प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2016
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लघुकथा
लघुकथा- नौकरी
 
"बेटी को 60 हज़ार और आने-जाने की लिए गाड़ी मिल रही है! कैसे पिता हो तुम खुश होने की जगह नाराज़ हो रहे हो?"
उस दिन मेरा दिमाग सातवें आसमान पर था। मुझे वो नहीं दिख रहा था जो एक पिता देख पा रहे थे।
बहुत गुस्से में थे वो बोले, "पीहू कोई ऑक्सफ़ोर्ड से पढ़ कर नहीं आई है। जो उसे मिल रहा है वो उसे उसके रूप के कारण मिल रहा है जो उसकी योग्यता से बहुत
ज्यादा है।"
पीहू भी सहम गई थी पिता का गुस्सा देखकर। पर मेरी बेवकूफी के साथ ने उसे पिता की बात का मर्म समझने ही नहीं दिया और वो काम पर जाने लगी।
 
आज सुबह पीहू ने कहा, "माँ रात में एक पार्टी में जाना है। मैं ऑफिस से ही चली जाऊँगी। देर हो जायेगी, तुम चिंता मत करना।"
पिता बोले, "मुझे जगह बता दो मैं लेने आ जाऊँगा।"
बड़ा गुस्सा आया मुझे, "अरे, वह अब कोई बच्ची नहीं है। फिर उसके साथ उसके बॉस रहेंगे ना! वह छोड़ देंगे।"
 
रात का एक बज गया है। पीहू नहीं आई। उसका फोन भी बन्द है। किसी और का नम्बर हमारे पास नहीं था। पीहू के पिता कमरे में चक्कर लगा रहे थे। बहुत बेचैन थे।
मुझसे भी लेटा या बैठा नहीं जा रहा था। मैंने उनका हाथ पकड़कर कहा, "बैठ जाइये ना!"
उन्होंने मेरा हाथ झटक दिया। उनकी आँखों में गुस्‍सा था, कुछ बोले नहीं वो।
मैं किसी अनिष्ट की आशंका से खुद को कोसने लगी।
 
थककर मैं कुर्सी पर बैठी ही थी कि पीहू आ गई। हमने चैन की साँस ली। रात ढलान पर थी। वह अपने कमरे में जाकर सो गई।
सुबह हुई तो पीहू मेरे पास आकर बोली, "माँ, पापा की बात सही थी, हम दोनों गलत।"
मैं घबरा गई। मैंने, उसकी आँखों में झाँककर कहा, "तू ठीक तो है।"
पीहू बोली, "एकदम ठीक, तुम्हारी बेटी इतनी कमजोर तो नहीं हो सकती। लेकिन अब यह नौकरी...बिलकुल नहीं।"
 
मैंने देखा उसके पिता अखबार पढ़ते हुए मुस्कुरा रहे थे।

- सीमा जैन
 
रचनाकार परिचय
सीमा जैन

पत्रिका में आपका योगदान . . .
कथा-कुसुम (1)