प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2016
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख
मध्यकालीन नारी भावना (तुलसीदास जी के संदर्भ में): प्राची सिंह
 
नारी, काव्य के मूल में आदिकाल से ही रही है और इसीलिए सर्वोच्च सम्मान विद्या की देवी के रुप में ‘सरस्वती’ को दिया गया है। प्रत्येक युग में नारी के विविध रुपों को देखा गया है। आदि युग से नारी समाज का प्रमुख अंग रही है। पितृ-सत्तात्मक युग रहा हो अथवा मातृ-सत्तात्मक युग, नारी ‘जननी’ होने के कारण सदैव उच्च पदस्थ एवं गरिमा मण्डि़त रही है। मानव जीवन में पग-पग पर नारी के त्याग, ममता, करुणा, अनुराग एवं उदारता के रुप में देखे गये हैं। नारी को जितने विविध रुपों में तुलसी ने चित्रित किया है और नारी चित्रण करते समय जितनी सहानुभूति तुलसी ने नारी पात्रों को दी है, उतनी मध्यकाल के किसी अन्य कवि ने नहीं दी।
 
तुलसी ने नारी के विविध रुपों का वर्णन किया है, परन्तु उनको नारी का पुत्री रुप सर्वाधिक प्रिय है। इसके पश्चात् माँ का रुप और फिर पत्नी का रुप। ऐसा माना जाता है कि वे नारी के रमणी रुप से भली भांति परिचित थे। जिसे इन पक्तियोें में देखा जा सकता है। ‘‘मृगनयनी के नयन सर को अस लाग न जाहि’- ‘नयन सर’।’’1 यहाँ नारी ‘नयन सर’ ही नहीं मारती। उसका समस्त मोहक सौन्दर्य मंगल विधायक भी है। वह करुणा से युक्त, सहानभूति और उदार भी है। इस प्रकार अपने सरल व्यंजनों की योजना के माध्यम से तीखे बाण छोड़ते हैं। एक अन्य उदाहरण में तुलसी ने सीता की वन्दना रामचरितमानस के आरम्भ में इस प्रकार से की है ‘‘जनक सुता जग जननी जानकी। अतिसय प्रिय करुणानिधान की।‘‘2 इन पक्तियों में नारी के तीनों रुपों में सीता की वन्दना की गयी हैं; सीता पुत्री है, माँ है और करुणानिधान राम की अतिशय प्रिय है। इस प्रकार स्पष्ट है जिस प्रकार से तुलसी ने नारी के तीनों रुपों का एक ही स्थल पर किसी अन्य देवी की स्तुति या वन्दना मुझे नहीं दिखलाई पड़ी है।
 
तुलसी का युग सामाजिक तथा सांस्कृतिक विघटन का युग रहा है। उस समय नारी भोग-विलास की वस्तु मात्र थी, उसका स्वयं का व्यक्तित्व नहीं था। वह राजपूत नरेशों के लिए विलास की वस्तु बन गयी थी। तुलसी का युग नैतिक पतन का युग था, जिसे डॉ. राजपति दीक्षित ने इन शब्दों में व्यक्त कियाहै- ‘‘विलासिता का वातावरण देश भर में व्याप्त था, लोगों में स्त्रैण्य की अभिव्यिक्ति हो रही थी, बड़े-बूढ़ों की उपेक्षा में वह हेतु थी।’’3 स्पष्ट है कि तात्कालिक युग नारियों के प्रति उपेक्षा का युग था, जिसमें मांसल सौन्दर्य के प्रति घोर आसक्ति भी थी। यहाँ पुरुष नारी के तन को देखने का अभ्यस्त हुआ। नारियों को पुरुषों की अपेक्षा कहीं अधिक नीचे स्तर का समझा जाता था, इसे प्रायः दासियों जैसा स्थान प्रदान किया गया।
 
तुलसी की नारी दृष्टि समझने के लिए रामचरितमानस के दो प्रसंगों को  रेखांकित करने की आवश्यकता है- शबरी और अहल्या का प्रसंग। तुलसीदास नीच और अधम समझी जाने वाली नारी को सम्मान और गरिमा का स्थान प्रदान करते हैं। शबरी भील जाति की स्त्री है वह तो ‘अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महं मैं मतिमंद अधारी।’’4 लेकिन सब कुछ जानते हुए भी राम उनके यहाँ कन्द-मूल फल प्रेमपूर्वक खाते हैं। वह उन्हें एक एक फल चुन-चुनकर खिलाती है। उसे ‘भामिन’ ‘करिबर गामिनी’ कहकर सम्बोधित करते हैं। राम उधर नारी का प्रतिवाद करते हुए कहते हैं-
           ‘‘नव महुँ एकौ जिन्ह के कोई। नारि पुरुष सजराचर कोई।।  
        सोई अतिसय प्रिय भामिनी मोरे। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरे।।’’5
 
पतित कही ताने वाली दूसरी नारी अहल्या है। ऋषि गौतम की परित्यक्ता पत्नी। देवता कहे जाने वाले इन्द्र ने अहल्या के साथ छल किया। उसका सतीत्व नष्ट किया, लेकिन गौतम जैसे ऋषि, पत्नी को ही दोषी ठहराते हैं, उसे क्षमा नहीं करते। यह नारी के सन्दर्भ में आज भी दृष्टव्य है कि जो पीड़ित है, उसे दण्ड़ दिया जाता है, पीड़क को नहीं। राम ने उसे पुनः नारी की गरिमा प्रदान की। इस देश की लाखों अहल्याएँ आज भी राम की प्रतीक्षा कर रहीं हैं। डॉ. सुधारानी शुक्ला का विचार है कि ‘‘तुलसी नारी की दिव्य विभूति के पारखी थे। गोस्वामी जी समाज में ऐसी नारियों को चाहते थे, जिनके द्वारा गृहस्थ-धर्म की पुनीत भावना का विनाश नहीं हो सका था।’’6 युगान्तकारी कवि होने के नाते अपने युग का पूरी ईमानदारी से चित्रण करने वाले तुलसी कोे यदि ‘युगीन परिवेश’ में रखकर देखा जाए तो वे नारी के महान पोषक एवं परिष्कारकर्ता ही सिद्ध होंगे।
 
तुलसी ने युग का यथार्थ चित्रण जैसा किया, वैसा अन्यत्र सहज प्राप्त नहीं। लोकमंगल की शीतलता प्रदायिनी वारिधारा से तुलसी ने ‘वासना के कीचड़ से सनी’ नारी का प्रक्षालन कर उसे ‘देवी’ बनाने का महान उपक्रम किया। नारी विषयक युगीन परिवेश में तुलसी जैसे ‘उदान्त के पोषण’ कवि के लिए यही प्रेय और ध्येय भी था। डॉ. राजाराम रस्तोगी का मत है कि ‘‘नारी के कामिनी रुप की निन्दा करके गुणों की शत-शत प्रशंसाएँ तुलसी ने अपने महाकाव्य ‘मानस’ में की है। नारी से ही रामभक्ति का आलोक पाकर वह मातृविहीन बालक माँ के प्यार और पत्नी के प्रेम की उदात्तता को जानते हुए नारी के प्रति सदा उदार रहा है।’’7 तुलसी ने नारी को गृहस्थ का केन्द्र बिन्दु मानकर उसकी परिधि में समाज, धर्म, नीतिपरक आचरण करती हुई नारी के सत् रुप की सदैव प्रशंसा की है। उसके गुणों को आदर्श का रुप प्रदान भी किया हैं।
 
अतः तुलसीदास के विचार में नारी के प्रति मर्यादा एवं पतिव्रत-धर्म सर्वोपरि रहा है। यद्यपि यह कामना नारी से नहीं अपितु पुरुष से भी एक पतिव्रत पालन तथा मर्यादा पालन की अपेक्षा रखती हैं। किन्तु समाज की आधारशिला, गृहस्थ की प्राण स्वरुपा नारी से धर्म, मर्यादा, पतिव्रत धर्म तथा समाज अनुकूल आदर्शो को दृढ़ रखने की वे अधिक अपेक्षा रखते हैं, उसी का परिणाम है कि चार सौ वर्षो से निरन्तर समाज तुलसी द्वारा प्रतिपादित आदर्शो को मानव-समाज के आचार का मापदण्ड़ मानकर दृढ़ता से पालन करता आ रहा है।
 
 
 
संदर्भ-
1. विश्वनाथ त्रिपाठी, लोकवादी तुलसीदास, संस्करण 1974, प्रकाशक राधाकृष्ण, दरियागंज दिल्ली, पृष्ठ संख्या- 56
2. वही पृष्ठ- 56
3. डॉ. योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुणा’, स्वयंभू एवं तुलसी के नारी पात्र, प्रथम संस्करण 1979, प्रकाशक कल्पना, पृष्ठ सं-58
4. सम्पादक विश्वनाथ प्रसाद त्रिपाठी, तुलसीदास, प्रथम संस्करण-1999, प्रकाशक- लोक भारती, पृष्ठ संख्या- 28
5. वही पृष्ठ- 28
6. डा़ॅ. योगेन्द्र नाथ शर्मा, पृष्ठ संख्या- 60
7. वही पृष्ठ संख्या- 60
8. तुलसीदास: जीवनी और विचारधारा, पृष्ठ संख्या- 191

- प्राची सिंह
 
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प्राची सिंह

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