अप्रैल 2016
अंक - 13 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख
मीडिया और समाज: कैलाश चन्द्र
 
 
संचार की व्यवस्था पौराणिक काल से ही मौजूद है। पौराणिक काल में संचार की यह अभिव्यक्ति मूकाभिव्यक्ति होती थी। इस आध्यात्मिक और अलौकिक संचार को ऋषि-मुनि अपनी तपस्या के माध्यम से ही जान पाते थे, किन्तु यह आम जन के लिए रहस्य की वस्तु था। कालांतर में भाषा के विकास के साथ ही मूकाभिव्यक्ति के तरीके परिवर्तित रूप में सामने आये। हालाँकि वैज्ञानिकों ने मूकाभिव्यक्ति को समझने के लिए ईथोलोजी के अंतर्गत कीट-पक्षियों और जंतुओं के व्यवहार के अध्ययन के प्रयास के साथ अनेक शोध कार्य प्रकाश में लाये। फिर भी मानना होगा कि मानव सभ्यत्ता का इतिहास प्राचीन होने पर भी आरम्भ में भाषा और लिपि के अभाव में मानव की ध्वनियों, संकेतों, चिह्नों, चित्रों व भाव-भंगिमाओं आदि के जरिए सम्प्रेषण किया करता था, जिसके पौरातात्त्विक तथ्य मौजूद हैं। कुछ समय बाद इसका स्वरूप कई सामाजिक गतिविधियों, यथा-भाषा, खेल, तमाशे, गीत-संगीत, कला-कौशल, नृत्य-नाटक, वास्तु विज्ञान आदि तथा सभी क्षेत्रों के पीछे गहरी कला दृष्टि, अभिव्यक्ति क्षमता आदि के रूप में मुखरित हुआ। इसका विकास मानवीय जीवन के किसी गहरे उद्देश्य से अभिप्रेरित होने से होता है। इस प्रकार यह मानव की चेष्टा क्षमता तथा कर्म-शक्ति का व्यक्त रूप हैं, जो मीडिया की व्याख्या में प्रतिफलित हुआ और जो व्यवस्थित हुआ।
 
जब इंसान धीरे-धीरे संगठित और समुदाय व समाज के रूप में रहने लगा, तब माध्यमों का जरिया भी विकसित और दृढ होता नजर आया। जिससे इनका कार्य क्षेत्र भी अलग-अलग स्वतंत्र अध्याय और विषय के रूप में सत्ता स्थापित हो गई। वर्तमान समय में मीडिया अनेक रूप में हमारे सामने विद्यमान हैं। जैसे-जैसे औद्योगिक विकास व वैज्ञानिक उपलब्धियों के साथ-साथ वैश्विक अंतर्संबंधो के बदलते समीकरण और बढ़ती सामरिक व्यापारिक, राजनीतिक, राजनयिक आकांक्षाओं के बीच संचार के माध्यमों को भी गति मिली। सर्वप्रथम मुद्रण मशीन का आविष्कार, टेलीग्राम की खोज तथा चार्ल्स हैवस द्वारा पहली समाचार एजेंसी की स्थापना, जगत में मील का पत्थर सिद्ध हुई। स्थलीय ट्रांसमीटर के पश्चात भूमिगत केबल और उपग्रह व्यवस्था ने संचार को नए आयाम दिए, जिसने संचार माध्यमों की काया पलट दी और भिन्न-भिन्न भांति से मीडिया का प्रभाव बढ़ा।
 
आजादी के आसपास टी.वी.प्रसारणों की शुरुआत के साथ ही इनकी गुणवत्ता बढाने के लिए कई चैनल माध्यम का जरिया बने। अब तो इन्टरनेट टी.वी. भी बाजार में उपलब्ध है। इन्टरनेट ने तो संचार माध्यमो में चार चाँद लगाने का काम किया, जो 80 के दशक में अवतरित हुआ और 90 के दशक में 'वर्ल्ड वाइड वेब' के जरिए इन्टरनेट पर ग्राफिक्स संभव हो गए। भारत में आज करीब 50 लाख लोग इन्टरनेट का इस्तेमाल करते हैं। इन्टरनेट के जरिए विभिन्न वेबसाइट के माध्यम से भौतिक जगत की समस्त सुचनाएं उपलब्ध हैं तथा साथ ही ई-मेल और चैटिंग के जरिए अज्ञात व्यक्तियों के साथ बातचीत और मनोरंजन भी किए जा सकते हैं। कम्प्यूटर के माध्यम से जिन संचार सुविधाओं का पोषण हुआ, उनमें ऑडियो-कांफ्रेंसिंग, वीडियो-कांफ्रेंसिंग, टेली-कांफ्रेंसिंग, रेडियो-टेक्स्ट, वीडियो-टेक्स्ट, टेली -टेक्स्ट जैसी आधुनिकत्तम सुचना प्रणाली भी शामिल है।
 
सम्प्रेषण, मुद्रण और प्रसारण के क्षेत्रों में हो रहे आविष्कार, प्रशिक्षण, उपग्रहों, बैंकों, किरणों, कम्प्यूटर और अंतर-महाद्वीपीय प्रकृति में वतुतः पत्रकारिता जगत में अद्भुत क्रान्ति मचा दी है। आज कंप्यूटर क्रान्ति से पत्रकारिता की काया पलट गयी है। वीडियो की वजह से घर-घर में मनोनुकूल फिल्में तैयार हो रही हैं, घर का हर सदस्य अभिनेता बन रहा हैं, अपनी ही कहानी का स्वमेव फिल्मांकन हो रहा हैं। उसी प्रकार वह दिन दूर नहीं जब प्रत्येक व्यक्ति पत्रकार होगा, उसका अपना पत्र होगा, समाचार के लिए कोई अन्याश्रित नहीं होगा। केन्द्रीय स्थल से समाचार पत्र घर-घर में ‘टेली-व्यू’ के कारण उपलब्ध होगा। ’टेली-व्यू’ के बटन को दबाकर हम समाचार, व्यापार जगत, खेल समाचार के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।
 
पत्रकारिता की इस ताकत को ब्रिटिश सरकार ने काफी महत्त्व दिया। इसी वजह से आरम्भ में ब्रिटिश सरकार के कड़े नियंत्रणों का सामना करना पड़ा, फिर भी भारतीय पत्रकारों के अदम्य साहस और जिजीविषा व समर्पित आस्था के परिणामस्वरूप तथा आर्थिक संकट, सीमित साधन, ग्राहक संख्या के अभाव में विभिन्न समस्याओं से जूझते हुए इन्होंने पत्रकारिता को स्वस्थ दिशा में गति प्रदान की। तत्कालीन पत्रकारिता का इतिहास वस्तुतः राष्ट्रीय आन्दोलन का ही इतिहास है। आजादी के संग्राम में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं तथा समाचार-पत्रों ने जो प्राणवान ऊर्जा संचरित की। वह इसके दायित्व बोध का प्रतीक है जो प्रशंसनीय हैं। 
 
लोक कल्याण, मनोरंजन तथा राष्ट्र निर्माण के साथ समाचार-पत्रों के तीन प्रमुख कर्तव्य माने जाते हैं, उनमें जनमत को प्रदर्शित करना, जनमत को तैयार करना तथा जनमत का मार्ग निर्देशन करना। परन्तु वर्तमान समय में भी मीडिया का दायित्व बदलता नजर आ रहा है। जिसे वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीवान के कथन से आसानी से समझा जा सकता है, “आज मीडिया संस्थानों में काम करने वाले अपने अधिकांश साथियों को गाड़ियों पर प्रेस लिखवाकर घूमते देखता हूं तो यह आशंका बलवती हो जाती है कि मीडिया के नाम पर हमें पुलिस परेशान नहीं करती, सरकारी दफ्तरों में आसानी से काम हो जाता है, डॉक्टरों की क्लीनिक में नंबर नहीं लगाना पड़ता, बच्चों के एडमिशन में सहूलियत मिल जाती है, सारे नेता अधिकारी हमसे एक फोन की दूरी पर होते हैं। ये तो सामान्य सहूलियतें हैं। कई पत्रकार तो ऐसे भी होते हैं, जिन्हें थानों से बंधी-बंधाई रकम मिलती है। वे इतने प्रभावशाली होते हैं कि छोटे-मोटे सरकारी कर्मचारी का तबादला करवाने में भी मदद कर देते हैं। वे अपने प्रभाव का इस्तेमाल अपने या अपने किसी परिचित के पक्ष में सरकारी टेंडर हासिल करने तक में करते हैं।” आज एक पत्रकार/सम्पादक अपनी पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता को कहीं-कहीं नजरअंदाज कर व्यावसायिकता और सरकारिता की तरफ उन्मुख होता नजर आ रहा है। मीडिया समाज की दशा और दिशा बदलने में सक्षम है। दुर्भाग्य से गरीब और विकासशील देशों में मीडिया की भूमिका आज भी खुलकर सामने नहीं आ पाई है। वहां मीडिया या तो ऊंची पहुंच वाले राजनीतिज्ञों अथवा तानाशाहों के दबाव में खुलकर सामने नहीं आ पाता या फिर उनकी विरुदावलियां गाने में ही अपना भला समझता है। कॉरपोरेट सेक्टर की चमक-दमक में चुंधियाया मीडिया नीचे काश्तकार तबके के संघर्षों की कालिमा को नहीं देख पाता। मीडिया चाहे तो किसानों-मजदूरों को उनका हक दिला सकता है। बाजार का उतार-चढ़ाव और पूंजी का प्रवाह मजदूरों-किसानों के हाथों में हो सकता है। जरूरत है तो बस ईमानदार मीडियाकर्मियों की जो व्यर्थ थूक उछालने की बजाय सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति के प्रति कटिबद्ध हो। वर्तमान समय में मीडिया मजदूर, किसान या कोई भी ग्रुप जो विकास से दूर है, उसको मुख्यधारा में लाने तथा विकास में शामिल करने में दोहरी भूमिका अदा कर सकता है, बिलकुल एक पुल की तरह, जो सरकार और विकास से पिछड़े ग्रुप के बीच में हो जहां मीडिया सरकार या विकास की योजना बनाने वाले के लिए आंखे बनेगा, जो पिछड़े ग्रुप या विकास की धारा से दूर किसान, मजदूर वर्ग के पहचान कर सरकार की नजर में लायेगा, ताकि इस पिछड़े ग्रुप को भी विकास से रूबरू करवाया जा सके। वहीं पिछड़े व विकास से अछूते ग्रुप को विकास के फायदे और उससे उनके जीवन में क्या परिवर्तन होगा, उसकी जानकारी उन तक देगा। मीडिया दोनों के मिसमैच को दूर करना मीडिया का कार्य होगा। मीडिया अपने इस डबल रोल को बखूबी प्ले करके बहुत से जीवन बदलने में मदद कर सकता है।
 
वर्तमान समय में यह सब मीडिया क्यों नही कर रहा है, इन सबके पीछे वस्तुस्थिति क्या हैं, इनके विलाप प्रवचन और आत्माधिकार की राज-सत्ता शक्तियां और हिंदी प्रेस के आर्थिक रिश्तों को वैज्ञानिक नजरिए से समझना और विश्लेषित करना जरुरी हो जाता है। निःसंदेह स्वतंत्रता के बाद आरंभिक वर्षों में मीडिया स्वतंत्रतापूर्ण मूल्यों से प्रेरित थी। काफी हद तक उसमें अपने मिशन की भावना थी। उस समय ‘माध्यम से ही संदेश’ के गुरुमंत्रानुसार प्रेरित रहती थी। सामाजिक दायित्व व मूल्यों की प्रतिबद्धता तथा मालिकों के बीच बिलगाव जैसा कोई काँटा नहीं उभरा था। यह वह दौर था जब राजनीति सत्ता प्राप्ति से नहीं, वैचारिक शुद्धता और विचारात्मक प्रतिबद्धता से प्रेरित हुआ करती थी, परंतु वर्तमान दौर में मीडिया का स्वरूप और दायित्व में बदलाव दिखलायी दे रहा है। आज मीडिया में अपने संगरक्षकों को ज्यादा महत्त्व देने के साथ अपने दायित्वों की उपेक्षा करता नजर आ रहा है। वर्तमान समय में व्याप्त गंदी राजनीति को आधार बनाकर मीडिया ज्यादा से ज्यादा बदलती सरकार के प्रति प्रतिबद्ध्ता जाहिर कर रहा है, जो उनके मूल्य और दायित्व दोनों में परिवर्तन का सूचक है। साथ ही मीडिया अपने मुख्य उद्देश्य के साथ-साथ जनता के प्रति दायित्व को छोड़कर व्यावसायीकरण की आड़ में फंसता नजर आ रहा है। जो स्वयं मीडिया और देश के लिए ख़तरा साबित हो सकता है। इस व्यावसायिकता को हम प्रोफेशनलिज्म कह सकते है। ये हिंदी पत्रकारिता के बजाय अंग्रेजी पत्रकारिता में अधिक मुखरित हुआ। उदाहरण के तौर पर टाइम्स ऑफ़ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स के प्रकाशनों को माध्यम मानकर स्वीकार कर सकते हैं कि इन दोनों ने इलस्ट्रेड वीकली में जो व्यावसायिकता छठें, सातवें, आठवें दशक में रही उसकी तुलना में नव भारत टाइम्स और दैनिक हिन्दुस्तान में देखने को नहीं मिलती।
 
आज यह व्यावसायिकता और भी घटिया दर्जे की जुबान में लाइजनिंग तक भी पहुँच चुकी है। वर्तमान पत्रकारिता से यह अपेक्षा की जाती है कि वह व्यापारिक घरानों के लिए लाइजनिंग का हथियार बने। इस प्रतिकूल परिस्थिति से निबटने के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि मीडिया अपने दायित्वों को न भूले और अपने निर्धारित लक्ष्यों को आधार बनाकर कार्य को गति देवे तथा साथ ही सरकार का यह दायित्व हो जाता है कि मीडिया को कुछ हद तक स्वतंत्रता देवे, जिससे वह अपनी उचित भागीदारी निभा सके तथा मीडिया का दिशाभ्रमित होते ही उसका सही मार्गदर्शन व दिशा निर्देशन अपेक्षित हो जाता है।
 
 
 
 
 
 
 
 
सन्दर्भ सूची:
1. मीडिया विमर्श, रामशरण जोशी
2. मीडिया समकालीन सांस्कृतिक विमर्श, सुधीर पचौरी
3. जन माध्यम और भारतीय संस्कृति, धरवेश कठेरिया
4. मीडिया और हिंदी साहित्य, राजकिशोर
5. हिंदिया पत्रकारिता, महेंद्र कुमार मिश्रा
6. ‘मीडिया के मानक और लोग’  विषय पर राष्ट्रीय मीडिया संवाद 12 -14 मार्च 2010 महेश्वर मध्य प्रदेश

- कैलाश चन्द्र

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कैलाश चन्द्र

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