प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2016
अंक -42

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल की बात
साथियों आज ग़ज़ल सबसे लोकप्रिय विधा बनकर उभर रही है। फेसबुक, व्हाट्स अप जैसी सोशल साइट्स पर इसे युवाओं ने हाथों हाथ लिया है। आज मैसेज भी ग़ज़ल के रूप में भेजे जा रहे हैं। हर वर्ग ग़ज़ल से जुड़ रहा है। यह शुभ संकेत तो है लेकिन इससे ग़ज़ल का स्वरूप भी बिगड़ रहा है। ग़ज़ल को जनता के बीच आने पर थोड़ा बहुत अपना शास्त्रीय रूप छोड़ना पड़ सकता है, लेकिन ग़ज़ल के नाम पर खुल्लम खुल्ला जुमलेबाज़ी तो स्वीकार्य नहीं हो सकती। इन्हीं चिंताओं के मद्देनज़र अनमोल भाई ने मुझे ग़ज़ल के सामान्य क्राफ्ट से युवाओं को परिचित कराने का कार्य सौंपा। इस कार्य को हाथ में लेते हुए मुझे बहुत संकोच हो रहा है क्योंकि अभी तो मैं ख़ुद ग़ज़ल का एक साधक भर हूँ। शायद करीम भाई की दरकार यही रही हो कि जो आदमी ज़्यादा नहीं जानता है वो ज़्यादा उलझाएगा भी नहीं।
अगले अंकों से हम चरणबद्ध चर्चा प्रारम्भ करेंगे। उससे पहले सामान्य-सा परिचय जो मैं जानता हूँ, आपको दे देता हूँ। मेरी कोशिश यह रहेगी कि हम केवल ग़ज़ल का क्राफ्ट पकड़ें, भाषा या व्याकरण पर न जाएं। आगे ग़ज़ल का नक्शा है, इसमें वे चरण हैं जिनसे होते हुए हम ग़ज़ल तक पहुंचेंगे। उसके बाद सभी मिलकर एक एक बह्र पर अभ्यास करेगें।
 
ग़ज़ल का नक्शा-
 छोटी बूंदें –-- अ , इ , उ , ऋ (कोड –1) लाम 
   !
 बड़ी बूंदें --- आ , ई , ऊ , ए , ऐ , ओ , औ , अं , अः(कोड-2) गाफ़ 
   !
 छीटें --- > 1-1 > 22  > 12 > 21 जुज़ 
   !
 हिलोर --- सतत > मिश्र > रूपांतरित रुक्न 
   !
 लहर --- दु कड़ी > ति कड़ी > चौ कड़ी आदि बह्र    
   !
 पंगत --- हरावल (बात) > बराबर ( बेजोड़ बात )\ मिसरे (ऊला –सानी )
   ! 
  शेर --- मतला –अशआर –मक्ता ( काफ़िया = तुक , रदीफ़ = टेर  
   !
 ग़ज़ल --- मुरद्दफ़ \गैर मुरद्दफ़ \मुसल्सल 
   
बूंदें (drops)---- सबसे पहले बात करते हैं छोटी और बड़ी बूंदों की।  
कंप्यूटर में binary(दो अंकीय) पद्धति प्रयुक्त होती है। कंप्यूटर सारे इनपुट डाटा को अपने दो कोड 0 और 1 में रूपांतरित कर लेता है। उसी तरह ग़ज़ल में भी सभी शब्दों को binary कोड में बदल लेते है। ग़ज़ल के binary कोड हैं 1 और 2 
छोटी बूंदें --- ये वे शब्द या वर्ण होते हैं—
० जो छोटी मात्रा (अ , इ , उ , या ऋ की मात्रा) युक्त होते हैं। जैसे- क , कि , कु , कृ 
० जो बड़ी मात्रा युक्त वर्ण किसी बह्र में छोटी मात्रा युक्त वर्ण के नीचे आकर मात्रा पतन के कारण लघु मात्रिक हो जाते हैं। 
० अनुनासिक युक्त वर्ण जैसे- हँसी =12 
० ऐसी छोटी बूंदें जिनके बाद आधा ह यानि ह हलंत हो और छोटी बूंद के उच्चारण पर कोई स्वराघात न पड़ रहा हो, उसे दीर्घ नहीं करेगें। जैसे – तुम्हारा = 1 2 2 क्यों कि यहाँ 
तुमारा =122 उच्चारित हो रहा है। कई जगह ह हलंत रूप में होता है। जैसे- खंडहर = खंडर 
मेहमान = मेमान , चेहरा = चेरा 
० कुछ आधे वर्ण , जिनसे पहले बड़ी मात्रा हो , पर स्वराघात आने के कारण ग़ज़ल में इन्हें छोटी मात्रा की तरह मानते हुए 1 कोड देते हैं। जैसे – रास्ता = 212 , दोस्ती = 212  
० इन्हें बाइनरी कोड 1 दिया जाता है
 
बड़ी बूंदें --- ये वे शब्द या वर्ण होते हैं –
० जो बड़ी मात्रा (आ , ई , ऊ , ए , ऐ , ओ , औ , अं , अः ) युक्त होते हैं। जैसे-- का , की , के , कै, को , कौ , कं , कः
० जो लघु वर्ण सयुंक्ताक्षर ( क्ष , त्र , ज्ञ , श्र ) से पहले आते हैं, स्वराघात के कारण दीर्घ स्वर या बड़ी बूंद हो जाते हैं। जैसे- दक्ष = 21 , मिश्र =21 यज्ञ=21 पुत्र = 21 
० जो लघु हलंत या आधे वर्ण से पूर्व आते हैं, वे भी बड़ी बूंद हो जाते हैं। जैसे- कच्चा =22 
शह्र = श ह् र = 21 
० अनुस्वार युक्त वर्ण कं = 2 (ऊपर बताया है)
० ऐसी छोटी बूंदें जो एक साथ जुड़कर एक साथ उच्चारित होकर बड़ी बूंद जितना स्वराघात पैदा करती हैं। जैसे- दस =2 , मत =2 , रथ =2 । हिंदी छंदों के अनुसार दशरथ = 1111 लेकिन ग़ज़ल के बाइनरी कोड में इसे दश रथ = 2 2 लिखेंगे। ऐसे शब्दों को हम साथ उच्चारित छोटी बूंदों को एक ही शिरो रेखा (upper line ) के नीचे रखकर बीच में स्पेस दे देंगे। जैसे-
नफ़रत = नफ़ रत =2 2 
भारत = भा रत = 22 
चमन = च मन = 1 2 
अब हम किसी भी शब्द को आसानी से छोटी और बड़ी बूंदों में विभक्त करके उन्हें अलग अलग शिरो रेखा के नीचे रखकर बाइनरी कोड 1 या 2 दे सकते हैं।
देखें- क़यामत = क़ या मत = 1 2 2 
यहाँ क़ = 1 = लाम =हस्व स्वर = लघु = छोटी मात्रा = छोटी बूंद है।
या और मत = 2 = गाफ़ = दीर्घ स्वर = गुरु = बड़ी मात्रा = बड़ी बूंद है।
बड़ी बूंद के दो रूप  देखने को मिल रहे है यथा –
*सकील यानि भारी (heavy )- वे वर्ण जिन पर सीधे बड़ी मात्रा लग रही है। जैसे , या= 2
*खफीफ़ यानि हल्का ( light )- वे शब्द जो दो लाम के एक साथ उच्चारित होने से बने हैं। जैसे , मत = 2 । हिंदी छंदों में इन्हें 11 ही लिखते हैं लेकिन ग़ज़ल में इन्हें दीर्घ गिनेगें।
 
छींटेबड़ी और छोटी बूंदों के मेल से चार प्रकार के छींटें उछलते हैं ---
# लाम-लाम = 1 +1 = 11 
# गाफ़ –गाफ़ = 2 + 2 = 22 
# लाम – गाफ़ = 1 + 2 = 12 
# गाफ़ – लाम = 2+1 = 21 
*22  = हिम् मत , वा दा , बा दल , दर पण , ख़त रा , कं गन।
*12 = ह वा , क सम , न शा , ब दन , क मल , मि ला , खु ला , कृ पा।
*21 = रा त , शह् र , ढो ल , ची ल , भू ल , दश् त , चि त्र , क क्ष , वि ज्ञ।
*1 1 --- यह तब बनते हैं जब 12 और 21 की छोटी बूंदें 1 शिरोरेखा से अलग होकर मुक्त रूप में उपलब्ध हो। देखिए –
रा त =2 1 और क ली =1 2  
रा तक ली = 2 1+1 2 = 2 2 2 
लेकिन , न कहो में ये 1 1 2 रूप में ही रहेगें।
# इन छींटों को उर्दू में , जुज कहते हैं।
 
हिलोर – छीटें जब एक साथ उछलते हैं तो वे हिलोर या बौछार या फुहार का रूप ले लेते हैं।
इन्हें उर्दू में रुक्न , हिंदी में लयपद आदि नाम दिए गए हैं।
हिलोर देखें-
12 2 ,  212 ,  1 2 22 , 22 12 , 2 122 , 1 12 12 , 1 12 12 आदि 
एक ही प्रकार की हिलोर हो तो सतत हिलोर।
अलग अलग प्रकार की हिलोर हो तो मिश्र हिलोर या मिश्र फुहार।
 
लहर---जब हिलोर की क्रमिक आवृत्ति यानि दोहराव हो तो वह लहर का रूप धारण कर लेती है। इसे ही उर्दू में बह्र और हिंदी में छंद का नाम दिया गया है।
>अगर एक ही प्रकार की हिलोर की लगातार आवृत्ति हो तो वह सतत लहर कहलाएगी। इन्हें उर्दू में सालिम (अखंड) बह्र कहा गया है।
>अगर अलग अलग प्रकार की हिलोर की आवृत्ति हो तो उन्हें मिश्र लहरें या हिलमिल लहरें कहेगें। इन्हें उर्दू में मुरक्कब बहरें कहा गया है।
<अगर सतत या मिश्र लहरों में कुछ बूंदें गिराकर नई लहरें उछाली जाए तो उन्हें रूपांतरित लहरें कहेगें। इन्हें उर्दू में मुज़ाहिफ बहरें कहा  गया है।
 
सतत हिलोर एवं लहरें– कुल सात प्रकार की हिलोर सतत है। इन्हें याद रखने के लिए मैंने एक मिसरा लिखा है।
तराना \झूमकर \मुहब्बत का \ गुनगुनाओ \ हँसते रहो \ उदास कभी \ न रहो सनम 
तराना = 122 
झूमकर = 212
मुहब्बत का = 1222 
गुनगुनाओ = 2122 
हँसते रहो = 2212 
उदास कभी = 12112 
न रहो सनम = 11212 
आप देख रहे होंगे कि इस मिसरे के शब्दों में मात्रा क्रम यानि वज़न लिखने पर हमें सात सतत हिलोर (सालिम रुक्न ) प्राप्त होते हैं। उर्दू में इन्हें याद रखने के लिए म फ़ा इलुन , फ़ायलातुन , मुस तफ इलुन आदि फ़ारसी अरकान है। हिंदी में यमाताराजभानसलगा पिंगल सूत्र है।
 
>अगर सतत हिलोर को H लिखें। तथा लहर को L लिखें तो–
L = N  x  H   
L = लहर 
H = हिलोर 
N = हिलोर की आवृत्ति की संख्या = 1 , 2, 3 , 4 ........सतत।
उदाहरण–
122 –122 –122 –122 .........सतत 
यहाँ N = 4 , H = 122 = तराना , लहर = तराना 4 कड़ी 
यदि सतत लहर की अंतिम हिलोर में कोई बूंद गिरा दें तो उस हिलोर को आधी गिनेगें।
इस प्रकार हमें एक ही लहर के निम्न रूप मिल जाते हैं।
1) N = 1 = एक कड़ी = 122 
2) N = 1.5 = डेढ़ कड़ी = 122 –12 
3) N = 2 = दो कड़ी  = 122 –122 
4) N = 2.5 = ढाई कड़ी = 122—122--12 
5) N = 3 = तीन कड़ी  = 122 –122 –122 
6) N = 3.5 = साढ़े तीन कड़ी  = 122 –122 –122 –12 
7) N = 4 = चार कड़ी  = 122 –122 –122 –122 
इसी तरह हम सभी सातों सतत लहरों के सात रूप प्राप्त कर सकते हैं। मोटे तौर पर हमारे पास 7 x 7 = 49 लहरें उपलब्ध हैं।
 
पंगत--- इस तरह लहरों की दो पंगत ( पंक्तियाँ ) होने पर एक शेर कहलाता है।
इन पंक्तियों को मिसरे कहते हैं।
>पहला मिसरा = हरावल = बात = ऊला कहलाता है।
>दूसरा मिसरा = बराबर = बेजोड़ बात = सानी कहलाता है।
जैसा कि ज़ाहिर है पहले मिसरे में कोई बात रखी जाती है। दूसरे मिसरे में उसी बात के प्रसंग और संगत में कोई बेजोड़ बात कही जाती है।
 
शेरइस तरह ऊला और सानी मिसरे के साथ निश्चित बह्र में कही गई कवित्व युक्त रचना को शेर कहते है।
ग़ज़ल– इस प्रकार 3 , 5 , 7 , 9 और अधिक विषम संख्या में अशआर की रचना को ग़ज़ल कहते हैं।
>ग़ज़ल का पहला शेर मतला या मुखड़ा कहलाता है।
>ग़ज़ल का अंतिम शेर मक्ता कहलाता है। मक्ते में अर्थानुरूप शायर का उपनाम होता है जिसे तखल्लुस कहते हैं।
 
आगामी अंकों में हम ग़ज़ल की अन्य बातों काफ़िया, रदीफ़, मिश्र और रूपांतरित बहरों पर चर्चा करेगें। अन्य अंकों में मासिक बहरें चुनकर उन पर ग़ज़ल कहने का अभ्यास करेगें। मैं स्वयं अभी साधक भर हूँ अतः ग़ज़ल साधकों का इस स्तम्भ में सादर स्वागत है।
 
नमस्कार

- ख़ुर्शीद खैराड़ी