प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2016
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

नवगीत
थका-थका सा दिन
 
थका-थका सा
दिन है बीता
दौड़ -भाग में बनी रसोई
थकन रात
सिरहाने लेटी
नींद नहीं आँखों में सोई
 
रोज पकाऊ
दिनचर्या की
घिसी पिटी सी परिपाटी
नेह भरे
झरनों से वंचित
सम्बंधों की सूखी घाटी
कजरारी
बदली ने आकर
नर्म धूप की लटें भिगोई
 
साँस साँस पर
चढ़ी  उधारी
रहने का भी नहीं ठिकाना
संध्या के
होठों पर ठहरा
ठंडे संवादों का बाना
उमर निगोड़ी
नदी किनारे
जाने किन सपनों में खोई
 
नहीं आजकल
दिखते कागा
पाहुन का सन्देश सुनाते
स्वारथ के
इस अंधे युग में
कातिल धोखे मिलने आते
गन्ने की
बदली है सीरत
फाँखे भी है छोई छोई।
 
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सखी री
 
छेड़ो कोई तान सखी री
फागुन का अरमान सखी री
 
कुसुमित डाली लचकी जाए
कूके कोयल आम्बा बौराये
गुंचों से मधुपान
सखी री
 
गोप गोपियाँ छैल छबीले
होठों पर है छंद  रसीले
प्रेम रंग का भान
सखी री
 
नीले पीले रंग गुलाबी
बिखरे रिश्ते खून खराबी
गाउँ कैसे गान
सखी री
 
शीतल मंद पवन हमजोली
यादों में सजना  की हो ली
भीगा है मन प्रान 
सखी री
 
पकवानों में भंग मिली है
द्वारे द्वारे धूम मची है
सतरंगी परिधान
सखी री
फागुन का अरमान सखी री
 
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बाँसुरी अधरों छुई
 
बंशी बजाना आ गया
बांसवन में गीत गूँजे, राग
अंतस छा गया
 
चाँदनी झरती वनों में
बाँस से लिपटी रही
लोकधुन के नग्म गाती
बाँसुरी, मन आग्रही
रात्रि की बेला  सुहानी
मस्त मौसम भा गया
 
गाँठ मन पर थी पड़ी, यह
बांस सा तन खोखला
बाँस की हर बस्तियाँ, फिर
रच रही थीं श्रृंखला
पाँव धरती में धँसे
सोना हरा फलता गया
 
लुप्त होती जा रही है
बाँस की अनुपम छटा
वन घनेरे हैं नहीं अब
धूप की बिखरी जटा
संतुलन बिगड़ा धरा का
जेठ, सावन आ गया
 
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आस्था के नाम पर,
बिकने  लगे हैं भ्रम
कथ्य को विस्तार दो
यह आसमां है कम
 
लाल तागे में बंधी
विश्वास की कौड़ी
अक्ल पर जमने लगी, ज्यों
धूल भी थोड़ी
नून राई, मिर्ची निम्बू
द्वार पर कायम
 
द्वेष, संशय, भय हृदय में
जीत कर हारे
पत्थरों को पूजतें, बस
वह हमें तारे
तन भटकता , दर -बदर
मन खो रहा संयम
 
मोक्ष दाता को मिली है
दान में शैया
पेंट ढीली कर रहे, कुछ
भाट के भैया
वस्त्र भगवा बाँटतें
गृह, काल, घटनाक्रम
 
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जिंदगी के
इस सफर में
भीड़ का हिस्सा नहीं हूँ
गीत हूँ मै,
इस सदी का
व्यंग का किस्सा नहीं हूँ
 
शाख पर
बैठे परिंदे
प्यार से जब बोलतें हैं
गीत भी
अपने समय की
हर परत  को खोलतें हैं
भाव का
खिलता कँवल हूँ
मौन का भिस्सा नहीं हूँ
 
शब्द उपमा
और रूपक
वेदना के स्वर बनें हैं
ये अमिट
धनवान हैं जो
छंद बन झर झर झरे हैं
प्रीति का मधुमास हूँ
खलियान का मिस्सा नहीं हूँ
 
अर्थ
बिम्बों में समेटे
राग रंजित मंत्र प्यारे
कंठ से
निकले हुए स्वर
कर्ण प्रिय
मधुरस नियारे
मील का
पत्थर बना हूँ
दरकता
सीसा नहीं हूँ।

- शशि पुरवार
 
रचनाकार परिचय
शशि पुरवार

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