अप्रैल 2016
अंक - 13 | कुल अंक - 56
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

उभरते स्वर
मोईन खरादी राजस्थान के दूरस्थ इलाक़े और मेरे गृहनगर साँचोर (जालोर) के एक तेज़ी से उभरते हुए युवा रचनाकार हैं। लिखने का शौक़ इन्हें स्कूल के दिनों से ही है लेकिन इस शौक़ को परवाज़ दी इन्टरनेट ने। संकोची स्वभाव और साहित्यिक माहौल की कमी की वजह से मोईन भाई लम्बे समय तक सिर्फ़ शौक़िया तौर पर लिखते रहे। अब कुछ अच्छे शायरों और शायरी के जानकारों से जुड़कर मोईन भाई के लेखन में कुछ ही महीनों में बहुत ज़बरदस्त सुधार आया है। शायरी के तत्व तो  इनमें ख़ुदा-दाद थे, बस तराशना भर था और यह काम मोईन भाई बा-ख़ूबी कर रहे हैं। इस बार 'उभरते स्वर' के माध्यम से आप पढ़ेंगे इनकी दो उम्दा ग़ज़लें।
 
- के.पी. अनमोल
________________________________________
 
 
ग़ज़ल
 
जाने कहाँ पर खो गई इन्सान की इन्सानियत
नादां बशर इतना बता है याद भी इन्सानियत?
 
आया ज़माना मतलबी सब को पड़ी है नफ्स की
ग़फ़लत भरे इस दौर में गुमराह हुई इन्सानियत
 
अबला की अस्मत नौचती हैवानीयत को देखकर
रुख को छुपा के रात भर रोती रही इन्सानियत
 
इस प्यार के संसार में सबसे बड़ा ये धर्म है
मज़हब का दूजा नाम है तेरी मेरी इन्सानियत
 
इन्सान तेरी ज़िंदगी इसके बिना इक लाश है
दिल उसका मुर्दा हो गया जिसकी मरी इन्सानियत
 
मतलब के इस बाज़ार में दुनिया के इस अखबार में
बिकने लगी है आजकल सस्ती बड़ी इन्सानियत
 
आजा तकब्बुर तोड़ दे इस ज़ुल्म का सर फोड़ दे
ऐज़ाज अब ज़ालिम से यूँ अच्छी नहीं इन्सानियत
 
**********************************
 
ग़ज़ल
 
महक के गुलशन को ताज़गी दे मेरे लिये वो गुलाब हो तुम
चमन मे जितने भी गुल खिले हैं सभी गुलों के शबाब हो तुम
 
तुम्हारी फुरक़त में आसमां के सभी सितारे गिने हुए हैं
तुम्हें ख़बर भी कहाँ है इसकी मेरे लिये क्या जनाब हो तुम
 
न पूछ कैसा नशा चढा है तेरी मुहब्बत का मेरे दिल पर
उतर उतर के चढे जो वापस बड़ी ही दिलकश शराब हो तुम
 
तेरा तसव्वुर करूँ जो दिल में तो मुश्को-अम्बर की खुश्बू छाए
महक वफ़ाओं की जिससे आए वही महकती किताब हो तुम
 
मैं मर ना जाऊँ खुशी के मारे, मेरी ही महफिल मे आज क्यूँकी
ख़बर मिली है मुझे कहीं से कि रूख पे डाले नकाब हो तुम
 
मेरा भी पेशा इसी से मिलता मेरा तज़ुर्बा तो बस यही है
कोई महाजन मिला ना पाए बड़ा ही उल्झा हिसाब हो तुम
 
दिया है 'ऐजाज' रब ने जितना कहाँ किसी को मिला है इतना
है मुफ़लिसी का ये दौर फिर भी बड़े ही दिल के नवाब हो तुम

- मोईन खरादी ऐज़ाज

रचनाकार परिचय
मोईन खरादी ऐज़ाज

पत्रिका में आपका योगदान . . .
उभरते स्वर (1)