प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2016
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
लघुकथा- नई पृथ्वी
 
 
अचानक ही माउस पर मेरा हाथ फ्रीज हो गया। मॉनीटर का डिस्प्ले अजीबो-गरीब रंगीन लकीरों से भर गया। इसके पहले कि मैं कुछ समझ पाता, मैंने अपने आपको जड़वत पाया। हिल-डुल नहीं पा रहा था। तभी मेरी कुर्सी के पीछे से आवाज आई, ''तुम अपने ऑफिस सहित अपहृत कर लिए गए हो। तुम्हारी क्रियेटीविटी देखकर तुम्हें हम मौका देना चाहते हैं कि तुम एक नई पृथ्वी का निर्माण करो। तुम सर्च करो कि उपयुक्त स्थल कौनसा होगा? उसे कैसा बनाना चाहोगे? देखो सामने मॉनीटर पर अब गूगल मैप नहीं है। ये यूनिवर्स मैप है। जहाँ चाहो वहाँ जा सकते हो। शुरू करो अपना काम। पर याद रहे, हम तुम्हें सिर्फ 1 घंटा देते हैं। हमें तुम्हारी पृथ्वी पसंद नहीं आई, तो तुम्हें हमेशा के लिए मरना होगा। क्यों और कैसे? जैसे फालतू प्रश्न मत करना। तुम्हारी बनाई पृथ्वी पसंद आई, तो तुम्हें सदा के लिए उस पृथ्वी का मालिक बना दिया जायेगा। ताकि तुम उसे समय-समय पर एडिट कर सको। तुम्हारा समय शुरू होता है अब।''
 
मेरे हाथ अब फ्री हो गये थे। मैं अब हिल-डुल सकता था। सचमुच कम्प्यूटर पर अनन्त आकाश में घूमना अद्भुत लग रहा था। नई पृथ्वी बनाने का ख्याल आते ही टूल ऑप्शन पर मेरी नजर गई। नई पृथ्वी चुनने के कई ऑप्शन थे। जानवरों का आकार-प्रकार, पेड़ों की प्रकृति, जमीन की प्रकृति सहित कई तरह के ऑप्शन देखकर मैं चकित था। थोड़ी देर आकाश विचरण में ही मैं डुबता-उतरता रहा। वर्तमान पृथ्वी की कमियों को दूर कर अब नई पृथ्वी रचने के लिए मैं सुखमय पृथ्वी की कल्पना करना लगा। पृथ्वी से आकार में बड़ा एक ग्रह मैंने चुन लिया। सुरम्य जंगल, नदी, पहाड़, हिरण, भालू सहित दिए गए ऑप्शन से नए और निरापद जानवरों का मैंने चयन किया। लगभग नई पृथ्वी तैयार थी। इसके पहले कि मैं मनुष्य का चयन करता, मुझे पसीना आने लगा। सोच में पड़ गया मैं। यही इंसान धर्म में बँटा है, जाति में बँटा है, सम्प्रदाय में बँटा है, लिंग में बँटा है, रंग में बँटा है, देश में बँटा है, न जाने कितनी तरह से बँटा है। ये सिर्फ बँटे होते तब भी ठीक था। मगर ये तो प्रेम से रहना भी नहीं जानते। ये प्यासे हैं एक-दूसरे के खून के। आदमी आदमी से घृणा करता है। कहीं किसी को नीच जाति बताकर उसका अधिकार छीना जाता है, तो कहीं एक देश एटम बम की धमकी देकर दूसरे देश को ब्लेकमेल कर रहा है। आदमी आदमी के खिलाफ खड़ा नज़र आ रहा है। यानि एकमात्र इंसान ही पृथ्वी के लिए खतरनाक और अवांछित दिख रहा था।
 
अचानक अलार्म बजने लगा। देखा मैंने 5 मिनट शेष रह गये थे मेरे पास। जाने कहाँ से फुर्ती आई मुझमें। मैंने तुरन्त अपनी पृथ्वी को सर्च किया। पृथ्वी के दिखते ही उसे सिलेक्ट किया और डिलीट बटन दबा दिया। तुरन्त मेरे हाथ फ्रीज हो गए। पीछे से आवाज आई, ''ये क्या कर दिया तुमने?'' नीचे देखो पृथ्वी ब्लास्ट हो गई है। माउस मेरे हाथ से निकला। वह अपने आप काम करने लगा। रिसायकिल बिन फोल्डर पर क्लिक हुआ? लेकिन वहाँ पृथ्वी नहीं थी। मैंने कहा, ''शिफ्ट के साथ डिलीट की है। हमेंशा के लिए। अब पृथ्वी वापिस नहीं आ सकती।'' मैं हँसने लगा, ''हा...हा...हा...। ''
 
तभी आवाज गूँजने लगी, ''तुम मूर्ख हो। अब तुम्हें पृथ्वी नसीब नहीं हो पायेगी। तुम इन्सानों पर विश्वास करना ही हमारी भूल थी।''
मैंने कहा, ''मालूम है मुझे। मगर मेरा काम तो हो गया।''
 
''क्या काम हो गया जी?'' मैंने देखा बिस्तर पर पत्नी मुझसे सवाल कर रही थी। सामने दीवार की घड़ी में रात के दो बज रहे थे। जम्हाई लेते हुए मैंने कहा, ''सॉरी, अभी काम बाकी है।''

- सुरेश वाहने
 
रचनाकार परिचय
सुरेश वाहने

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कथा-कुसुम (1)