प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2016
अंक -49

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

उभरते स्वर
वजूद
 
आज एक आम लड़की बस में बैठकर जा रही है
चढ़ते ही सोचती है कहाँ बैठूं?
किसी महिला के पास!
पर वहाँ कोई सीट खाली नहीं है
आज भगवान भरोसे ही जा रही है
चलो एक सीट मिली
किस्मत शायद साथ दे
पर उसे क्या पता यहाँ
सब भेड़िये हैं पुरुष की खाल में
ड्राइवर देख रहा है तुम्हें साइड के शीशे से
कंडेक्टर छू रहा है उंगलियां
टिकिट के नाम पर
क्या सफर से उतर जाओगी
नहीं-नहीं चुप रहोगी
सब कुछ सहती जाओगी
तुम देवी हो ना!
और ये वासना के पुजारी हैं
तुम्हारी ही बलि चढ़ाएंगे
देखो तुम्हारी सीट के पास कोई आया है
अरे! धक्का लग गया
सॉरी कहते ही आया है
अजीब सी घबराहट हो रही है ना!
डरो मत, कुछ नहीं हुआ
सिखाया था ना तुम्हें
ध्यान मत देना, हँसना मत, चुप रहना
अब सीख को याद करो
क्या हुआ?
क्या तुम्हें कोई छू रहा है
नहीं नहीं, अनजाने में हुआ होगा
पर जिसने तुम्हें छुआ वो तो हँस रहा है
अब पैर से पैर टकराया है
सीटी भी बज रही है
अब क्या करोगी
सब सहती जाओंगी
दुनिया की सीख को दोहराती जाओगी
कब तक चुप रहोगी
ये सफ़र तो अभी खत्म हो जायेगा
आगे क्या करोगी
चलो उठो
आज वही
बचपन का खेल याद करते हैं
Ready, steady, go याद है तुम्हें
आज करके दिखाना है
अपनी मंजिल पर बस के रुकते ही
इसके गाल पर
अपने वज़ूद के निशान छोड़ना है
उतर आना है
डरो मत
ये तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ पायेंगे
आज तुम्हारे साथ किया है
कल किसी और के साथ करेंगे
आज आम नहीं
कुछ ख़ास बन जाओ!!
 
*********************
 
क्योंकि में मै हूँ ना
 
तुमने कितना चाहा मैं टूट जाऊँ
मैं नहीं टूटी
तुमने कितना चाहा
मैं झुक जाऊँ
मैं नहीं झुकी
तुमने मुझे हमेशा कमजोर कहा
मेरे आत्मविश्वास को तोड़ा
मैं नहीं पिघली
कमजोर तुम थे
मैं नहीं
तुम यह नहीं समझ सके
तुमने मुझसे झूठ बोला
हर पल, हर दम
मैंने सत्य माना तुम्हें
विधाता जानकर
जब बात मेरे आत्म सम्मान की आई
तुम गायब थे
यह जानकर
तुम भूल गए मैं नारी हूँ
सृष्टि की एक मात्र रचना
जिसे बनाकर खुदा भी बहुत रोया होगा
पूछोगे नहीं क्यों?
उसने मुझे कोमल तन दिया
कोमल मन दिया
और मीठी जिह्वा भी दी
और फिर तुम्हें बना दिया
वो समझ गया उससे भूल हो गई
उसने मुझे सृष्टि की सबसे सुन्दर चीज दी
माँ बनने का उपहार
इसलिए सभी भावों को, रसों को मुझे दे दिया
रह गए तुम खाली और खोखले
हाँ, मैं नारी हूँ तुम जैसे पुरुष को
मैं ही पैदा करती हूँ चाहे कितना भी दर्प कर लो
इस सत्य को तुम्हें स्वीकार करना पड़ेगा
हाँ, तुम भी भागीदारी रखते हो
पर मैं तुम्हें नौ महीने पेट में रखती हूँ
अब बताओ मैं कैसे टूट जाऊँ
कैसे पिघल जाऊँ
क्योंकि मैं हूँ ना!!

- डॉ. विनीता मेहता
 
रचनाकार परिचय
डॉ. विनीता मेहता

पत्रिका में आपका योगदान . . .
उभरते स्वर (1)