प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2016
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

रचना-समीक्षा
इस समझौतावादी समय में दिल की सुनकर ही संस्कार बचाए जा सकते है: के. डी. चारण
 
 
समय-बेल पर ज़िंदगी के सुन्दर फल-फूल लगते है; यह ऐसी बेल है, जिस पर फूलों और उलझनों के साथ छिपे हुए कांटे भी बहुलता में है, जो इन काँटों से सावधान होकर फल-फूल चुन लेता है, वही श्रेष्ठ माना जाता है और इतिहास उनका हर्फों में जिक्र करता है। 'हस्ताक्षर' के पिछले अंक (फरवरी 2016) में अंकिता कुलश्रेष्ठ की तीन लघु कहानियां प्रकाशित हुई थीं, ये तीनों रचनाएँ इसी समय बेल के अवयव-सी लगती हैं। जिसमें उन्होंने जिंदगी के तीन अलग-अलग अनुभवों को कथा सूत्र में पिरोया है। वैसे, हर युग में कुछ ऐसी प्रवृतियां होती हैं, जो रचनाकारों का दम घोंटने लगती हैं, उसको उकसाती हैं और वो कलम का सहारा लेकर उनसे निजात पाने का प्रयास करता है। आज के सन्दर्भों में स्थितियां और भी भयावह बन गयी हैं इसलिए रचनाकार को पता है कि एक दधीचि से काम नहीं चल सकता। परिणामस्वरूप उसकी चाह और बढ़ जाती है और वो ऐसे असंख्य दधीचि बुराई के खिलाफ खड़े देखना चाहता है।
 
ऐसे में प्रभावी परिवर्तन के लिए लघु कहानियों का चुंगट्या (चिकोटी) गद्य साहित्य की सारी विधाओं पर भारी पड़ सकता है, बशर्ते उनके लेखन व सम्पादन में और जागरूक बना जाए। उपन्यास और कहानियों की लम्बी कथा योजना व एकरूपता के अभाव के कारण एक सामान्य पाठक में उलझाव उत्पन्न होता है और वह उसे आधा-अधूरा पढ़कर ही छोड़ देता है, जिसका प्रभाव यदा-कदा अनिष्टकारी सिद्ध होता है। वहीं लघु कहानियों में रचनाकार उसी कथ्य को बेहतरीन तरीके से न्यूनतम शब्दों में संप्रेषित कर देता है।
 
अंकिता कुलश्रेष्ठ की तीनों लघु कहानियां असल में एक ही कहानी की घटनाएँ लगती हैं क्योंकि ये हमारे आस-पास चल रही यथार्थ जिंदगी के तीन अलग-अलग सोपानों में घटित तीन घटनाएँ हैं, जिन्हें लेखिका ने शानदार कलेवर में बहुत कम शब्द खर्च करते हुए रूपायित किया है। पहली लघु कहानी 'चलो दिल की सुनें' थोड़ी बनावटी-सी जान पड़ती है। इस बनावटीपन में भी एक सन्देश छिपा है। दरअसल पश्चिम से प्रभावित हमारी सभ्यता के अधिकांश लोग मानवीय संबंधों में भी इतनी जोड़-बाकी भर देते हैं कि इसका फलन संवेदन शून्यता के रूप में मिलता है। फलतः हम 'हम' से 'मैं' में तब्दील हो रहे हैं। इस तब्दीली की संख्या में दिन-ब-दिन तेजी से इजाफा भी हो रहा है। हालांकि तीनों लघु कहानियों के मूल में लेखिका की यही भावना काम करती है, जो वास्तव में यथार्थ जीवन के चुभते अनुभव की शक्ल में हमारे सामने आकार लेकर हम सबको आहत तो जरुर करती है पर महज कुछ समय तक ही, उसके बाद हम फिर से संवेदन शून्य हो जाते हैं।
 
'चलो दिल की सुनें' शीर्षक वाली लघु कहानी में आर्थिक रूप से कमजोर तबके की उत्कट जिजीविषा को दिखाने के साथ मानवीय संवेदना के स्तर को ऊँचा उठाने का आलाप लेखिका दिल से सुनने को आह्वान करती है। वहीं 'संस्कार' नामक लघु कहानी के माध्यम से भारतीय संस्कारों को बचाए रखने का स्वर भरती है। हालांकि 'संस्कार' की कथा वस्तु को बहुत फैलाव दे दिया है, फलस्वरूप लेखिका उसको चुस्त-दुरुस्त बनाए रख पाने में असफल साबित हुई हैं और अंत में लघु कहानी को जल्दी समेटने के चक्कर में लेखिका सन्देश भी थोपती नजर आयी है। जहाँ तक मेरा व्यक्तिगत तौर पर मानना है कहानी में पाठक पर सन्देश थोपना नहीं चाहिए और सवाल लघु कहानी का हो तो बिल्कुल भी नहीं। रचनाकार को सन्देश थोपने से सदैव बचना चाहिए। इसी क्रम की तीसरी लघु कहानी 'समझौता' बोध, संवेदन व अभिव्यक्ति के स्तर पर दोनों लघु कहानियों से बहुत आगे और सटीक भी है। रोजमर्रा की ज़िंदगी में कभी-कभी अनायास ही कोई ऐसी घटना घट जाती है, जो उसके भोक्ताओं के लिए एक विकट त्रासदी और व्यवस्था पर एक तीखा सवाल बन जाती है। असल में इस तरह की घटनाओं के लिए दोषी कौन होता है, यह तय कर पाना बहुत मुश्किल होता है। इस लघु कहानी के माध्यम से यह सवाल भी मुखर किया है कि इन समझौतों का अंत कब और कैसे हो सकता है?
 
लेखिका ने बड़े उम्दा तरीके से दिखाया है कि इन घटनाओं में क्षति दोनों पक्षों को होती है और वे अच्छे से जानते भी हैं कि घटना का होना समय की ही चूक है मगर ऐसी स्थिति में किसी तीसरे पक्ष द्वारा कोर्ट-कचहरी और कानून का डर दिखाकर जो समझौता किया जाता है वो महज दोनों पक्षों की भावनाओं के साथ किया गया एक खिलवाड़ होता है। जिसके परिणामस्वरुप तीसरे पक्ष की अँगुलियों से मलाई की खुशबू कई दिनों तक आती रहती है।
सामान्यतया ऐसी घटनाओं के बाद ऊपरी तौर पर सब हर ऱोज की भांति चलने लगता है मगर भीतरी धारा में एक घड़ियाली-सवाल सदैव दौड़ता रहता है जो देश की व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कार्यव्यूह पर प्रश्न चिह्न लगाता है, जिसे हल किया जाना अत्यंत आवश्यक है। अन्यथा, ऐसे समझौतों के बाद डेरा बदलने वाले और समझौतों के भंवरजाल से टकराने वाले असंतुष्ट लोगों की संख्या कैसा भविष्य बुनेगी? किस तरह की व्यवस्था स्थापित कर पाएगी?
 
अंत में एक बात और कहना चाहता हूँ कि इन तीनों लघु कहानियों के चयन व प्रकाशन का जो क्रम सम्पादक महोदय ने तय किया है वो उनके सम्पादन कौशल को दिखाता है, जो निःसंदेह निकट भविष्य में लघु कहानी के सम्पादन क्षेत्र में एक अत्युतम कदम साबित होगा। मुझे अनायास ही 1932 में प्रेमचंद द्वारा विष्णु प्रभाकर को लिखे एक पत्र की पंक्तियाँ याद हो आयीं, जिसमें उन्होंने लिखा था- "कार्यालय में गल्पें बहुत आती है, इससे कितने ही लोगों की अच्छी रचनाएँ पड़ी रह जाती हैं।" (पंखहीन, दिल्ली, 2004 पृष्ठ 145)
उम्मीद करता हूँ आगे भी ऐसी ही स्तरीय और अच्छे क्रम की लघु कहानियां 'हस्ताक्षर वेब पत्रिका' के माध्यम से पाठकों तक पहुँचती रहेगी।
 
 
आप समीक्ष्य लघुकथाएँ इस लिंक पर जाकर पुनः पढ़ सकते हैं-
http://www.hastaksher.com/rachna.php?id=303

- के.डी. चारण