मार्च 2016
अंक - 12 | कुल अंक - 56
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
कहानी- पगली
 
‘पगली’ आजकल पूरे कस्बे में चर्चा का विषय बनी हुई थी। कोई उसे यहाँ छोड़ गया था या वही भटकते हुए यहाँ आ पहुँची थी, यह कोई नहीं जानता था। किन्तु उसका यहाँ आना सबके कौतूहल का विषय अवश्य था। फटे हुए वस्त्रों से जहाँ तहाँ झांकती सुन्दर सुकोमल काया उसके पास से गुजरने वाले को एक बारगी उसकी तरफ़ देखने को विवश अवश्य करती थी। हाँ, उस देखने के अभिप्राय अवश्य अलग अलग थे। जहाँ बुजुर्गों व महिलाओं में यह करुणा का भाव जगाता तो  अधेड़ उम्र के पुरुष बस एक दृष्टि भर देखकर आगे बढ़ जाते थे। वहीं मनचलों के लिए यह देखने भर से कुछ अधिक ही था और बच्चों के लिए वह नग्नता उस पगली को चिढ़ाने का एक सशक्त साधन।
 
उसके पास से गुजरती हुई महिलायें प्रायः उसकी दुर्दशा पर टिप्पणी किया करतीं, "बेचारी ना जाने कहाँ से भटकते हुए यहाँ पहुँच गयी है। कभी किसी परिवार का सम्मान हुआ करती होगी और आज लज्जा, निर्लज्जता से परे अर्धनग्न अवस्था में बेसुध हो इधर उधर घूम रही है।"
"मुझे तो इसके माँ-बाप को देखकर अचम्भा होता है, कोई इसे ढूँढने क्यों नहीं आता। कहीं ऐसा न हो कि पागल होने के बाद इसके घरवाले ही इसे यहाँ छोड़ गए हों।"
"क्या कह रही हो। ऐसा भी हो सकता है क्या?"
"और क्या, लोग ऐसे पागलों को तीर्थ स्थानों के आस-पास इसलिए छोड़ देते हैं कि मरे तो मोक्ष पा लेंगे"
"यह तो अमानुषिकता हुई, कहाँ तो उनकी देखभाल करते और कहाँ ऐसा पाप कर बैठते हैं। किन्तु एक माँ ऐसा कर सकती है इस बात पर मुझे संदेह है।"
"हाँ, लेकिन हो सकता है कि इसकी माँ जीवित ही ना हो अथवा उसका अपने घरवालों पर वश न चला हो। अगर सारा घर किसी बात पर अड़ जाए तो बेचारी औरत अकेली क्या कर लेगी।"
"हो सकता है। पर क्या जाने पागलपन में यही घर से निकल आयी हो और यदि ऐसा है तो सोचो इसके पीछे वे लोग कितना परेशान होंगे। इस अभागी को ढूँढने के लिए न जाने कहाँ-कहाँ भटक रहे होंगे।"
"सब किस्मत की बात है। ना जाने इस पगली के भाग में क्या लिखा है। कुछ अच्छा लिखा होता तो इतनी दुर्गत ही क्यों होती इसकी। ऊपर से जवान लड़की, समाज में छिपे हुए भेड़िये इसे छोड़ेंगे भला?"
"च्च..च्च"
 
धीरे-धीरे सभी उस पगली को देखने के अभ्यस्त हो गए और अब पगली भी उस कस्बे का हिस्सा थी। पहले पहल पगली सारे शहर में चर्चा का विषय बनी रही। किन्तु अब उसका दिखाई पड़ना कोई उत्सुकता पैदा नहीं करता था। जितनी दया उसे देखकर पहले पहल आया करती, उतनी दया अब किसी को न उपजती। अब न तो बच्चे उसे चिड़ाते और न ही मनचलों को उसमें कोई दिलचस्पी शेष रही थी। कभी पगली किसी घर के बंद द्वार के बाहर धूप सेंकती मिलती, भले जेठ की भरी दुपहरी ही क्यों न हो। तो कभी किसी होटल के सामने सड़क पर आराम से पसरी हुई, चाहे फिर वह पूस की हाड़ जमाती शीत ही क्यों न हो। कभी लगता है कि चेतनाशून्य व्यक्ति वैरागियों के समान ही सुख-दुःख से निर्लिप्त हो जाता है। इन्द्रियों पर जैसी कठिन विजय वैरागी संसार त्याग कठोरतम तप करके प्राप्त करते हैं। चेतना लोप होते ही वह वैराग्य पागल को सहज ही प्राप्त हो जाता है। बस ऐसी ही विजय पगली को भी प्राप्त हो चुकी थी। अब न उसे ऋतुओं की मार विचलित करती थी और न व्यक्तिगत जीवन की पीड़ाएँ। बस वह जीवित थी, संसार से एकदम निर्लिप्त। जब भूख सताती तो वह किसी भी भोजनालय के सामने हथेली फैलाए हुए मुखमंडल पर क्षुधा से उपजी विद्रूपता लिए खड़ी हो जाती थी। होटल वाले भी रोज की आदत से दो रोटियों पर थोड़ा साग रख उसे थमाते और एक अभ्यस्त लहज़े में उसे फटकारकर वहाँ से भगा देते। पगली के चेहरे पर भोजन मिलने की प्रसन्नता सहज ही देखी जा सकती थी और फटकार, वह उसे कहाँ समझ पाती थी जो अपमानित अनुभव करती। वह तो उसके लिए चले जाने का इशारा मात्र था, जिसे वह भली-भाँति पहचानती थी।
 
आज पगली अच्छी सी लग रही थी। शायद किसी ने तरस खाकर उसे नए वस्त्र पहना दिए थे। बाल करीने से बनाए हुए थे, नहाई हुई भी लग रही थी। उसका यह रूप तो किसी ने सोचा भी न था। आज यह असंभव था कि कोई उसे एक नज़र देखे बिना आगे बढ़ जाए। बहुत समय बाद आज वह फिर चर्चा में थी। उसके ऊपर किसकी कृपा दृष्टि पड़ी थी यह तो पता नहीं चल पाया था, क्योंकि कोई भी इस पुण्य का श्रेय लेने सामने नहीं आया।
 
इधर कुछ दिनों से पगली में कुछ शारीरिक परिवर्तन दिखने लगे थे। कस्बे में उसको लेकर कुछ काना-फूसी शुरू हो गयी थी।
"न जाने किसका पाप ढो रही है। अब पागल कुछ बताये भी तो कैसे?"
"बेचारी पहले से ही भाग्य का कुछ कम दंड भोग रही है, जो अब यह भी।"
"इंसानियत तो जैसे अब दुनिया में बची ही नहीं है वरना किसी पागल के साथ ऐसा दुष्कर्म? छी: …पता नहीं ईश्वर  कहाँ सोया हुआ है अपराधी तो एकदम सुरक्षित घूम रहा है और दंड भोग रही है यह पगली"
 
पगली सारे कस्बे की दया का पात्र बनी हुई थी। चर्चा बस उसके दुर्भाग्य पर आकर ठहर जाती थी, क्योंकि दोषी लापता था और पगली आने वाले दुष्कर दिनों से अनभिज्ञ।
मातृत्व की गरिमा वहन कर रही स्त्री स्थूलकाय और बैडोल  हो जाने पर भी सुन्दर दिखाई देती है। शिशु के आगमन की प्रसन्नता उसके मुखमंडल पर सुनहरी  आभा बिखेर  देती है। किन्तु यह तथ्य पगली पर लागू नहीं होता था, उसका शरीर अवश्य बैडोल हो चुका था लेकिन मातृत्व की गरिमा एवं कान्ति उसके चेहरे से नदारद थी। अक्सर सड़क के किनारे बैठी मैली कुचली धूल भरे बालों वाली उल्टियां करती हुई पगली मन में वितृष्णा उत्पन्न कर देती। एक करुणा मिश्रित वितृष्णा। अतः कोई उसे उस जगह से हटाता नहीं था बल्कि दयावश च्च…च्च…..कहता हुआ आगे बढ़ जाता था।
 
वास्तव में मानव के भीतर छुपा हुआ पिशाच ढूँढ़ना सबसे दुष्कर कार्य है, क्योंकि वह पिशाच मनुष्यता के आवरण को इतना भली प्रकार ओढ़े रहता है कि उस आवरण के भीतर का सत्य प्रकट ही नहीं होता। वह तो केवल तभी बाहर आता है, जब सामने विवश और लाचार शिकार दिखाई देता है और पगली वह विवश, लाचार तो थी, साथ ही कुछ बता सकने जितनी चैतन्य भी नहीं थी अतः एक लाजवाब शिकार थी। उसके साथ हुए इस दुष्कृत्य का सभी को बेहद खेद था और उस अज्ञात दुरात्मा को लेकर बड़ी घृणा और क्रोध। पर इन्हीं सज्जनों के बीच ही तो ‘वह’ भी छिपा हुआ था। किन्तु कौन यह जानने का न तो कोई मार्ग था और न उसे ढूँढने की किसी को कोई कोई उत्कंठा थी। क्योंकि पगली का सम्मान इतना मूल्यवान नहीं था कि उसे तार- तार करने वाले की शिकायत कोई दर्ज़ करवाता और अपराधी को ढूँढने में पुलिस या प्रशासन कोई कार्यवाही करते। हाँ, उसके प्रति संवेदना सभी के हृदय में थी और इसी कारण अब यदि वह किसी घर के बाहर पड़ी भी मिलती तो कोई उसे वहाँ से हटाता न था, उल्टे उसे खाने के लिए कुछ दे जाता था। होटल वाले भी उसे भोजन तो पूर्ववत देते किन्तु अब वह  फटकार नदारद थी। अब उसे डाँटने का मन नहीं करता था।
 
कुछ दयावान महिलाओं ने उसे कुछ गर्म वस्त्र पहनने के लिए दिए जिससे इस भयंकर शीत से उसकी रक्षा हो सके। किन्तु किसी पागल से यह अपेक्षा करना कि वह ठण्ड से अपनी रक्षा हेतु गर्म वस्त्र पहन लेगा किसी उपहास से कम न था और पगली को छूना नितांत अस्वच्छकर था अतः उसे वस्त्र पहनाने का तो प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता था। पगली कुछ देर उन वस्त्रों को उलटती पुलटती रही फिर उन्हें वहीं छोड़कर आगे बढ़ गयी। वस्त्रों को पगली के सम्मुख फेंकने से उसका तो कुछ हित नहीं हुआ किन्तु वस्त्र देने वाले अपने सत्कर्म के प्रति आश्वस्त थे और उन्हें इस बात का पूरा विश्वास भी था कि इस भलाई से प्राप्त पुण्य का फल उनकी संतानों को अवश्य प्राप्त होगा।
 
आज सवेरे से वह सड़क के किनारे बने पैदल मार्ग पर पड़ी हुई थी। देखकर एक बारगी लगा कि कहीं ठण्ड से मर तो नहीं गयी किन्तु शरीर में हुई हल्की सी हलचल से यह तो साफ़ हो गया था कि अभी वह जीवित थी किन्तु कब तक जीवित रहेगी यह कह पाना बेहद कठिन था। कोई करुणावश दो रोटियाँ उसके सिराहने रख आया था पर उसे खाने की सुध ही कहाँ थी। वह उसी तरह सारा दिन बेसुध पड़ी रही। एक तो गर्भावस्था जनित कष्ट और ऊपर से ऐसी जबरदस्त ठण्ड। शायद वह भाग्य और मौसम की दोहरी मार झेल पाने में असमर्थ थी।
 
पता नहीं अब जीवित बचेगी भी या नहीं- पास से गुजरते हुए राहगीर ने दूसरे से प्रश्न किया।
"हूँ..लगता नहीं कि अब बच पाएगी"
"क्या इसे अस्पताल लेकर चलें।"
"क्या कह रहे हो? आसान है क्या इसको लेकर जाना और वैसे भी कौनसी बड़ी ख़ूबसूरत ज़िन्दगी जी रही है।  मर जाए तो ज़लालत  भरे जीवन से मुक्त हो जायेगी।"
बेचारी -कहते हुई वे आगे बढ़ गए।
इसी तरह सभी दर्शक उसे देखकर दुखी होते और संवेदना व्यक्त करते हुए आगे बढ़ जाते।
 
शाम से पगली लगातार करवटें बदल रही थी। कभी अचानक तड़पकर बैठ जाती फिर कुछ देर उकडूँ बैठी रहती और कुछ देर बाद पुनः वापस लुढ़क जाती थी। बस ऐसे ही शाम ढल गयी और सारा कस्बा रात की चादर ओढ़ कर सो गया।
पहले दिन जिस जगह पर पगली पड़ी तड़प रही थी उस जगह अगले सवेरे एक नवजात शिशु पड़ा हुआ था। नाल से जुड़ा हुआ और शरीर एकदम नीला। वह ठण्ड से मरा था अथवा शरीर में विष फैल जाने की वजह से यह तो स्पष्ट नहीं था किन्तु इसमें कोई दो राय नहीं थी कि यह पगली की संतान था। वह कल दिन भर प्रसव पीड़ा से छटपटा रही थी और रात को इसका जन्म हुआ होगा। देखते ही देखते वहाँ अच्छी खासी भीड़ एकत्र हो गयी। हर कोई उस बच्चे के लिए यह सोचकर दुखी था कि यदि दिन के वक़्त वह जन्मता तो शायद बच जाता लेकिन ऐसा तो तब होता जब दिन के समय तड़प रही पगली को कोई अस्पताल ले गया होता। लोगों की संवेदना अपने कम्फर्ट लेवल के दायरे में ही उपजती है अतः अब उस बच्चे के लिए उनके मन में दयाभाव रह रह कर उमड़ रहा था। समस्त कानूनी औपचारिकताएं पूर्ण करने के बाद कुछ दयालु लोगों ने उस शिशु की रीति अनुसार अंतिम क्रिया कर उसे बैकुंठ की ओर रवाना किया।
 
किन्तु यह प्रश्न कि आखिर पगली अचानक कहाँ चली गयी सबकी समझ से परे था। कहीं ऐसा तो नहीं कि उस शिशु के जन्म के दौरान झेली गयी प्रसव पीड़ा ने   उसे भयभीत कर दिया और दुसह पीड़ा के परिणाम उस बच्चे को देखकर वह डर गयी हो और उसे वहीं छोड़ कर कहीं भाग गयी हो। खैर, सत्य क्या था यह तो पगली ही जाने किन्तु उस दिन के बाद फिर वह उस कस्बे  में कभी नहीं दिखी। पहले पहल उसके गायब हो जाने का काफी ज़िक्र होता रहा। सभी उसके लिए दुखी  थे। आखिर पिछले डेढ़ दो वर्षों से वह यहाँ रह रही थी और अनजाने ही कस्बे का एक हिस्सा भी बन चुकी थी। धीरे-धीरे पगली यहाँ के बाशिंदों की स्मृति से ओझल हो गयी।
 
आज अचानक फिर पगली का ज़िक्र छिड़ा हुआ था। जनरल स्टोर वाले गगन जी आज शहर से लौटे हैं। अपनी दुकान का सामान लाने के सिलसिले में उनका शहर आना जाना लगा रहता है। उन्होंने बताया कि आज जब वे थोक बाजार से लौट रहे थे तो शहर के बड़े चौराहे में उन्हें पगली भटकती हुई दिखाई दी। शरीर पर नाम मात्र फटे चीथड़े लटक रहे थे। धूलभरे उलझे बिखरे हुए बाल, शरीर एकदम काला हो आया था मानो कोयला, बहुत बीमार लग रही थी। उन्हें उस पर दया आ गयी और उन्होंने गाड़ी रोककर खाने के लिए कुछ खरीदकर उसे दिया। वह बेचारी भोजन पर एकदम भूखे कुत्ते की मानिंद झपटी थी।
 
जब वे खाना देने के लिए उसके करीब गए तो देखा कि उसका पेट कुछ उभरा हुआ था। शायद वह फिर गर्भ से थी।

- तनुजा उप्रेती

रचनाकार परिचय
तनुजा उप्रेती

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