प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2016
अंक -38

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मोहब्बत की क़ीमत गर है, तो मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं!
"बेताबियाँ समेट के सारे जहान की 
जब कुछ न बन सका तो मेरा दिल बना दिया"
- जिगर मुरादाबादी 
अहा, प्रेम! आह, प्रेम! काश, प्रेम! उफ्फ, ये प्रेम!
प्रेम की कोई स्थायी परिभाषा है ही नहीं, ये तो प्रेम के बदलते रूपों के साथ-साथ परिवर्तित होती जाती है! जिसने जैसा जिया, वैसा लिखता गया। 
जरा सोचिये, गर 'प्रेम' न होता तो कविता होती? क्या तब भी लिखे जाते ग्रंथ? क्या इतने ही बिकते किस्से-कहानियाँ? यादों की इस दुनिया में भला किसकी तस्करी होती?
आख़िर कौन है ये? क्या है ये? क्यूँ है ये? जो असमय, अनामंत्रित दबे पाँव चला आता है। कभी चुपचाप साँसों को छूकर, हवा के झोंके-सा गुज़रता है और कभी संघनित मेघों-सा बरस, ह्रदय के कोमल अहसासों को हौले से भिगो जाता है। तो कहीं अचानक ही एक कोरी मायूसी थमाकर, धुन्ध बन दूर बादलों में उदास हो छिटक जाता है। सब कहते हैं, "इस जैसा कोई नहीं" पर, क्या ये सचमुच है भी कहीं?
 
ये हम ही हैं जो कभी इसकी हर गाथा सत्यापित करते हैं, इस पर पूरा यकीं दिखा जन्म-जन्मांतर की बातें करने लगते हैं और वो भी हम ही हैं जो इसके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा इसका होना ही खारिज़ कर देते हैं। कभी  किसी के जीने की वज़ह यही, कहीं इसके बिना जीवन ही नहीं! कभी खोया, कभी पाया, कभी मिला, कभी बिछुड़ा, कहीं एक पल भी ठहरा ही नहीं! जहाँ, जिससे, जैसा मिला...वैसा ही हो लिया। हंसा कभी बेतहाशा, दीवाना बन...कभी टूटा, चकनाचूर हुआ....बच्चों-सा, बिलख फूट-फूटकर रो लिया! हाँ, यही तो है प्रेम, जो किसी को केमिकल लोचा लगता है तो किसी को जुर्म समझा-सोचा लगता है।
"दिल का क्या हाल कहूँ सुब्ह को जब उस बुत ने 
ले ले अंगड़ाई कहा नाज़ से हम जाते हैं"
- दाग़ देहलवी 
 
ये प्रेम है या पानी? नदिया बन बहता जाता है। जलाता, अंगारा बन हृदय को....तो कभी बर्फ हो पिघल जाता है। मिलता बहुरुपिया की चाल में अचानक किसी मोड़ पर, हाथ न थामो तब भी....देखो तो फिर भी कैसा, दिल में गहरा असर छोड़ जाता है!
आख़िर सत्तर प्रतिशत क्या है, शरीर में? 'पीर' या 'नीर'? 'प्रेम' कि 'पानी'?
है न जानी-पहचानी, वही अनसुलझी कहानी! आह, फिर हुई इक मीरा, बनी  प्रेम दीवानी! कहीं चलते कृष्ण, साथ राधा रानी!
 
जब दो ह्रदय प्रेम में होते हैं, गुनगुनाते हैं, मुस्कुराते हैं, यूँ ही बात करने की वज़ह ढूंढ लेते हैं। 
बस की बग़ल वाली सीट पर बैठा शख़्स हो या स्टेशन पर मिलती कटिंग चाय, कोई तस्वीर, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सब शामिल हो जाते हैं उनकी बातों में! क्योंकि विषय नहीं, उन दो स्नेह-सिक्त हृदयों में 'अहसास' सर चढ़कर बोलता है। प्रेम के सबसे खूबसूरत पल वही होते हैं जब एक-सा भाव धड़कनों की तरह एक साथ पनपता, कूदता, इतराता फिरता है।  
 
वह मुश्क़िल दौर भी आता है जब दूरियां बढ़तीं हैं और बात न हो पाने की वजहें बताई जाती हैं। वक़्त न मिल पाने की, दुष्कर जीवन और मजबूर हालात की दुहाई दी जाती है और प्रेम बोझ, मजबूरी, ज़िद के विशेषण से घायल, अपमानित हो घोर निराशा और अवसाद की पीड़ा झेलने को बाध्य हो जाता है। यक़ीनन  इसका यह रूप अत्यंत दुःखद है। परिस्थितियाँ मन:स्थिति कुछ भी हो....उन्हें इस बात के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि ज़्यादातर मामलों में ये वही रहती हैं, जो प्रारंभिक दौर में थीं! बात नीयत के बदलने की है, वादे को तोड़ने की है..इसीलिए 'वादा' सोच-समझकर करें फिर चाहे वो प्रेम हो या दोस्ती! दिल, दोनों के ही टूटने में बराबर का दुखता है! कहते हैं, यदि साथ रहने की चाहत हो तो एक स्वस्थ दोस्ती उम्र-भर निभाई जा सकती है! जब ऐसा लगने लगे कि टूट गई तो शायद कभी थी ही नहीं!
"कुछ खटकता तो है पहलू में मिरे रह रहकर
अब ख़ुदा जाने तिरी याद है या दिल मेरा" 
- जिगर मुरादाबादी
 
एकतरफा इश्क़ में यूँ भी होता है  कि एक पक्ष सिर्फ अपनी भावनाओं का सम्मान चाहता है और दूसरा उसे समझने की बजाय हर बार तिरस्कृत कर बाहर का रास्ता दिखा दिया करता है। भीड़ के बीच कहीं दो क़िरदार मिलते हैं.... कहानी बनती है! जीवन की दौड़ में कोई एक क़िरदार वक़्त के बहाव में इतना आगे निकल जाता है कि पलटकर आता ही नहीं! 'कहानी' ठिठककर, सकुचाई-सी वहीँ खड़ी रह जाती है। उसके बाद की कहानी समाज तय करता है, 'दुखांत', 'सुखांत' या 'एकांत'!
बेचारा 'अंत', 'अंत' तक तय नहीं हो पाता और कुछ प्रेम कहानियाँ अधूरी ही रह जाती हैं......! एक अंतहीन 'इंतज़ार' बनकर!
लेकिन कई बार कहानी के बाद भी, कहीं खाली जगह छूट जाती है या शायद छोड़ दी जाती है उम्मीद की किरण वहीँ से प्रस्फुटित होती है और वो बचा हुआ हिस्सा ही खुशनसीबी बनकर एक दिन यकायक; कुछ इस तरह से दस्तक़ देता है कि फिर आप मुस्कुराये बिना नहीं रह पाते! 
'आखिरी पृष्ठ' हमारे भरने के लिए ही होता है, उसे इंद्रधनुषी रंगों से सराबोर कर दीजिये! कहानियों का ज़िंदा रहना भी आवश्यक है। 
 
कभी महसूस होता है कि 'प्रेम' रेस्टोरेंट में साइड वाली टेबल पर परोसी गई उस डिश की तरह है, जिसे ऑर्डर न करने का अफ़सोस रहता है और अगर ऑर्डर कर दिया तो यही अफ़सोस दोगुना हो जाता है। कुछ शब्द, कुछ अहसास शायद किताबों, क़िस्सों-कहानियों के लिए ही बने हैं। इनकी हक़ीक़त उतनी खूबसूरत नहीं, जितना भरम देती है! तो कहीं इसके ठीक विपरीत स्थिति भी होती  है, जो सुखद है। दुर्भाग्य है कि कई लोगों को इसकी अहमियत का अंदाज़ा ही नहीं होता!
 
दरअसल 'प्रेम' एक गीत है, राजकपूर-नरगिस का "प्यार हुआ, इक़रार हुआ" टाइप
प्रेम देवदास-पारो भी है, पल-पल रुलाई फूटे...पर दुनिया वाह-वाह करते नहीं थकती!
ये सिलसिला भी है, जहाँ अंत में कुछ नम हिन्दुस्तानी आँखें और दिल से आह निकलती है!
ये लम्हे भी है, जहाँ हैरानगी के साथ यक़ीन बरक़रार रहता है!
ये दिलवाले दुल्हनियाँ ले जाएँगे, के उम्मीद दिलाते राज-सिमरन हैं!
प्रेम 'वीर-ज़ारा' भी है, जिसमें अंत एक सिहरन के साथ भीतर तक छू जाता है!
हम पैसा खर्च करते हैं, इस यक़ीन पर यक़ीन करने को... खूब तालियाँ भी पीटते हैं, खुद को नायक-नायिका के स्थान पर बिठाकर! रात ख़्वाबों और दिन गुलाबों को चुनने में निकल जाता है! 
पर साँसें लेना दूभर हो जाता है जब अंत 'क़यामत से क़यामत तक' की तरह होता है...!
कहीं दो मृत शरीरों का दाह-संस्कार दिखाई देता है और कोई खुद ही इन अहसासों का गला घोंट देता है! समाज, नियम-क़ानून, लोग क्या कहेंगे...इन बातों में कोई सच्चाई नहीं! दरअसल एक पक्ष, अक़्सर कमजोर निकल जाता है!
 
यह भी एक तथ्य है कि 'प्रेम' अगर इकतरफ़ा नहीं हुआ होता, तो इसकी इतनी चर्चा नहीं होती कभी! प्रेम पर लिखे ग्रन्थ इसके गवाह हैं। उनमें घायल पक्षियों की आवाज़ें हैं, विरह-वेदना है, आँसू से भीगे मन और खोई हुई चेतना है! जो पा ही लिया तो चर्चा क्या? रोता वही है जो खोता है!
'प्रेम' पर असीम विश्वास उसी शख़्स की वज़ह से होता है, जो इसके टूटने का कारण भी होता है। और फिर आप खुद से इतनी नफ़रत करने लगते हैं कि अगले हर जन्म के लिए न तो किसी पर विश्वास हो सकता है और न ही प्रेम!!
"नज़राना तेरे हुस्न का क्या दें कि अपने पास 
ले दे के एक दिल है सो टूटा हुआ सा है"
- शहरयार 
 
प्रेम एक व्यापक विषय है, जिसका भाव और भी विस्तार लिए है। यह मात्र प्रेमी-प्रेमिका तक ही सीमित नहीं। माँ का अपने बच्चों से, भाई का बहिन से, पिता का पुत्री से, शिक्षक का अपने विद्यार्थियों से, हम सबका अपने देश से। अनगिनत, अप्रतिम, सुनहरे रूप हैं इसके! प्रेम का अलौकिक स्वरुप स्त्री-पुरुष संबंध से इतर भी है और सुन्दर भी!
कभी स्वयं से प्रश्न पूछकर देखिये कि आसमान पर काली घटा के छाते ही मन मयूर क्यों नाच उठता है? समंदर किनारे रेत पर धंसते हुए पाँव और टकराती लहरें कैसा जीवन दे जाती हैं? घने पेड़ों की छाँव तले सुस्ताते पलों में चिड़िया की चहचहाहट क्यूँ भली लगती है और गिलहरी जब दोनों हाथों से पकड़ कुतुर-कुतुर दाना चबाती है तो दिल को कैसी ख़ुशी मिलती है? अपने गाँव में क़दम जब लौटते हैं और बीती गलियों में वक़्त को थामे जब दो दोस्त साथ चलते हैं; वो अनमोल पल कहाँ से पैदा होता है? ये नदी, झरने, पंछी, पहाड़, पेड़-पौधे, ये धरा सब हमें प्रेम ही तो देते हैं, प्रेम ही सिखाते हैं। कहते हैं फरवरी प्रेम का महीना है, हमें इन सबसे प्रेम करना होगा, सबका ख़्याल रखना होगा, इन्हें जीवित रखना होगा और मानव जाति को इसी एक धर्म, इसी रंग से सराबोर करना होगा! क्योंकि -

मोहब्बत की क़ीमत गर है, तो मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं! 

 


- प्रीति अज्ञात
 
रचनाकार परिचय
प्रीति अज्ञात

पत्रिका में आपका योगदान . . .
हस्ताक्षर (38)कविता-कानन (1)ख़ास-मुलाक़ात (9)मूल्यांकन (2)ग़ज़ल पर बात (1)ख़बरनामा (12)व्यंग्य (1)संदेश-पत्र (1)विशेष (2)'अच्छा' भी होता है! (2)फिल्म समीक्षा (1)