प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2016
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविताएँ
तापमान 47 डिग्री सेल्सियस
 
बन रही ऊँची ईमारत
कि थोड़ी सी छाँव में बैठ कर
वो खाती है सूखी रोटी
प्याज, हरी मिर्च कुतर कर
कारीगर चिल्लाता है
"अरी ओ महारानी खा लिया हो तो उठ जा "
वो बिना चबाये निवाला गटकती है
दिन भर ढोती है रेत और सीमेंट
छत पर ले जाती है ईंटें और पानी
शाम को मिली मज़दूरी से
बच्चों के लिये खरीदती है आटा-दाल
शराबी पति की मार खाकर भी
परोसती है उसे खाना और
रात होते ही जिस्म अपना
 
एक दिन उसने पति पर
कुल्हाड़ी से कर दिया वार
कितनी असमानता है
दिन भर मेहनत करके भी
मिलती है मज़दूरी कम जिसे
क्यों नहीं कर सकती वार वो आदमी पर
कब तक दबाये रखती गुस्से को अपने अंदर
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उम्र बीस साल
 
दिन के उजाले में लोग
उस जिस्म को मिट्टी बनने के लिए
छोड़ आये हैं क़ब्र में
उन  कहानियों की तरह
जो राजकुमारी को जंगल में
अकेला छोड़ आती थीं
वो सब तो झूठी कहानियां थीं
सच तो तुम्हारे साथ दफ़्न हो गया
उम्र बीस साल और ख़त्म ज़िन्दगी
त्याग, बलिदान और दुखों की
लम्बी फेहरिस्त के साथ
जिसे तुमने घूँट-घूँट उतारा
तुम्हारा परिचय भी हुआ होगा
हिंसा, उत्पीड़न ,यातना, अपमान शब्दों से
मौलवियों और उलेमाओं की इस दुनियां में
रोने पर पाबन्दी है और ज़ोर से हँसना मना है
तबलीग करने वाले सिर्फ फ़र्ज़ बताते है
और हक़ सिर्फ़ किताबों में लिखे जाते है
 
लौट रहे हैं पुरानी सभ्यता की ओर
खोदी जा रही हैं क़ब्रें लगातार
घर,बाहर, मुर्दाघरों में हर जगह हैं लाशें
चूड़ियों का बोझ ज़्यादा और कलाईयाँ पतली
कहते है क़ुदरत कि सबसे नाज़ुक संरचना हैं स्त्री
अनगिनत ज़ख्म है तुम्हारे जिस्म पर
कितनी बेहरहमी हुई है तुम्हारे साथ
तुम ने ज़िन्दगी की जंग आसानी से नहीं हारी थी
टूटी हुई उँगलियाँ इस की गवाह हैं
आंसुओं से भीगी ताज़ा लहू में डूबी कविता
लिखती हूँ काट देती हूँ फिर लिखती हूँ
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आदिवासी लड़की
 
लोहे के पँजे से वो रेत भर रही है तगाड़ी में
हाथों की चूड़ी
याद दिला रही है भगोरिया की
भूख उसे झाबुआ के जंगल और
उसकी बस्ती से बहुत दूर ले आई
सुबह से शाम तक रेत, सीमेंट ढोती है
कुछ देर रुके तो ठेकेदार दिहाड़ी काटने का कहता है
छुप कर हथली पर तम्बाकु मलती है
और फिर काम करने लगती है
उसके सपनों में रोज़ आता है भगोरिया का मेला

- शहनाज़ इमरानी
 
रचनाकार परिचय
शहनाज़ इमरानी

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कविता-कानन (2)