवाज है और मौजूद होते समय परवाह करने वाला कोई नहीं होता! चाहे वो वक़्त हो या ज़िंदगी! अब 'मौत' संवेदना नहीं 'चर्चा' का विषय है। 
 
एक तरफ मंदिर में आग का भयानक हादसा होता है, परन्तु यहाँ लाशों के ढेर पर अपनी पीड़ा व्यक्त करने के बजाय कहीं सिंहासन पर विराजमान धर्म के ठेकेदार स्त्रियों के मंदिर में प्रवेश पर नाक-भौं सिकोड़ते नजर आते हैं। ये उस अनादि, अनंत शक्ति का अपमान करते हुए बड़ी सहजता से अपने मन की बात उसके पल्ले बाँध देते हैं इसीलिए तो उसे ईश्वर की नाराज़गी का जामा पहनाकर, रेप की संख्या में वृद्धि की चेतावनी दे डालने में जरा भी नहीं हिचकिचाते। उनकी ईश्वर के प्रति आस्था और भक्ति का इससे अधिक वीभत्स प्रमाण कहीं मिलेगा क्या? आह! अब किसको शर्मिंदा करना शेष रहा?
 
किसी राज्य में शराबबंदी से कोई प्रसन्न है, कोई व्यथित है, तो कहीं चुटकुलों का दौर जारी है। निस्संदेह, यह स्वागत योग्य क़दम है बशर्ते इस पर पूर्णरूप से अमल हो। वरना ड्राई स्टेट में पार्टियां भी खूब होती हैं और नशे की हालत में की गई दुर्घटनाएं भी यथावत ही रहती हैं। ज़ाहिर है, जिस काम की मनाही होती है, उसे चोरी से किया जाता है। सार्थक तो तब होगा, जब पूरे देश में इस तरह की वस्तुओं पर प्रतिबन्ध लगे और इन्हें रखने या सेवन करने वालों को अपराधी की दृष्टि से देखा जाए। इससे दिमागी संतुलन बिगड़ने या नशे की हालत में किये गए अपराध और दुर्घटनाओं की संख्या में कमी आएगी। साथ ही नशा मुक्ति केंद्र, अस्पतालों में इनके इलाज के नाम पर होने वाला खर्च भी बचेगा। परिवार की दुआएँ मिलेंगी, सो अलग! हाँ, सरकार को ज़रूर तय करना होगा कि उसे होने वाले नुकसान की भरपाई कैसे होगी? ये 'उनके' लिए चिंता का विषय हो सकता है। देखना होगा, जीवन ज़रुरी है या पैसा?
 
पानी की किल्लत अब मात्र किसान से जुड़ी समस्या ही नहीं रह गई, आम आदमी भी इससे उतना ही प्रभावित होने लगा है। 'जल ही जीवन है' और इसे पाने के लिए इतनी जद्दो-जहद कि इंसानी सभ्यता एक-दूसरे के खून की ही प्यासी हो जाए! यह अत्यन्त गम्भीर एवं चिंताजनक स्थिति है, कहीं विकास की दौड़ में हम जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की अनदेखी तो नहीं कर रहे? मशीनी दिनचर्या में से सुकून का एक ठंडा गिलास हट जाए तो क्या बचा? 
 
सारी समस्याओं के बीच आई पी एल की अपनी रौनक, अपनी दर्शक दीर्घा है। क्रिकेट हमेशा से हमारा 'राष्ट्रीय भगवान' रहा है। हालांकि दिलों को जोड़ता, सबको एक ही रंग में रंगता हुआ, सद्भावना और देशभक्ति से सराबोर करने वाला यह खेल अब 'अति' का शिकार हो चुका है और इसे 'व्यवसाय' की श्रेणी में रख देना ज्यादा उचित होगा। फिर भी 'जो जोड़ता है, वो कभी बुरा नहीं लगता', जब तक यह खेल है, राष्ट्रीयता सुरक्षित है। इसलिए क्रिकेट की जय हो!
उम्मीद करते हैं, कभी हमारी हॉकी भी 'विजयी' हो!
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चलते-चलते: जहाँ लोग ढोल-मजीरों के साथ हर अंक का विमोचन या ऑनलाइन उत्सव मनाते हैं, संस्थान की स्थापना होती है, प्रतियोगिता-पुरस्कार की क़वायद में जी-हजूरी का तड़का लगने लगता है, वहीँ 'हस्ताक्षर' ने चुपचाप एक वर्ष पूर्ण कर लिया। स्वप्न हमने भी कई देखे लेकिन ईमानदार स्वप्नों की सुनवाई ज़रा देर से हुआ करती है या फिर वो बेदम हो स्वयं ही स्थान छोड़ देते हैं।

 

गुटबाजी और जुगाड़-प्रथा के युग में अकेले चलना आसान नहीं होता। लेखक /कवि के लिए इतना ही आवश्यक है कि वो पूरी ईमानदारी से लिखता रहे, चाहे वो अपने बारे में हो या समाज के। भय की खाल के भीतर बैठकर लिखने वाले, स्वयं के लिए भी निष्पक्ष नहीं हो पाते। सत्य का समर्थन और असत्य का विरोध करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। पर बहुधा यही होता है कि 'सच' अकेला ही खड़ा रह जाता है। इन हालातों में डिगना नहीं है और न ही किसी को उम्मीद भरी नजरों से तलाशना है। मन का सच्चा होना काफी है।

मुझे, के पी अनमोल और हमारी पूरी टीम को; किसी बात का मलाल नहीं, शिकायत किसी से नहीं बल्कि प्रसन्नता है कि बीते वर्ष में एक लाख से भी अधिक पाठकों ने इस पत्रिका का अवलोकन किया और दो सौ से भी अधिक स्थापित एवं नवोदित रचनाकार 'हस्ताक्षर' की इस यात्रा में सहभागी बने। यह पहला क़दम है और अनुभूति ठीक वैसी ही, जैसी कि माँ को अपने बच्चे के पहली बार खुद को सँभालते हुए खड़े होने पर होती है।
 
मैं धन्यवाद देना चाहूंगी, उन सभी रचनाकारों को जिन्होंने अपनी शानदार रचनाएँ भेजकर हमारा मान बढ़ाया और उन प्रबुद्ध पाठकों को, जिन्होंने अपनी व्यस्त ज़िन्दगी से कुछ पल निकालकर 'हस्ताक्षर' को दिए। हमारी रचनाओं को पढ़ा, साझा किया, सुझाव एवं प्रतिक्रियाएँ दीं।
 
सौ बात की एक बात- रचनाकार और पाठक के बिना हमारा कोई अस्तित्व नहीं!
धन्यवाद, हमारे हौसले बुलंद करने के लिए!
हमारे स्वप्न में जान फूंकने के लिए!
उन आलोचनाओं के लिए भी जिन्होंने हमें और बेहतर कर सकने की क्षमता से परिचित कराया!
उन गुमनाम चुप्पियों को भी सलाम, जो चाहकर भी कुछ कह न सकीं!
फड़फड़ाते पन्नों के बीच से झांकती, आपकी लेखनी को नमन!
'हस्ताक्षर' के साथी बने रहने का तहेदिल से शुक्रिया!
 
उम्मीद है आगे की यात्रा भी इतनी ही सुखदायी होगी तथा आपका स्नेह और आशीर्वाद सदैव हमारा मार्ग प्रशस्त करता रहेगा!
सफ़र जारी है अभी.....!
 
 

 


- प्रीति अज्ञात
 
रचनाकार परिचय
प्रीति अज्ञात

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