अप्रैल 2016
अंक - 13 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
कहानी- ब्याह ???
 
 
"नैन-नक्श तो बडे कंटीले हैं, साफ़ सुथरे दिल को चीरने वाले! गर जुबान पर भी नियन्त्रण होता तो क्या जरूरत थी फिर से सेज चढने की।" 
"हाय हाय! जीजी ये क्या कह दिया? जो कह रही हो, सोचा कभी! तुम भी वो ही कर रही हो, वो ही जुबान बोल रही हो। न जीजी कोई औरत कब खुशी से दोबारा सेज सजाती है। जाने क्या मजबूरी रही होगी, कभी इस तरह भी सोचा करो। औरत की तो बिछावन और जलावन दोनों ही कब किसी के काम आयी हैं? वो तो हमेशा निरीह पशु-सी हाँकी गयी है। कभी इस देश, कभी उस देश। एक साँस लेने के गुनाह की इतनी बडी सजा तो सिर्फ़ एक औरत को ही मिला करती है। दुनिया भला कब बर्तन में झाँका करती है, बस कडछी के खडकने से अंदाज़े लगाती है कि बर्तन में तरकारी बची है या नहीं और आज तुम भी यही कर रही हो, बिना सोचे-समझे जाने आखिर क्यों ये नौबत आयी? आखिर क्यों औरत के सिर्फ़ हाड-माँस का ही हमेशा सौदा होता रहा बिना उसकी इजाज़त के, बिना उसके मन के।"
 
"मन, हा हा हा मन, अरी औरत का भी कभी कोई मन हुआ करता है? क्या हमारा तुम्हारा भी कभी मन हुआ किसी बात का? क्या हम नहीं जीये, क्या हम खुश नहीं रहे, क्या कमी रही भला बता तो रज्जो।"
"जीजी, तुम क्यों जानकर भी अंजान बन रही हो। किसे भुलावे में रखना चाह रही हो, मुझे या खुद को या इस समाज को। बताना जरा कितनी बार तुमने अपने मन से ओढा, पहना या कोई भी निर्णय लिया? जो किया सब जीजाजी के लिए किया, बच्चों के लिए किया, घर परिवार के लिए किया।"
 
"तो क्या गलत किया रज्जो? यही तो ज़िन्दगी होती है और ऐसे ही चला करती है। क्या हमारी माँ ऐसे नहीं जी या हमारी सखियाँ या आस-पास की औरतें ऐसे नहीं जीतीं तो इसमें बुराई क्या है। सबको सुख देते हुए जीना थोड़ा बहत त्याग कर देना तो उससे घर में जो वातावरण बनता है उसमें बहुत अपनत्व होता है और देख उसी के बल पर तो घर के मर्द बेफ़िक्री से काम धन्धे पर लगे रहते हैं। जाने तुझे कब ये बात समझ आयेगी कि औरत का काम घर की चारदीवारी को सुरक्षित बनाए रखना है और मर्द का उसके बाहर अपने होने की तैनाती का आभास बनाए रखना और ज़िन्दगी गुजर जाती है आराम से इसी तरह। भला क्या जरूरत थी इसे इतने ऊँचे शब्द बोलने की? भला क्या जरूरत थी इसे अपने भर्तार को दुत्कारने की, वो भी इस हद तक कि वो आत्महत्या कर ले। भला ऐसी सुन्दरता किस काम की, जो आदमी की जान ही ले ले। ऐसा क्या घमंड अपने रूप यौवन का जो एक बसे-बसाए घर को ही उजाड दे और तुम कहती हो चुप रहो। भई, अपने से ये अनर्थ देख चुप नहीं रहा जाता।"
 
"जीजी, तुम नहीं जानती क्या हुआ है? तुमने तो बस जो सुना उसी पर आँख मूँद विश्वास कर लिया, अन्दर की बात तुम्हें नहीं पता। यदि पता होती तो कभी ऐसा न कहतीँ बल्कि सुनयना से तुम्हें सहानुभूति ही होती। कभी-कभी सच को सात परदों में छुपा दिया जाता है। फिर भी वो किसी न किसी झिर्री से बाहर आ ही जाता है। बेशक सबको नहीं पता, मगर मुझे पता चल गयी है लेकिन तुम्हें एक ही शर्त पर बताऊँगी तुम किसी से कहोगी नहीं।"
(अचरज से रज्जो को देखते हुए) "अरे रज्जो, ये क्या कह रही है तू? जो सारे में बात फ़ैली हुई है, क्या वो सही नहीं है? तो सच क्या है? बता मुझे, किसी से नहीं कहूँगी तेरी सौं।"
 
"जीजी, जाने क्या सोच ईश्वर ने औरत की रचना की और यदि की भी तो क्यों नहीं उसे इतना सख्तजान बनाया जो सारे संसार से लोहा ले सकती। बेबसियों के सारे काँटे सिर्फ़ उसी की राह में बो दिए हैं और उस पर सितम ये कि चलना भी नंगे पाँव पड़ेगा। वो भी बिना उफ़ किए! बस ऐसा ही तो सुनयना के साथ हुआ है जो एक ऐसा सच है जिसके बारे में किसी को नहीं पता।"
 
"मुझे आज भी याद है, जब सुनयना डोली से उतरी थी जिसने देखा उसे ही लगा मानो चाँद धरती पर उतर आया है। खुदा ने एक-एक अंग को ऐसे तराशा मानो आज के बाद अब कोई कृति बनानी ही नहीं, जाने किस फ़ुर्सत में बैठकर गढा था कि जो देखता फिर वो स्त्री हो या पुरुष देखता रह जाता। चाल ऐसी, मोरनी को भी मात करे! बोली, मानो कोयल कुहुक रही हो। सबका मन मोह लेती। एक पल में दुख को सुख में बदल देती, किसी के चेहरे पर उदासी देख ही नहीं सकती थी। जैसे बासन्ती बयार ने खुद अविनाश के आँगन में दस्तक दी हो। हर पल मानो सरसों ही महक रही हो आँगन यूँ गुलज़ार रहता। आस-पड़ोस दुआयें देता न थकता, जिसका जो काम होता ऐसे करती मानो जादू की छडी हाथ में हो और अपने घर का काम कब करती किसी को पता भी नहीं चलता। क्या छोटा क्या बडा, सब निहाल रहते क्योंकि बतियाने में उसका कोई सानी ही नहीं था।
अविनाश के पाँव जमीन पर नहीं पड़ते उसे भला और क्या चाहिए था। ऐसी सुन्दर, सुगढ पत्नी जिसे मिल जाए उसे और क्या चाहिए भला। सास-ससुर, देवर, जेठ-जेठानी सबकी चहेती बनी हवा के पंखों पर एक तितली-सी मानो उड़ती फ़िरती और अपने रंगों से सबको सराबोर रखती। इसी सब में छह महीने कब निकले किसी को पता न चला।"
 
"अचानक एक दिन अविनाश के घर से रोने-चीखने की आवाज़ें सुन सारे पड़ोसी भागे, आखिर क्या हो गया ऐसा! जाकर देखा तो अविनाश की लाश बिस्तर पर पड़ी थी और सुनयना तो मानो पत्थर बनी खड़ी थी। अचानक जैसे काले बादलों ने उसके सुख के आकाश को अपने आगोश में लपेट लिया था। ऐसा क्या हुआ अचानक किसी को समझ नहीं आया। हर कोई पूछ रहा था मगर सब चुप थे। अविनाश की माँ दहाडें मार रो रही थी और जब उनसे पूछा तो जो सुना, सबके पैर के नीचे से जमीन खिसक गयी।"
 
"अरे, इस कलमुँही से पूछो। मेरे अविनाश को इसी ने मरने को मजबूर किया है। अगर इसने उसका कहना माना होता तो आज मेरा बेटा ज़िन्दा होता। सबके आगे अच्छे बनने का ढोंग किए घूमा करती है मगर आज तक अविनाश को छूने तक नहीं दिया खुद को। आखिर वो भी इंसान है! बस दो-चार बातें उसने कह दीं कि नहीं मानेगी तो मैं आत्महत्या कर लूँगा, देख ले! तो बोली, कर लो और देखो मेरा लाल मुझे छोड़कर चला गया। हमें तो पता भी न चला अन्दर ही अन्दर क्या चल रहा है वो तो कल रात इनकी आवाज़ें बाहर आ रही थीं तो हमने सुन लीं वरना तो पता भी न चलता आखिर हुआ क्या!"
 
सुनयना टुकुर-टुकुर सास के मुख को देखती रही। मगर जब सास का कोसना बंद नहीं हुआ और सब उसे ही दुत्कारने लगे तो घायल शेरनी-सी बिफ़र पड़ी और जो उसने कहा वो सुनने के बाद शायद कुछ भी सुनने को बाकी नहीं बचा था!
“हाँ, हाँ, मुझे ही दोष दो क्योंकि तुम्हारा आखिरी हथियार मैं ही हूँ न! जानते हो सब बेबस है, लाचार है, स्त्री है तो कुछ कर नहीं सकती, कुछ कह नहीं सकती मगर इतनी भी बेबस लाचार नहीं जो सच और झूठ सामने न ला सकूँ।"
 
इतने में पुलिस आ गयी, वो पोस्टमार्टम को ले जाने लगी क्योंकि मामला आत्महत्या का था, तो सास व घर के लोग रोकने लगे। मगर सुनयना बोल उठी, "क्यों नही ले जाने देते, किस बात का डर है, क्या इस बात का कि सच सामने आ जायेगा? मैं तो खुद चाहती हूँ सारी दुनिया को तुम्हारे घर की असलियत पता चले, ताकि फिर कोई लड़की मेरी तरह न बर्बाद हो।"
 
"चुप कर कलमुंही, बेटे को खाकर चैन नहीं पड़ा जो अब हम सब को खाने पर तुली है। आखिर चाहती क्या है? क्यों उसकी लाश की दुर्गति करवा रही है? अब उसकी मिट्टी को तो चैन से मिट्टी में मिलने दे।"
 
"नहीं, मैं तो सच को सामने लाना चाहती हूं ताकि सबको पता चले। वरना तो तुम लोग मुझे दोषी सिद्ध कर दोगे और मैं इतनी कमज़ोर नहीं जो अपने लिए न लड़ सकूँ। ये एक स्त्री की अस्मिता का सवाल है इंस्पैक्टर साहेब लाश को ले जाइए, मैं इंतज़ार करूँगी सच का।"
 
पोस्टमार्टम में पुष्टि हो गयी कि उसने ज़हर खाया है और पुलिस सबके कहने पर सुनयना को पकड़कर ले गयी। सभी को यही लगा कि सुनयना की वजह से अविनाश ने खुदकुशी की है। मगर कोई सुनयना ने तो ज़हर दिया नहीं था, इसलिए पुलिस उसे हिरासत में ज्यादा दिन रख नहीं पायी। सुनयना के घरवाले उसे अपने घर ले गए और किसी तरह मामले को रफ़ा दफ़ा किया गया और सबको यही लगा कि सुनयना गुनहगार है। जबकि असलियत सात पर्दों में कैद छटपटा रही थी बाहर आने को। क्योंकि पोस्टमार्टम में एक तथ्य और उजागर हुआ था, जिसे सबसे छुपा लिया गया था। मगर सुनयना चुप बैठने वालों में से नहीं थी, वहीं उसके घरवालों ने उसी बिनाह पर सुनयना को मुक्त करवा लिया था उन लोगों से! वरना तो जाने वो बेगुनाह उस गुनाह की सजा भुगतती जो उसने किया नहीं था और बल्कि तब तक भुगत भी रही थी, एक ऐसा जीवन जीकर जिसे शायद ही कोई लड़की स्वीकार कर पाये और इस तरह जी पाये जैसे उसने जीया था। इतने कम दिनों में सभी को अपना बना लेना क्या इतना आसान होता है? हर किसी के दिल में जगह बना लेना जबकि आज के वक्त में लोग अपनों को नहीं जान पाते, इतने से दिनों में उसने तो जैसे एक अलग संसार ही खड़ा कर लिया था अपने लिए। ये सब यूँ ही संभव नहीं हुआ था बल्कि सुनयना के त्याग और तपस्या का फ़ल था और अब वो उसे बेकार नहीं जाने देना चाहती थी। इसलिए उसने अपने तरीके से सच्चाई सामने लाने की कोशिशें शुरु कर दीं ताकि कम से कम जिन लोगों के दिलों में उसने स्थान बनाया था वो तो उसे नफ़रत से याद न करें।
 
एक दिन मैं इस्कॉन मंदिर गयी थी। वहीं अचानक सुनयना से मिलना हो गया, तो गले लगकर भरभरा कर रो पड़ी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इसे क्या कहूँ क्योंकि तब तक मैं भी यही मानती थी कि इसके कारण एक हँसता खेलता परिवार बर्बादी के कगार पर पहुँच गया। मगर उसने कसम देकर मुझे रोका और कहा, "आप जानना नहीं चाहेंगी मौसी कि सच क्या था?"
उसके शब्दों ने मेरे पाँव जकड लिए, दूसरी ओर उत्सुकता के पंछी भी कुलबुलाने लगे क्योंकि जिस दृढता से उस दिन वो सब आगे बोल रही थी तो लगता था कि जो दिख रहा है उसके पीछे भी जरूर कोई ऐसी कहानी है जो सबसे छुपाई जा रही है। इसलिए मैं रुक गयी जानने क्योंकि कभी भी एक पक्ष सुनने पर कोई फ़ैसला सही नहीं होता। दोनों पक्षों को मौका तो मिलना चाहिए अपनी सफ़ाई देने का और मैं बैठ गयी वहीँ मंदिर में एक कोने में उसके साथ जाकर।
 
"हाँ, कहो सुनयना। क्या कहना चाहती हो? मैं भी जानना चाहती हूँ, आखिर ऐसा हुआ क्या जो तुमने ये कदम उठाया?"
"मौसी, आज सारी दुनिया के लिए मैं ही गुनहगार बना दी गयी, मगर यदि आप सत्य जानतीं तो कभी ऐसा न कहतीं! बल्कि उस पूरे परिवार से घृणा करतीं। ऐसे लोग समाज पर बोझ हुआ करते हैं मगर जाने इनके झूठ कैसे परवान चढ जाया करते हैं और एक स्त्री के सच भी जाने किन कब्रों में दफ़न कर दिये जाते हैं कि वो सच कहना भी चाहे तो उसे झूठ का लिबास पहना दिया जाता है और कलंकित सिद्ध कर दिया जाता है।"
 
"मौसी, जिस दिन मैंने डोली से नीचे पाँव रखा उस दिन मुझे लग रहा था संसार की सबसे खुशनसीब स्त्री हूँ मैं। मगर मुझे नहीं पता था कि ईश्वर ने मुझे रूप देकर मेरे नसीब से मेरा सबसे बड़ा सुख ही मुझसे छीन लिया है। जाने किस कलम से विधाता ने मेरा भाग्य लिखा था, जब सुहागरात को मुझे पता चला कि अविनाश नपुंसक हैं। यूँ लगा जैसे आस्माँ में जितनी बिजली है वो सब एक साथ मुझ पर गिर पड़ी हो। मैने उनसे पूछा, "आप जानते थे ये सत्य तो क्यों मेरा जीवन बर्बाद किया? आपको ये शादी करनी ही नहीं चाहिए थी।"
 
"तुम सही कह रही हो मगर घरवालों के दबाव के कारण मुझे ऐसा करना पड़ा। उनका कहना था, "तुम ऐसे अकेले कैसे सारी ज़िन्दगी गुजारोगे? कोई ऐसा भी तो हो जो हमारे बाद तुम्हारा साथ दे, समझे, तुम्हारे दुख-सुख में तुम्हारे काम आए और जहाँ तक वो बात है तो एक बार शादी हो जाए तो कौन स्त्री अपने मुख से ऐसी बातें कहती है।"
"मैने उनसे कहा भी कि मैं किसी को धोखा नहीं देना चाहता बल्कि इस तरह तो मैं किसी का जीवन ही बर्बाद कर दूँगा बल्कि उसकी जगह किसी बेसहारा को जीवनसाथी बना लूँ जो मेरी तरह ही हो तो उनका कहना था कि ऐसा मिलना कहाँ संभव है और आज कोई इश्तिहार नहीं दिये जाते कि ‘एक नपुंसक के लिए दूसरे नपुंसक साथी की आवश्यकता है ताकि दोनों एक-दूसरे का सहारा बन जीवन बिता सकें’ और फिर हम उसे सब सुख देंगे तो क्यों नहीं निर्वाह करेगी आजकल की लड़कियों को और चाहिए ही क्या होता है। जहाँ पैसा देखती हैं, खिंची चली आती हैं क्योंकि उन्हें सब सुख सुविधायें चाहिये होती हैं। वो तुम उसे मुहैया करवाओगे ही, तो वो इन बातों को इग्नोर कर देती हैं।" मेरे मना करने पर मुझे अपनी कसम और प्यार का वास्ता देकर जबरदस्ती मेरी शादी तुमसे करवा दी है। मगर मेरी तरफ़ से तुम स्वतंत्र हो, सुनयना। चाहो तो आज और अभी इसी वक्त मुझे छोडकर जा सकती हो।
 
मौसी, मैं एक-एक शब्द के साथ अंगारों पर लोटती रही। मुझे समझ नहीं आ रहा था, इन हालात में मुझे क्या करना चाहिए? मैं रोती रही, सिसकती रही और सुबह का इंतज़ार करती रही। सुबह होते ही इनकी माँ मेरे पास आयीं और बोलीं, देख बहू, तू सारा सच तो जान ही गयी होगी। बेटी, हम तुझे कोई तकलीफ नहीं होंगे देंगे। तुझे पूरी स्वतंत्रता होगी, अपनी  मर्ज़ी से जीने की। जैसे अपने घर में करती थी, वैसे ही यहाँ भी रहेगी मगर ये सच किसी से मत कहना वर्ना समाज में हमारी कोई इज्जत नहीं रह जायेगी। हम ही जानते हैं हमने कैसे दिल पर पत्थर रखकर ये शादी की है ताकि अविनाश को हमारे बाद कोई तो हो जिसे वो अपना कह सके और हाथ जोड़कर मेरे पैरों पर गिर गयीं और मैं भौंचक्क सी रह गयी। 
 
"ये क्या कर रही हैं आप माँजी! ऐसा करके मुझे शर्मिंदा मत करिए। मैं तो आपकी बेटी जैसी हूँ, मेरे पैरों में मत गिरिये।"
"न बेटी, हो सके तो मुझे माफ़ कर दे। पुत्र मोह में मैंने तेरे जीवन की आहुति दे दी है ईश्वर मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा। तू एक माँ के दिल को यदि समझती है तो तू ये सच किसी से नहीं कहेगी।"
मुझे असमंजस में छोड़ वो रोती बिलखती चली गयीं और मैं किंकर्तव्यविमूढ-सी बैठी रही ये सोचते मुझे क्या करना चाहिए?
यूँ तो मेरे परिवार में यदि ये बात किसी को पता चलती तो एक पल न छोड़ते बेशक बहुत ज्यादा पैसे वाले नहीं हैं मगर अपनी बेटी का जीवन बर्बाद होते तो नहीं देख सकते थे मगर मुझे उनके साथ अपनी छोटी बहनों की भी चिंता होने लगी।
 
कल को मैं यदि वापस चली गयी तो लोग क्या कहेंगे? कौन मेरी बहनों का हाथ थामेगा? कोई इस सच को जल्दी से नहीं स्वीकारेगा। जितनी जुबान होंगी, उतनी ही बातें बनेंगी। आखिर कितना पैसा लगा है मेरी शादी में। अब पापा फिर से एक नए सिरे से मेरी ज़िन्दगी को आकार देना चाहेंगे और फिर इतना पैसा लगायेंगे तो कैसे संभव होगा मेरी दोनों बहनों का ब्याह? मैं सोचते सोचते बेचैन हो गयी और उसी बेचैनी में अपने परिवार और उसके भविष्य के लिए मैंने ये निर्णय लिया कि अगर मेरा जीवन बर्बाद हो गया है तो कम से कम अपनी बहनों और अपने परिवार को तो उस दोजख में न धकेलूँ। इसलिए मैंने अपनी किस्मत से समझौता करने की ठान ली और मुख पर जरा-सा भी गिला शिकवा न लाते हुए ज़िन्दगी जीने लगी।
 
अविनाश तो मेरे इस त्याग से जैसे बेमोल बिक गए। मैं जो कहती वो हर वक्त करने को तैयार रहते। मेरी छोटी से छोटी बात का ऐसे ख्याल रखते कि मुझे अहसास नहीं होता कि मेरे पास एक शरीर भी है जिसकी भी कोई जरूरतें होती हैं।
ज़िन्दगी एक ढर्रे पर चलने लगी थी मैंने अपनी किस्मत के लिखे को स्वीकार लिया था। मगर मुझे नहीं पता था कि किस्मत अभी मेरे साथ और खेल खेलने वाली है जो मैं स्वप्न में भी नहीं सोच सकती थी एक दिन वो हुआ। 
 
मैं सो रही थी, तभी मुझे अपने शरीर पर किसी हाथ के रेंगने का अहसास हुआ तो देखा मेरी साड़ी पैरों से उघड़ी पड़ी है और मेरा श्वसुर मेरे पैरों पर हाथ फेर रहा है। मैं उसे धकियाते हुए चीखती हुई खड़ी हुई तो सब लोग कमरे में आ गए और मैं रो पड़ी सब बतलाते हुए। तो मेरी सास बोली, "अरे तो क्या हुआ? तुझे भी तो जरूरत होती होगी किसी मर्द की। पिघले सीसे से उसके शब्द मेरे कानों में गिरे और मैं हैरान हो उसे देखने लगी। भूल गयी कुछ पल को कि अभी मेरे साथ क्या घटा है।
मैं हैरान थी देखकर कि कैसे एक औरत अपनी सारी मान मर्यादा को दांव पर लगाकर अपने पति को दूसरी औरत के पास बेझिझक भेज रही थी। मुझे उस दिन अपने निर्णय पर बेहद पछतावा हुआ जब सास ने कहा, "आस-पास वाले पूछते हैं कब खुशखबरी सुना रही हो तो मुझे चुप रह जाना पड़ता है। सच किसी से कह नहीं सकती और जो सब चाहते हैं, वो हो नहीं सकता। इसलिए हमने सोचा, घर की बात घर में ही रहेगी और सबकी जुबान भी बंद हो जाएगी। बस एक बार तू इनके साथ सम्बन्ध बना ले।"
 
"ओह, मौसी! मैं बता नहीं सकती उस एक पल में मैं कितनी मौत मर गयी। जिन्हें पिता तुल्य स्थान दिया हो उनके साथ ऐसा सम्बन्ध मैं सोच नहीं सकती थी। सोचकर ही उबकाई आ रही थी। इतनी घृणित सोच! ग्लानि से भर उठी मैं।"
 
उस दिन अविनाश घर पर नहीं थे, तो मैंने उन्हें कहा, "यदि उन्हें ये सब पता चलेगा तो आप सबके इस कुकृत्य पर सोचिये कितने शर्मिंदा होंगे वो। क्या आपका यही प्रेम है अपने बेटे से? कि उसकी ब्याहता पर कुदृष्टि रखो? मैंने आज तक कुछ नहीं कहा चुप रही, इसका ये मतलब नहीं कि आप सबकी सही गलत हर बात में साथ दूँगी। मैं ऐसा हरगिज नहीं करूंगी। यदि ऐसी ही चाहत है तो कोई बच्चा गोद ले लो, उसे एक घर दे दो, कम से कम एक तो नेक काम होगा। मगर उनका कहना था, उन्हें तो अपना ही खून चाहिए। पराया तो पराया होता है और अपना अपना! ये कैसा अपनापन था, जहाँ अपना जो था वो ही अपना न था!
 
अभी हमारी ये जिरह चल ही रही थी कि अविनाश आ गये। जैसे ही उन्होंने ये सब सुना तो उनकी तो जुबान पर ही जैसे लकवा मार गया और सबने समझा वो भी यही चाहते हैं। इसलिए जबरदस्ती उन्होंने श्वसुर के साथ मुझे कमरे में बंद कर दिया। इधर जैसे ही ये संभले, इन्होंने प्रतिकार किया कि ये सब क्या कर रहे हो तुम लोग। उस पर क्यों इतना अन्याय कर रहे हो?
वैसे ही तुम लोगों ने अपने प्यार का वास्ता देकर उसका जीवन बर्बाद कर दिया, अब फिर क्यों तुम उसे जिंदा ही चिता पर धकेल रहे हो। वो जैसे ही दरवाज़ा खोलने को आगे बढे, मेरे देवर और जेठ ने उन्हें पकड़ लिया और दूसरे कमरे में बंद कर दिया।
 
इधर मैं अपने श्वसुर से बचने का प्रयास कर रही थी उधर उनकी आवाजें आ रही थीं।
माँ, मुझे बाहर निकालो वर्ना बहुत बुरा होगा। मैं आत्महत्या कर लूँगा। यहाँ मैंने तुम्हारे कमरे में रखी चूहे मरने की दवा खोज ली है। कमरा खोलो माँ।
तो उनकी माँ बाहर से बोली, अविनाश हम जो कर रहे हैं सबके भले के लिए ही कर रहे हैं और तू बेकार की धमकी न दे।
माँ, मैं धमकी नहीं दे रहा सच कह रहा हूँ।
न बेटा मेरी उम्र यूँ ही नहीं गुजरी, तेरी गीदड भभकियों में मैं नहीं आने वाली।
और थोड़ी देर तक जब उनकी कोई आवाज़ नहीं आयी तो इन लोगों को लगा कि कहीं सच में तो ………?
 
जैसे ही दरवाज़ा खोला उन्होंने तो मेरा संसार लुट चुका था। थोड़ी देर ये लोग कोशिश करते रहे मगर मात्रा इतनी ज्यादा थी कि तुरंत ही असर हो गया। न अस्पताल लेकर गए न डॉक्टर को ही बुलाया, जाने क्या सोच थी उन लोगों की।
क्योंकि ज़हर से शरीर नीला पड़ने लगा था इसलिए सुबह सारा दोष मेरे सिर मढ दिया गया।
 
"अब बताओ मौसी, इस सबमें मेरा क्या दोष था? क्या इस सबके बाद कोई किसी पर उसके आँसुओं पर विश्वास कर सकेगा जैसा मेरी सास ने मेरे साथ किया?"
"मौसी, मैं अपने आंसुओं को पीती रही, सिसकती रही, मन में उठते अतृप्त ज्वार को अपने अश्रुओं की बूंदों से सींच-सींच कर आंच को धीमी करती रही, मेरे भीतर सुलगती हुई अतृप्त वासना मुझे हर क्षण झकझोरती रही, फिर भी बिना विचलित हुये एक गृहस्थ सन्यासन की तरह घर की मान-मर्यादा और प्रतिष्ठा को ही अपनी धरोहर समझ किसी तरह जीती रही, लेकिन घर में भी क्या एक औरत सुरक्षित नहीं? क्या औरत आज भी एक वस्तु है, सिर्फ एक उपभोग की वस्तु? इसके सिवा कुछ भी नहीं?"
 
"या अपनी शारीरिक जरूरतों को नज़र अन्दाज़ करने के गुनाह की ये सज़ा मिली थी मुझे?"
"या स्त्री का स्त्री पर विश्वास करना आज के कालखंड की सबसे बडी त्रासदी है?"
"या प्रतिरोध न करने की यही सज़ा होती है कम से कम आज एक स्त्री के लिए?"
"अंधेरे की ओट में भविष्य को दाँव पर लगा मुस्कुराना दोष था?"
"अब तुम ही बताओ मौसी ………
क्या स्त्री होना दोष था या खूबसूरत होना या परिस्थितियों से समझौता करना?"
 
ये कह वो तो चली गयी मगर तब से आज तक उसके शब्द मेरे जेहन में हथौड़ों की तरह बज रहे हैं………स्त्री के भाग्य में लिखे शून्य का विस्तार खोज रही हूँ तब से अब तक जीजी…………क्या है कोई जवाब तुम्हारे पास?

- वन्दना गुप्ता

रचनाकार परिचय
वन्दना गुप्ता

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कविता-कानन (2)कथा-कुसुम (1)