प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2016
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविताएँ
स्त्री
 
पुरुष की दृष्टि में
स्त्री एक व्याकरण के अलावा
और कुछ नहीं है।
वह किसी के लिए संज्ञा है।
मात्र व्यक्ति, वस्तु या स्थान है।
किसी के लिए
अलग अलग प्रकार से
प्रयोजित सर्वनाम है।
असँख्यों के अनंत विशेषण है।
किसी के लिए परिमाणवाचक,
तो किसी का परिणामवाचक है।
कितनों के लिए वह क्रिया की
अथक अपरिमित परिभाषा है।
तो किसी की क्रियाविशेषण है।
स्त्री रस है, छंद है, अलंकार है।
किसी के जीवन का प्रत्यय है।
किसी के जीवन का उपसर्ग है।
स्त्री समाज का समास है।
किसी के जीवन का कारक,
तो किसी का अव्ययी भाव है।
आधी अधूरी व्याकरण से बनी
एक भाषा के रुप में
स्त्री को पढ़ा जाता है।
फिर ये कहा जाता है
स्त्री को समझना मुश्किल है।
 
निःसंदेह मुश्किल होगा
क्योंकि अधूरा ज्ञान
पूर्णता को कभी पा नहीं सकता।
और व्याकरणीय त्रुटियों के साथ
पढ़ी गई स्त्री को भी
उसकी पूर्णता में कभी
कोई समझ ही नहीं सकता।।
 
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सुनो चिड़िया!
 
सुनो चिड़िया!
अपनी हर ऊँची उड़ान पर
यह भ्रम मत पालो
कि आसमान तुम्हारा है।
तुम्हारा यह भ्रम और कुछ नहीं
सिर्फ तुम्हारा भोलापन है।
तुम्हारी हर उड़ान पर 
वो जो पंखों को
कतरने में लगे रहते हैं
और तुम्हारे ही लहू से
आसमान पर लिखते हैं
आसमान हमारा है।
उनका यह भ्रम और कुछ नहीं
सिर्फ उनका मैलापन है।
 
सुनो चिड़िया!
मैं तुम्हें उड़ने से नहीं रोक रही हूँ
उड़ना तो तुम्हारा हक़ है।
उसे वे क्या रोक पाएँगे
जिन्हें स्वयं पर ही शक़ है।
फिर भी तुम्हें चेताना क्यों मुझे
अपना धर्म सा लगता है।
तुम्हारे कतरे पंखों में शायद मुझे
अपना मर्म सा दिखता है।
तुम्हारे कतरे पँखों के जीवाश्म
अवसादों में दबे कहीं मिले थे मुझे।
आज भी उन्हें मैंने कहीं
गहरे तहखानों में सँजो रखा है।
 
सुनो चिड़िया!
आसमान तुम्हारा नहीं,
पर उड़ानें तुम्हारी अपनी हैं।
अवसाद तुम्हारा नहीं,
कटे पंखों की जुबानें तुम्हारी अपनी हैं।
भोलेपन से कहीं दूर,
कुछ तो ऐसा करके दिखाना होगा।
मद को उनके कर चूर चूर,
उड़ानों की सच का दम दिखाना होगा।
आसमान उनका भी नहीं है,
इस भ्रम से उनको भी उठाना होगा।
आओ साथ एक ऊँची उड़ान भरकर आते हैं।
दम हममें भी है, चलो उनको दिखाते हैं।।

- डॉ. शुभ्रता मिश्रा
 
रचनाकार परिचय
डॉ. शुभ्रता मिश्रा

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