मार्च 2016
अंक - 12 | कुल अंक - 56
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
कहानी- मेधा का पुरस्कार
 
टेम्पो वाले को पैसा देकर मेधावी बैग उठाकर आगे बढ़ी तो घर के सभी दरवाजे बन्द पाकर मन सशंकित हो उठा, उसके मन में प्रश्न उठा, "कोई है भी कि नही?" वह भी तो बिना फोन किये आ पहुंची है, कहीं सब लोग न हुए तो उसका सारा सरप्राइज धरा का धरा रह जाएगा। आने से पूर्व इस संभावना पर तो उसने सोचा ही न था। इधर कुछ दिनों से दीदी का कोई समाचार नहीं मिला था। वह तो यूं भी पत्र लिखने में आलसी रही है, फोन से ही काम चला लेती है, पर दीदी कितनी भी शिकायत क्यों न करे पर फिर भी नियमित पत्र लिखती ही रहती है। प्रथम बार ऐसा हुआ है कि एक माह हो गया और उनका पत्र नहीं आया, तब मेधावी को लगा इस बार दीदी सच बुरा मान गई हैं। इसीलिये वह कॉलेज से दो दिनों की छुटटी मिलते ही उन्हें बिना बताए ही मिलने चली आई। यह तो सुयोग ही था कि सुबोध को भी दिल्ली जाना था और मानव कॉलेज के टूर पर पहले ही गोवा गया हुआ था, वर्ना बीस बातें सोचनी पड़तीं हैं, उनके खाने का क्या होगा, कपड़े धुले, प्रेस किये हैं कि नहीं, आदि आदि। उसे सुबोध और मानव में कोई अंतर नहीं दिखाई पड़ता है, दोनों ही बाप-बेटे उस पर पूरी तरह आधारित हैं। एक काम भी स्वयं नहीं कर पाते। वह कितना नाराज होती है, पर सच तो यह है कि उसे भी अच्छा लगता है। जब दिनभर छोटी-छोटी बातों के लिये वह उसे पुकारते हैं। टेम्पो से द्वार तक की राह तय करते करते मेधावी ने विचारों की लम्बी यात्रा तय कर ली।
 
अपने ही विचारों में उलझी मेधावी ने घंटी बजाई तो अन्दर से दीदी की आवाज सुनकर जान में जान आई। दीदी दरवाजा खोलते ही उसे पाकर चौंक पड़ीं, उसने उत्साह से उनके गले लगते हुए कहा, "चौंक गईं न? मैंने सोचा दीदी को मुझसे सदा शिकायत रहती है कि मेरे पास दीदी के लिये समय नहीं तो देखो चिठ्ठी-विठ्ठी क्या, मैं स्वयं ही आ गई।" फिर दीदी को चुप देखकर उसे अनुभव हुआ कि, वही उत्साह से बोले जा रही है पर दीदी के चेहरे पर उसके आने से कोई विशेष प्रसन्नता के भाव नहीं हैं। तो क्या दीदी उसके आने से ख़ुश नहीं हुईं? पर अपने संशय पर उसने स्वयं को धिक्कारा। दीदी के स्नेह पर वह कैसे ऊँगली उठा सकती है? उन्होंने तो उसे कभी वरु से कम नहीं समझा है। वरु के नाम पर उसे ध्यान आया कि उसके आने की आवाज सुनकर भी अब तक वरु नहीं दिखाई दी, नहीं तो वह तो सबसे पहले ही उसका बैग छीनकर साधिकार उसके सामान का निरीक्षण करने लगती है। अन्दर आई तो सन्नाटा था, उसने पूछा, "दीदी वरु कहां है?" तो दीदी ने बेजारी से कहा, "बाहर कहां जाएगी, अन्दर ही होगी।" तभी वरु ऊपर से आ गई, संभवतः कपड़े डालने गई होगी। पर वरु को देखकर मेधावी को दूसरा आघात लगा। यह क्या वरु की तो रंगत ही बदल गई है। हर बार उसके आने पर दौड़कर उसके गले लगने वाली वरु दृष्टि झुकाए औपचारिकता से नमस्कार करके मां के साथ रसोई में चाय बनाने लगी। मेधावी का आने का सारा उत्साह पानी के बुलबुले के समान बैठ गया और उसके स्थान पर उसके मन में किसी अनहोनी की आशंका ने जन्म ले लिया। पर वातावरण की गंभीरता देखते हुए उसने धैर्य रखना ही उचित समझा।
 
थोड़ी देर में जीजा जी भी बाहर से आ गए। पर आज अपनी लाड़ली साली को देखकर वह भी कोई विशेष उत्साह न दिखा पाए। दीदी ने उसके आने के उपलक्ष्य में उसके मन पसन्द कोफ्ते बनाए। जीजा जी भोले हलवाई का कलाकंद ले आए। उसके स्वागत का पूरा दिखावा किया जा रहा था पर वातावरण में असामान्यता की गंध वह नहीं मिटा पाए थे। मेधावी को इस वातावरण में घुटन होने लगी थी, वह सामान्य होने का निरन्तर प्यास कर रही थी पर उन तीनों में से कोई भी अपने खोल से बाहर आने को तैयार न था। हार कर वह सफर की थकान मिटाने के बहाने बेडरुम में जाकर लेट गई। थोड़ी देर में दीदी भी काम से निवृत्त होकर आ गईं और उसके पास ही लेट गईं "मानव कैसा है? वह भी आ जाता तो अच्छा होता, बहुत दिन हो गए उसे देखे हुए।" दीदी ने कहा तो मेधावी के मन में आया कि कह दे "वह तो अच्छा ही हूुुआ कि मानव और सुबोध नहीं आए, नहीं तो उसे कितना लज्जित होना पड़ता। वह तो दिन रात दीदी-दीदी करती रहती है और यहां उसके आने पर यह उपेक्षा?" इन औपचारिकता भरी बातों से उसे घुटन सी होने लगी थी पर अब आ ही गयी थी तो कम से कम उसे दो दिन तो काटने ही थे, अन्यथा सुबोध से क्या कहती कि जिन दीदी के नाम की वह रट लगाए रहती है, उनके यहां से उल्टे पांव लौट आयी। फिर ऐसे यहां से जाकर भी उसे चैन कहां मिलता, यहां रहेगी तो कम से कम इस घर की असामान्यता का कारण तो समझ पाएगी। रात में सदा वह वरु के कमरे में ही उसके साथ सोती थी, अतः उसके बिस्तर पर ही जाकर लेट गई पर उसे अनुभव हुआ कि वरु उसके साथ सोने में झिझक सी रही है। दिन भर से जमा हो रहा लावा उबल ही पड़ा उसने कुछ तल्खी से पूछा, "क्या बात है वरु? अब मैं इतनी बुरी हो गई कि मेरे साथ सोना भी तुझे पसन्द नही है, मैं ही पागल थी कि अपने सारे काम छोड़कर तुम लोगों के प्यार में दौड़ी चली आई, मुझे क्या पता था कि अब तुम्हारे लिये मेधावी मौसी परायी हो चुकी है।" यह कहते कहते मेधावी की वाणी भावातिरेक से अवरुद्व हो गयी पर उसका अभिमान उसकी भावुकता प्रदर्षित नहीं करना चाहता था अतः वह दूसरी ओर मुंह करके सोने का उपक्रम करने लगी। पर आश्चर्य कि इस उलाहने पर भी वरु की चुप्पी न टूटी।
 
नींद मेधावी की आँखों से कोसों दूर थी, उसने कल ही स्टेशन जाकर अपना आरक्षण कराने का निर्णय ले लिया था। करवट बदलते हुए अचानक ही उसका हाथ वरु के वक्ष पर पड़ गया। सोती हुई वरु अचानक चीख के साथ उठ बैठी, मेधावी ने बत्ती जलायी तो पाया कि वरु भयभीत सी आंखे फाड़े इधर उधर देख रही थी, उसका शरीर पसीने पसीने हो रहा था। मेधावी ने पूछा, "क्या हुआ वरु कोई सपना देख लिया क्या?" तब तक वरु सुध में आ चुकी थी, वह तुरन्त करवट लेकर लेट गई। मेधावी को लगा कि संभवतः वरु कोई भयानक स्वप्न देख रही थी जो अचानक उसके स्पर्श से घबरा गई। मेधावी ने उसका सिर सहलाते हुए कहा सो जाओ ।" पर कुछ ही क्षणों में उसे वरु की सिसकी सुनाई दी, अपनी आवाज को दबाने के प्रयास में उसका सम्पूर्ण शरीर हिल रहा था। मेधावी ने बल पूर्वक उसका चेहरा अपनी ओर किया तो वरु स्वयं को रोक नही पायी और संभवतः न जाने कितने दिनों से हृदय पर एकत्र लावा एकाएक फूटकर नेत्रों के मार्ग से बह निकला। मेधावी ने बिना कुछ पूछे उसे अपनी बाहों में छिपा लिया। उसकी बाहों में आकर वरु किसी भयभीत हिरनी के समान दुबक गयी। जब वह थोड़ी व्यवस्थित हुई तो मेधावी ने उसके बालों को सहलाते हुए पूछा, "मेरी वरु क्या इतनी परायी हो गयी है कि अपनी मौसी को भी नही बताएगी?" वरु कुछ क्षण अनिश्चय में डोलती रही, फिर बोली, "मौसी मां से मत कहना कि मैने तुम्हें सब बता दिया है।" फिर अपनी हथेलियों पर मेधावी की हथेलियों के दबाव का मूक आश्वासन पाकर धीरे से सिर झुकाकर बोली, "मैासी, उसने मुझे अपवि़त्र कर दिया।" फिर सफाई सी देती हुई बोली, "पर उसमें मेरा को दोष नहीं, मैं तो उसे जानती भी नहीं।" मेधावी स्तब्ध रह गयी। इतनी बड़ी बात हो गई और दीदी ने उसे बताना भी उचित नहीं समझा। उसने धीरे धीरे वरु से पूरी घटना पूछी। अब उसके समझ में आ रहा था कि दीदी ने क्यों उसका इतना फीका स्वागत किया। उसे आज पता चला कि दीदी ने वरु का कॉलेज भी छुड़वा दिया था। उसे इस समय दीदी पर इतना क्रोध आ रहा था कि मन कर रहा था कि इसी समय जाए और उन्हें झकझोर कर पूछे कि यह कैसी नादानी है? अपराध किसी और ने किया और वह सजा बेचारी वरु को दे रही हैं। वह उठी भी पर वरु ने उनका हाथ पकड़ कर लगभग घिघियाते हुए कहा, "मौसी प्लीज! मां को मत बताना कि मैंने तुम्हें सब बता दिया है, वह तो वैसे ही मेरे कारण बहुत दुखी हैं।" वरु का भयभीत हिरनी सा चेहरा देखकर मेधावी के पाँव थम गए। पर उसके बाद यहाँ आने के बाद उसके मन में दीदी के प्रति उपज रहा आक्रोश सहानुभूति में परिवर्तित हो गया और जिस दुख में अब तक तीन प्राणी व्यथित थे, उसने आज मेधावी की नींद भी उड़ा ली।
 
प्रातः जब दीदी रसोई में चाय बना रही थीं तो मेधावी जाकर प्याले लगाते हुए बोली, "दीदी वरु की पढ़ाई क्यों छुड़वा दी?" दीदी उसके इस अचानक पूछे गए प्रश्न पर चौंक पड़ीं और बात टालने के उद्देश्य से हड़बड़ाकर कहने लगीं, "आज नाश्ते में मैं तेरे मनपसन्द मूंग के पकौड़े बना रही हूँ।" पर मेधावी इतनी सरलता से बात का सूत्र छोड़ने वाली नहीं थी। उसने गंभीर होकर कहा, "दीदी! बात टालने से वरु के भविष्य का प्रश्न नहीं टलने वाला।" दीदी समझ गईं कि मेधा को सच ज्ञात हो चुका है। दीदी के नेत्रों में एक बेबस मां की विवशता उतर आई थी, उन्होंने कहा, "अरे भविष्य तो उसका अंधेरा हो ही गया, अब तो बस एक ही चिन्ता है कि दूर-दराज कोई मिल जाए तो उसका ब्याह करके इस मुसीबत से छुटटी पाएं।" मेधावी अविश्वास से उनका मुँह देखने लगी पर उसके मनोभावों से अपरिचित वह अपनी रौ में ही बोलीं, "क्या क्या सपने देखे थे वरु के ब्याह के, पर अब तो कोई दुहाजू भी मिल जाए तो हम ब्याह दें।"
 
अब मेधावी को स्वयं को नियंत्रित करना संभव नहीं हो रहा था, उसने तीव्र वाणी में कहा, "अब बस करो दीदी, तुम मां होकर ऐसे कह रही हो जैसे उस मासूम ने कोई अपराध किया हो।" अब दीदी ने बेबसी से कहा, "मेधा वह मेरे हदय का टुकड़ा है। तुम क्या सोचती हो, मुझे उसका यह हाल देखकर अच्छा लग रहा है। मैं ही जानती हूँ कि उस काली रात के बाद एक दिन भी जो चैन से सोई हूँ। पर क्या करें, अब तो जो होना था; हो गया, यही हमारे भाग्य में था तो क्या करें।"
"करो यह कि कल से उसे कॉलेज भेजो।"
"कॉलेज? तुझे पता भी है कि कॉलेज ही में तो सब कांड हुआ है।"
"मुझे सब पता है पर अब तो वरु को और भी साहसी बनाने की आवश्यकता है। उसका मनोबल बढ़ाने और आत्मनिर्भर बनाने के बजाय तुम उसकी पढ़ाई छुड़वा दोगी? और जीजा जी जैसे बुद्धिमान व्यक्ति ने भी मान लिया?" मेधावी आश्चर्य से बोली, "तुम्हें तो उस चांडाल को सजा दिलवानी चाहिये पर तुमने तो जिस तरह वरु को घर में कैद कर लिया है, उसके कारण उसकी स्थिति देखी है, इतनी प्रसन्नचित्त और पारंगत लड़की का आत्मविश्वास ही खो गया है। मुझ तक से वह दूर भाग रही है, रात में गलती से मेरा हाथ छू गया तो चौंककर उठ गई। इस तरह तो वह मनोरोगी हो जाएगी और उसका कारण उस अपराधी से अधिक तुम होगी।" यह कहते कहते मेधावी हांफने लगी।
 
"अरे वह तो न जाने कौन था, जो अपनी भूख मिटाने के लिये हैवान बन गया, पर तुम तो उसके मां-पिता हो, तुम तो उसके साथ अत्याचार न करो।" मेधावी अपनी रौ में अपने मन में उपजा आक्रोश उगल रही थी, पर वह इस बात से अपरिचित थी कि दीदी पर क्या व्यतीत हो रहा है। वह तो चौंकी जब दीदी का रुदन सारे बांध तोड़कर बाहर आ गया और वह उसके कंधें पर सिर रखकर बिलख पड़ीं। उनकी विवशता, अपमान की व्यथा, बेटी का दर्द, उसके भविष्य की आशंका, सब उनके चेहरे पर घनीभूत होकर उसे स्याह बना रहे थे। अब मेधावी को अनुभव हुआ कि उसने एक पके हुए फोड़े को छूकर उसकी टीस को जगा दिया था। वह लज्जित हो गई। उसने दीदी के अश्रु पोंछते हुए उन्हें पानी पिलाया और कोमल वाणी में समझाया, "दीदी क्षमा करो, मैंने तुम्हें दुख दिया पर वरु मेरी भी बेटी है इसीलिये यह सब सुनकर आक्रोश में आ गई।"
तभी उसने सिर उठाया तो वरु सिर झुकाए किसी अपराधी के समान खड़ी थी। मेधावी ने वातावरण को सामान्य बनाते हुए कहा, "हाँ, तो दीदी आज पकौड़े के साथ इमली की चटनी भी बनाना और वरु को लेकर रसोई से बाहर आते हुए बोली, "वरु और बता तेरे शहर में कौन कौन सी मूवी लगी है। चल तेरे साथ बहुत दिनों से नहीं देखी, आज देखेंगे।" और समय होता तो वरु उछल पड़ती और उंगलियों पर सारी शहर की फिल्मों के नाम गिना देती पर उसने घबराकर दीदी को देखा पर उसकी आँखों में स्वरकृति। मेधा समझ गई कि वरु दीदी के भय से कुछ नहीं कह पा रही है। उसका आशय समझते हुए दीदी से कहा, "दीदी तुम भी चलोगी?"
दीदी ने तनिक आक्रोश से कहा, "मेधा इस उमर में तुम पर यह बचपना शोभा नहीं देता, सब जानकर भी जले पर नमक मत छिड़को।"
 
इस आरोप से मेधावी हतप्रभ हो गयी पर दीदी की मनो:स्थिति समझते हुए चुप रह गई पर उसने ठान लिया कि वह वरु को इस अंधेरे के गर्त से निकाल कर ही रहेगी। उसने जीजा जी से पूछा, "आपने इसकी रिपोर्ट नहीं लिखाई।" जीजा जी तो इस अप्रिय विशय पर बात भी नहीं करना चाहते थे। वह बिना नाश्ता किये ही उठकर काम पर चले गए। दीदी और वरु जो कुछ सामान्य हुई थीं, वह पुनः तनावग्रस्त हो गईं। मेधावी को दु:ख हुआ पर उसने अपना लक्ष्य न बदला। वह उन सबको समझाना चाहती थी कि इसमें वरु या उन सबको लज्जित होने की क्या आवश्यकता है पर उनमें से कोई उसकी बात सुनना नहीं चाहता था। हाँ, वरु अवश्य उसकी बात सुनकर कुछ सामान्य होने लगी थी और बिना किये अपराध से झुका उसका सिर कुछ कम झुकता था। उसने ही मेधावी को बताया कि यह कुकृत्य कॉलेज के लोफर छात्रों का था जो उस दिन पीकर घूम रहे थे और उस दिन दुर्योग से उसकी सखी कॉलेज नहीं आई थी, अतः वाचनालय से वह एकाकी लौट रही थी और राह में एकान्त पाकर उन्होंने उसे दबोच लिया।
 
बात पुरानी हो चुकी थी अतः अब तो सब साक्ष्य समाप्त हो चुके थे पर मेधावी ने हार नहीं मानी। वह उसी समय कॉलेज के प्रिंसिपल से मिली और उसने पूरी घटना बताते हुये उन छात्रों को दंड देने की अपील की, इस पर प्रिंसिपल ने कहा, "देखिये, यदि ऐसा कुछ हुआ तो मुझे क्यों नहीं बताया गया। आज अचानक आप कर कह रही हैं कि यह घटना घटी तो मैं कैसे मान लूं, क्या पता आपकी उन छात्रों से कोई निजी शत्रुता हो?"
यह सुन कर वरु को क्रोध आ गया। उसने कहा, "हम जिस समाज में रह रहे हैं, उसमें किसी लड़की के लिये क्या इतना सरल है स्वयं आकर ऐसी बात कहना?"
"वही तो मैं कह रहा हूं कि जो हो गया सो हो गया, आप क्यों बात को उछालकर तमाशा कर रही हैं, आपकी लड़की और मेरे कॉलेज दोनों की बिना बात ही बदनामी होगी।"
यह सुनकर वरु का मन क्रोध से झुलस उठा। वरु ने कहा, "आपके कॉलेज में एक छात्रा के साथ इतना बड़ा अन्याय हो गया, क्या आपका कोई दायित्व नहीं?"
 
प्रिंसिपल ने कहा कि देखिये मुझे आप सबसे पूरी सहानुभूति है पर बिना किसी साक्ष्य के मैं कैसे कोई कार्यवाही कर सकता हूं। वह समझ गई कि प्रिंसिपल इस झगड़े में पड़ना नहीं चाहते।
पर वरु ने हार न मानी। वह कॉलेज की सभी छात्राओं से मिली जो उन छात्रों की हरकतों से तंग थीं। उसने उन्हें एकत्र किया और समझाया कि आज जो वरु के साथ हुआ यदि अपराधियों को दंड नहीं दिलाया गया तो उनके साथ भी ऐसा कुछ हो सकता है। पहले तो उन्होंने आनाकानी की, कुछ के अभिभावक भी नाराज हुये परन्तु वरु के अथक प्रयासों से कुछ जागरूक लोग सामने आये, उनकी देखा-देखी अनेक छात्राएं एवं उनके अभिभावक भी सहयोग देने को तैयार हो गये। यदि कुछ को वरु से सहानुभूति थी तो ऐसे लोग भी थे जो वरु को ही दोषी ठहरा रहे थे, किया ने तो यहां तक भी कह दिया कि क्या पता वरु स्वयं ही उनसे मिलने एकांत में गई हो। उनकी बातें वरु को लहुलुहान कर रही थीं। उस पर उसके मां-पिता इस प्रकार बात सार्वजनिक होने से क्षुब्ध थे इसीलिये वह बार बार पीछे हट जाती थी पर एक मेधा ही थी जो अडिग थी।
 
मेधा ने दिन रात एक कर दिया। उसने अनेक छात्राओं के हस्ताक्षर से एक पत्र उन छात्रों को दंड देने के संदर्भ में एस. पी.,डी. एम. और शहर के सभी सेवा संस्थानों को लिखा। फिर भी बात न बनी तो डी. एम. के बंगले के सामने धरना दिया। फिर तो बात  बात मीडिया में आनी ही थी, बस फिर क्या था! प्रातः छः बजे ही मिसेज शर्मा का फोन आया, "अरे मिसेज बंसल, इतनी बड़ी बात हो गई और आपने बताया भी नहीं?" दीदी ने बिना कुछ कहे ही फोन रख दिया फिर तो दिन रात दीदी के घर के फोन घनघनाने लगे, जिसे देखो वह घटना का आंखों देखा वर्णन सुनना चाहता था। लोग सहानुभूति की चाशनी में लपेटकर घटना के पीछे कोई रहस्य सूत्र ढूंढने के प्रयास में अधिक रुचि ले रहे थे। दीदी जीजा जी तो आग बबूला हो गए। उन्हें इस समय उन अपराधियों से अधिक मेधावी अपनी शत्रु लग रही थी। राह सरल न थी। जिस दिन मीडिया में बात उछली, संध्या को एक फोन आया। उन छात्रों ने बात को तूल पकड़ते देख वरु के परिवार को धमकाना प्रारम्भ कर दिया।
 
उस दिन छात्राओं को एस. पी. और डी. एम. से मिलने के लिये तैयार कर के लौटी ही थी कि घर में पांव रखते ही जीजा जी ने सारी औपचारिकता ताक पर रखते हुए उससे कहा, "मेधावी जी माना आप नारी स्वतंत्रता की समर्थक हैं पर कृपया अपनी नेतागिरी कहीं और करिये हमें बख्श दीजिये।" मेधावी अपमानित और अवाक दीदी का मुंह देखने लगी। उनके चेहरे के भाव भी चुप रहकर भी जीजा जी का समर्थन कर रहे थे। पर मेधावी को इस समय अपराधियों को दंड दिलवाने का जुनून चढ़ गया था, उसने दीदी व जीजा जी की नाराजगी की भी परवाह न की और एस. पी. को इस धमकी के बारे में सूचित किया। मेधावी के प्रयासों और मीडिया के सहयोग के कारण बात इतनी बढ़ गई कि प्रशासन को सक्रिय होना ही पड़ा। वैसे भी मीडिया के कारण बात सामने आ ही गई तो दीदी जीजा जी को आगे आना ही पड़ा।
 
जब एस. पी. ने दोषी छात्रों के पकड़े जाने की सूचना दी तो मेधा और वरु को सफलता सपने से सच में बदलती लगने लगी। यद्यपि न्यायालय में होने वाली कार्यवाही की लम्बी राह सहज न थी पर अब मेधा के सम्बल ने वरु का निश्चय दृढ़ कर दिया था और जिस दिन निर्णय उनके पक्ष में सुनाया गया, उस दिन वरु के मन के सारे घावों पर मरहम लगा गया। उन लड़कों के दंडित होने से वरु के आलोचकों के मुंह स्वयं ही बन्द हो गये।
 
आज एक प्रतिष्ठित संस्था ने वरु को सार्वजनिक रुप से सामने आकर अपराधियों को पकड़वाने का साहस करने के लिये सम्मानित किया तो मेधा को वरु के चेहरे का आत्मविश्वास देखकर ही पुरस्कार मिल गया।

- अलका प्रमोद

रचनाकार परिचय
अलका प्रमोद

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कथा-कुसुम (4)