अप्रैल 2016
अंक - 13 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

रचना-समीक्षा

मानवीय सभ्यता को अनवरत चलाने वाला ईंधन है स्त्री: के. डी. चारण

 
 
 
जैसे महाभारत का पात्र 'अश्वत्थामा' कभी मर नहीं सकता है, वह सदैव मानवीय सभ्यता में अपनी मानसिक गंध भरता है और आगे भी ऐसे करता रहेगा क्योंकि यह आदमी की फितरत का एक हिस्सा है। कुछ इसी तर्ज पर कहूँ तो 'भित्ति' कभी अपनी हार नहीं मान सकती है। वह लड़ेगी, चोट खाएगी, फिर उभर कर आगे आएगी, जीतेगी और स्वयं को साबित करेगी। वह बार-बार ऐसा करती रहेगी क्योंकि वह 'स्त्री' है। प्रकृति में मानवीय सभ्यता स्त्री और पुरुष के आधार स्तंभों पर टिकी है। दोनों ही आधार अपनी-अपनी भूमिकाएं निभाते हैं और इसे बनाये रखते हैं। स्त्री को प्रकृति ने सृजना का अद्भुत वरदान बख्शा है, वह बड़ी सहजता से इन टूटने वाली चीजों को भी बचा सकती है या टूटी चीजों से कुछ नया बना सकती है, जो कभी-कभी नितांत मौलिक भी होती है। वह ऐसा बनाने में भी सक्षम है जिससे अपनत्व बढे और रागात्मकता भी बची रहे; चाहे इसके बदले में उसे कैसा भी बलिदान क्यों न देना पड़े।
 
हस्ताक्षर के मार्च अंक (महिला विशेषांक) में प्रकाशित रजनी मोरवाल जी की कहानी 'रिंग-अ-रिंग ओ' रोजेज' भी कुछ इसी तरह के आधारों पर खड़ी है। इस कहानी की शुरुआत भी कुछ-कुछ वैसे ही हुई है जैसे उदय प्रकाश की कहानी 'टेपचू' की होती है। लेखिका पाठकों को वाचिका के तौर पर घटना से जोड़ती है और कहानी के बारे में एक धारणा उनके दिमाग में बिठाकर कहानी की शुरुआत करके बीच-बीच में पाठकों को आगाह भी करती है कि कहानी मैं (लेखिका) जरुर कह रही हूँ मगर इसके पक्ष-विपक्ष या अच्छे-भले के लिए फैसला लेना, आप (पाठकों) पर छोड़ती हूँ। उदय प्रकाश सच ही तो कहते है, "कभी-कभी सच्चाई कहानी से भी ज्यादा हैरतअंगेज होती है।" शायद भित्ति की सच्चाई कहानी से भी ज्यादा वेदना भरी हो, इसलिए लेखिका इस तरह का 'रूपगत' प्रयोग कर रही हैं। वो पाठकों की संवेदना पर सब कुछ छोड़, क्लू देते हुए आगे बढ़ जाती है। इस तरह की कहानियों में पाठक खुद को अधिक तन्मयता से जोड़ पाता है मगर कभी-कभी ये भटकाव भी पैदा कर देती है। पाठक को इस तरह की कहानियां बड़ी सावधानी और ईमानदारी के साथ पढ़कर ही फैसले तक पहुंचना होता है। असल में कहानी से इतर या इस कहानी के समानांतर अथवा कुछ बाद की बात करूँ तो भित्ति से भी बदतर हालातों का सामना स्त्री आज के इस हाईटेक सोशल मीडिया के जमाने में कर रही है, जहाँ समानता और समाजीकरण के नारों के बीच भी स्त्रियों का शोषण जारी है।
 
स्त्री के स्त्री होने का दावा साबित करने के लिए उसे अपने लोगों के लिए जो-जो करना पड़ता है, यह कहानी उसी का गत्यात्मक वर्णन है जो हमारे आस-पास चल रहे भित्ति जैसे अलेखों चरित्रों से होकर कहानी के माध्यम से अनायास ही हमारे सामने प्रत्यक्ष हो उठता है और हम सोचने लग जाते हैं 'भित्ति' जैसे कितने हैं और क्यों..?? लेखिका ने मुख्य पात्र का नाम शायद इसी कारण से 'भित्ति' रखा है जैसे भित्ति पर असंख्य उकेरने होते है, आड़ी-तिरछी रेखाएं होती हैं और ये रेखाएं ही समयकणों के झड़ने से धीरे-धीरे दरारों का भयावह रूप धारण कर लेती है, जिन्हें हम कभी पढने की या नजदीक से झांककर जानने की कोशिश ही नहीं करते हैं या ऐसा चाहते भी नहीं हैं। वही भित्ति जो सबकी रक्षा का भार ग्रहण करती है और अपने ही भार से एक दिन थर्राकर गिर जाने का डर भी स्वयं में कहीं न कहीं छुपा कर रखती है। वह डरती क्यों है?? इसका कारण भी लेखिका बड़े सलीके से देती है कि कोई भी उसका सहारा जो नहीं बनता है, अगरचे कोई उस विकट समय में उसका सहारा बन जाए तो उसके गिरने का सवाल ही नहीं उठता है और उसके वितान तले सब सुखन चलता रहता है। पुरुष के भीतर भी स्त्री तत्व होता है, जब वह बुद्धि, संवेदना, कल्पना और चेतना का सहारा लेता है तभी वो सृजन करने में सक्षम बन पाता है। यह बुद्धि, संवेदना, कल्पना, चेतना व  भावुकता ही तो स्त्री तत्व की पहचान है और इन्हीं से मानवीय सभ्यता का प्रत्येक पहलु संचालित है। कहानी को कुछेक शब्दों में बताऊँ तो यह एक मध्यमवर्गीय परिवार की व्यथा-गाथा है, जो पुरुषवादी सोच के खूंटे से बंधा हुआ है, आम परिवारों की तरह ही। उस परिवार पर अचानक कोप-भाजन होता है और एकमात्र कमाऊ पूत या मुखिया (पम्मू) को कैंसर हो जाता है। उसकी यह बीमारी इतनी भयावह है कि उसे बिस्तर पर ही नित्यकर्म से निवृत करवाना पड़ता है। लेखिका ने यहाँ भित्ति की वेदना को मानो जीवंत कर दिया है। एक बारगी तो आपको भी पढ़ते ही कें (मलती) की सम्भावना बन सकती है।
 
खैर, भित्ति हारती नहीं है और वो पम्मू को शहर के बड़े अस्पताल में इलाज के लिए ले जाती है लेकिन यहाँ उस पर रहा-सहा कहर भी टूट पड़ता है और अचानक पम्मू वहां से गायब हो जाता है। पम्मू कहाँ चला जाता है इसका किसी के पास कोई उत्तर नहीं है, पर पम्मू के बीमारी के दिनों में भित्ति अक्सर यह सोचती है कि पम्मू की मौत के साथ ही इस परिवार की इतिश्री हो जायेगी। वह सोचती है रिंग-अ-रिंग ओ' रोजेज के बाद जो हुश अ हुश अ हुस्स्साअ...होता है ठीक उसी तरह से सब कुछ तबाह हो जाएगा। यह कहानी स्त्री होने का सही अर्थ कई बार बताती है पर अंत में वो भित्ति के माध्यम से स्त्री को और अधिक विराट अर्थ में प्रस्तुत करती है। भित्ति परिवार को टूटने से बचा लेती है, वह प्रकृति मना हो जाती है और 'रिंग-अ-रिंग ओ' रोजेज' जारी रहता है। वह यह साबित करती है कि "कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है" या "कुछ पत्तों के झड़ जाने से उपवन नहीं मरा करता है।"
 
जैसे निर्मल वर्मा, अमरकांत और संजीव की कहानियां साहित्येत्तर पठन के लिए भी उकसाती हैं, ये कहानी भी उस तरफ एक शिगाफा छोड़ती है और पाठक को  स्वतः प्रेरणा से ही कैंसर के कारण, लक्षण और उपायों के लिए पढने को कहती है। हस्ताक्षर पत्रिका टीम रजनी मोरवाल को इस सशक्त कहानी रचना के लिए बधाई की पात्र मानती है और आशा करती है कि वे ऐसी ही उत्कृष्ट रचनाएँ पाठकों के लिए करती रहें। शुभकामनायें......!
 
 
 
समीक्ष्य कहानी आप इस लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं-
http://www.hastaksher.com/rachna.php?id=320

- के.डी. चारण