फरवरी 2016
अंक - 11 | कुल अंक - 56
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लघुकथाएँ
चलो दिल की सुनें
 
अस्मिता अपने बेटे को स्कूल के लेकर लौट रही थी। रास्ते में पड़ने वाली दुकानें और आयास की फरमाईशें। पर अस्मिता भी आयास की हर ख्वाहिश पूरी करती और उसे अपने बेटे के चेहरे पर आई खुशी देखकर अपार सुख मिलता। उसका सोचना था कि यही उम्र तो है बेफिक्र रहने की। फिर तो बढ़ती उम्र, बढ़ती मुश्किलें। आज भी यही सिलसिला जारी था। सेब बेहद अच्छे लगते है आयास को, ये सोचकर अस्मिता फल वाले से सेब खरीदने लगी। तभी आयास ने हाथ खींचा अस्मिता का। अस्मिता ने देखा कि जमीन पर कपड़ा बिछाकर एक औरत बच्चों के छोटे-छोटे खिलौने, घड़ी, चश्मे बेच रही थी।
 
"आयास बेटा क्या चाहिए तुमको..पहले से ही काफी खिलौने हैं न.." अस्मिता ने समझाया
"ना मम्मी..वाच..आयास मचला"
सस्ती ही होगी...सड़क पर बेच रही है ये सोचकर अस्मिता सेब का पैकेट बैग में रखते हुए उस खिलौने वाली की तरफ आई और घड़ी का दाम पूछा।
"50 रुपए" नीरस आँखों वाली उस औरत ने भावहीन आवाज में कहा।
"क्या 50? लूट मचा रखी है क्या? है क्या इसमें? प्लास्टिक की तो है..30 रुपए ले लो।" अस्मिता ने भाव-ताव करते हुए कहा।
"एक रुपया कम नहीं लूंगी बीबीजी" खिलौने वाली ने रूखी आवाज में कहा।
अस्मिता ने मन में हिसाब लगाया "दुकान से लूंगी तो थोङे रूपए और लगाकर ब्रांडेड मिल जाएगी। वैसे भी बात कैसे कर रही है ये जैसे बेचनी ही न हो।"
और आयास का हाथ पकङकर चल ही दी थी कि उसकी नजर खिलौने वाली की बगल में बैठे सहमे, कमजोर से बच्चे पर पड़ी।
 
अस्मिता के मन में एक साथ कई सवाल तैर गए और उसने रुककर खिलौने वाली से पूछा, "तुम अपने बेटे को स्कूल नहीं भेजती? खिलौने वाली ने पहली बार अपनी नीरस आंखों को ऊपर उठाकर अस्मिता को देखा। अस्मिता को उन आंखों का खालीपन बहुत कुछ कह गया। पर वह उससे जानना चाहती थी, क्योंकि खिलौने वाली के रुखेपन का जबाव शायद इन्हीं बातों से मिल सकता था।
अपने बेटे को देखकर खिलौने वाली की आँखें नम हो आईं, जो उसकी मजबूरी की कहानी कह रही थीं। वो बताने लगी, "दो महीना पहिले इसके पिता चल बसे, फैक्टरी में मजूर थे, मशीन में हाथ आने से हाथ कट गया और सेपटिक पूरे तन में फैल गयी, मुआवजा न दिये वो बाबू लोग, इलाज में जो थोङा बहुत था वो भी बिच गया, फिर भी न बच पाए वो और हमें अकेला छोड़ चल बसे" बताते-बताते उसकी आवाज रुंध गयी।" अब बिटिया घर-घर झाड़ू-पौंछा करती है और ये मेरी संग बैठता है ताकि चार पैसे कमा सकें तो जीवन गुजारा हो, पढाई का क्या है? कौन सा औकात है हमारी जो इसे बाबू बना देंगे, इसलिए स्कूल बंद करा दिया।" कहकर वो आंसू पौंछने लगी।
 
अस्मिता सच्चाई और उसकी भयावहता तक पहुँच चुकी थी। उसने एक नजर आयास और एक नजर उस बालक पर डाली। मन सहम गया उसका और करुणा से भर गया। पर्स से सौ का नोट निकाल आगे बढाते हुए अस्मिता ने खिलौने वाली से कहा, "ये लो और दो घड़ियाँ दे दो और हाँ सामने वाली कॉलोनी में 89\c मेरा घर है, कल से एक घंटे के लिए अपने बेटे-बेटी को मेरे घर पढने भेज दिया करना और जब हालात ठीक होने लगे तो तुरंत स्कूल में डालना दोनो को, अगर पढेंगे नहीं तो बाबू बनेंगे कैसे? और अगर कोई भी जरूरत हो तो मुझसे मिलना"
"जी बीबीजी" खिलौने वाली रूंधे गले से हाथ जोड़ इतना ही कह पायी।
अस्मिता ने मुस्कुरा कर सिर हिला दिया और आयास का हाथ थामे घर की ओर बढ गई।
 
 
 
 
 
संस्कार
 
हेतराम अपने पिताजी के जमाने की जर्जर साइकिल पर  दम भरता हुआ चला जा रहा था। सात बजने को थे और हल्का धुंधलका छाया हुआ था। मिठाई की दुकान देखते ही उसकी साइकिल थम गई। दो दिन पहले ही तो उसकी घरवाली ने याद दिलाया था कि दिवाली है चार दिन बाद तो कुछ मीठा ले आना।
आज के काम के पूरे साढ़े तीन सौ रूपए मिले थे उसे, साथ में मालकिन ने एक चोकलेट भी पकड़ा दी थी बच्चों के लिए।
"सेठ ढाई सौ ग्राम पेड़े तोल देना" हेतराम साइकिल से उतरते हुए बोला और रूपये पूछकर हलवाई की ओर बढ़ा दिये। हाथ में मीठे का पैकेट आते ही ऐसा लगा कि मुनिया और राजू की लाखों वाली खुशी खरीद ली हो। मन ही मन मुस्कुराते हुए हेतराम पैडल मारने लगा, घर जाने की जल्दी जो थी आज।
फिर सहसा ही उसे  याद आया, जिस घर में वो पेन्ट का काम करके लौटा है वहाँ मालिक के बच्चे कितने मंहगे कपड़े पहने हुए थे और हाँ, मोबाइल भी था दोनों बच्चों पर अलग-अलग। अंग्रेजी में मोम-डैड बोल रहे थे। क्या किस्मत है उनकी।
 
हेतराम का दिल फिर उदासी की गर्त में जा बैठा। मुनिया हर त्यौहार पर अपनी इकलौती अच्छी' पोशाक पहन लेती है, फिर बक्से में रख देती है अगली बार के लिए। हाँ, राजू कभी कभी जिद कर जाता है नए कपड़ों की, छोटा है न अभी।
उसने मन ही मन पक्का किया कि कैसे भी जोड़-तोड़ और मेहनत से रूपए बचाकर बच्चों को नए कपड़े तो दिला ही देने हैं।
आखिर उन्हें दे क्या पाता हूँ। मीठा खरीदने की खुशी दूर उड़ चुकी थी।
सोचते-सोचते घर आ पहुँचा, साइकिल दीवार से टिकाई।
आवाज सुनकर हेता की घरवाली बाहर आई, एक आत्मीय मुस्कान के साथ उसका स्वागत किया। हेता ने पूछा ही था मुनिया और राजू के बारे में कि भीतर से दोनों बाबा-बाबा पुकारते हुए सामने आ खङे हुए।
मुनिया पानी लाई थी, गिलास प्लेट में सजाकर और राजू तो लिपट ही गया अपने बाबा से।
हेतराम के अंतस में आज दोपहर का दृश्य तैर गया, जब उस घर की मालकिन ने अपनी बेटी को एक कप कॉफी बनाने को कहा था क्योंकि सिर दर्द कर रहा था उनका और उनकी बेटी भिनभिनाती, पैर पटकती सोफे पे पसर गई थी टीवी के सामने, ये कहके कि उसका पसंदीदा प्रोग्राम  आ रहा है।
 
अचानक हेतराम के मन से सारी कुंठा हवा हो गई। उसने मीठे का पैकेट मुनिया को थमाया और राजू को चोकलेट। दोनों बच्चे खुशी से चहकने लगे। हेतराम और उसकी पत्नी मुस्कराते हुए अपने मासूम बच्चों को देख रहे थे।
अब कुंठा की जगह संतुष्टि ने ले ली थी, क्योंकि वो समझ गया था कि संस्कार ही असली धन है, जो उसने अपने बच्चों को बखूबी दिए हैं।
 
 
 
 
 
समझौता
 
पुरातन से लेकर आधुनिक समाज तक 'समझौता' शब्द बड़ा प्रासंगिक रहा है और इसकी महत्ता देखकर लगता है आगे भी यही प्रक्रम चलता रहना है। बचपन से बड़े होने तक आपने भी कभी स्वार्थवश तो कभी मजबूर होकर कई समझौते किये होंगे। लेकिन कुछ समझौते हमें गहराई तक सोचने पर मजबूर कर देते हैं।
अभी कुछेक दिन पहले की बात है, कस्बे के बाहरी मैदान में बंजारे अपने डेरे जमाए हुये थे। और दिनों की तरह दिन गुजर रहा था, डेरे के स्त्री पुरुष अपने-अपने कार्यों में व्यस्त थे। केले के पत्तों का नर्म बिस्तर बिछाकर एक बंजारन ने अपने कलेजे के टुकङे को सुलाया हुआ था। महज डेढ दो साल का बालक सारी दुनियादारी से अंजान नींद का परम आनंद ले रहा था। माँ भी किसी भी आशंका से अनभिज्ञ अपने काम को करने में मगन थी। सब प्रतिदिन की भांति चल रहा था।
 
मैदान में ही एक नवयुवक अपने प्रशिक्षक से कार चलाना सीख रहा था। ज्यादा नहीं दो दिन ही हुए थे उसे। बड़े मनोयोग से सीख रहा था। ड्राइवर की नौकरी के लिए आवेदन कर रखा था। नम्बर आने का पूरा योग था।
निष्ठुर पल आया..गाड़ी के आगे गाय.. नवयुवक सकपकाया..स्टीयरिंग अंधाधुंध घुमाने लगा...बिना आगा-पीछा देखे और गाड़ी केले के पत्ते पर सोये हुए नादान शिशु को मांस के लोथड़े में बदलते हुए पेड़ से टकराकर रुक गई।
ओह निर्दयी वक्त ! गलती किसकी? नवयुवक जो भविष्य बुन रहा था, गैर इरादतन बच्चे को कुचल बैठा या अभागी माँ जो बालक को सुला लापरवाह हो गई??
खैर पुलिस आई, भीङ जुटी, नवयुवक की हालत खराब.... माँ रो रो कर बेहाल।
 
तभी एक 'समझौता' हुआ।
गरीब बंजारे के जोड़े को समझाया गया, "देख! तेरा बच्चा तो चला गया, इसका भविष्य क्यों खराब करता है? मान ले तू इसे जेल करा दे भी तो ये कुछेक दिन में बाहर तो आना ही है। तुझे क्या मिलेगा? कोर्ट कचहरी लायक तेरी हिम्मत नहीं है। सबसे अच्छा यही है कुछ रुपए ले और मामला रफा दफा कर दे।
अगले दिन पता चला बंजारा दंपति डेरा समेट के कहीं और चला गया...25000 रुपये उसे दिए गये और 10000 पुलिस को। 
'समझौता' हो गया। सब भूल भी गये कि किसी का बच्चा मरा था।

- अंकिता कुलश्रेष्ठ

रचनाकार परिचय
अंकिता कुलश्रेष्ठ

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कथा-कुसुम (1)