प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2016
अंक -46

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

व्यंग्य
व्यंग्य लेख- पानी
 
सैंकड़ौं वर्ष पहले रहीम जी कह गए थे-
 
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न उबरै, मोती मानुस चून।।
 
पर अब हम रहीम जी को क्या कह सकते हैं? सैंकड़ौं वर्ष पहले अब्दुल रहीम खानखाना नहीं जानते थे कि एक ज़माना ऐसा भी आएगा, जब मोती नकली बनने लगेंगे और उनका पानी जल्दी ही उतर जाएगा। मोती तो आखिर मोती है। कहते हैं हैदराबादी मोती सच्चे होते हैं। अब इस बात पर केसै विश्वास किया जाये? अब सोचने कि बात यह है कि क्या मोती बोलकर कहेगा कि मैं सच्चा या झूठा हूँ? बस हमें भगवान भरोसे भरोसा करना पड़ता है, उस बेचने वाले भलमानुस का।
अब मोती का पानी देखने के लिए आपको उसे इस्तेमाल करना पड़ेगा। पर लोग हैं कि उसे इस्तेमाल करने से डरते हैं, क्या पता कब पानी उतर जाये, हजारों लाखों रूपये बरबाद हो जाये। कितनी मुश्किल से पेट काट-काट कर मोती खरीदते हैं, झूठी शान दिखाने के लिए गाहे-बगाहे पार्टियों में पहनकर अपना रूआब दिखाते हैं।पर जनाब हमारे जैसों की नज़र से उनका उतरा हुआ पानी छुपता नहीं है और पोल खुल ही जाती है कि इन पर जगह-जगह पानी उतरा हुआ है।
 
अब मानुस को लो और ढूंढो़ उसका पानी .................। विज्ञापन की तरह ढूंढ़ते रह जाओगे, नहीं मिलेगा! कुछ ऐरों -गेरों में यदि मिल भी जाये, तो वे बेचारे पानी के कारण अपनी नज़रें शर्म से नीची कर लेते हैं। अब मानुस की आॅंख को देखो, बिल्कुल साफ-सुथरी सूखी है। वो डॉक्टर को दिखाता है, दवाई का पानी लाता है और आॅंख में डालकर पानी दिखाने की कोशिश करता है।
पानी वाला आदमी इज़्ज़त के योग्य ही कहाँ बचता है, उसे कोई हींग लगाकर भी नहीं पूछता। बिना पानी वालों के बीच से तो उसे दुम दबाकर भागना ही पड़ता है,  क्योकि उसके पास तो सिर्फ पानी ही है। परन्तु बिना पानी वाले के पास धन,माया , ऐशो-आराम, कार, बंगला, कोठी क्या-क्या नहीं है! ऊंचे-ऊंचे पद हथिया लेना तो उसके बाँए हाथ का काम है। सात क्या उसे तो चौदह खून माफ है। अब आप ही सोचिये, एक अकेले पानी वाले की औकात ही क्या है? इसलिए हर कोई अपना -अपना पानी उतारने की हौड़ में लगा हुआ है।
 
अब चून के पानी की क्या बात करें, क्योंकि अब चून की जगह तो लोग मैदे की डबल रोटी, पाव भाजी, इडली डोसा, वड़ा पाव, मंचूरियन आदि पता नहीं क्या-क्या खाना पसंद करते हैं। अब घर का चून तो लगभग सुखी या सूखा होता जा रहा है। क्योंकि 'मैं हूँ ना' की तरह 'बाजार है ना’, कौन चून का झंझट पाले और उसके लिए पानी की व्यवस्था करे। पानी कोई फ्री में थोड़े ही मिलता है। चून का क्या है, फ़ेस पेक बनाने के काम आ जाएगा। पानी को तो फ़ेस का पेक उतारने के लिए खर्च करना ही समझदारी का काम है।
पानी के भाव बिकना और उसके बहाव के साथ बहना। पानी देखना, पानी की धार को  देखना, ये सब आधुनिक कलाएं हैं। वो ज़माने हवा हो गए, पानी-पानी हो गए, जब पानी फ्री में मिलता था। लोग-बाग प्याऊ लगवाते, वहाँ ठंण्डे-ठंण्डे पानी के मटके, सुराहियां और उनके बीच में सोभायमान होता या होती ठण्डा पानी पिलाने वाला या वाली तथा मुस्कराकर तांबे के टोंटी लगे झारे से वो प्यासों की प्यास बुझाकर उनकी आॅंखों में तृप्ति के भाव देखता या देखती। रेल या बस के रूकने पर सभी अपनी सामर्थ्यानुसार शीतल पानी लोगों को पिलाकर उनकी दुआओं के पानी से एक अलौकिक सुकून का आनंद अनुभव करते।अब...............प्याऊ की जगह प्लास्टिक के केम्पर हैं। रेल, बस में बैठे हरेक यात्री के पास प्लास्टिक की एक पारदर्शी बोतल है, जिसमें एक या दो लीटर मिनरल वाटर भरा है। अब ये मिनरल है या नहीं, ये तो वाटर भरने वाले ही जानें। पर उस ज़माने में कोई सोच भी नहीं सकता था कि कभी यूं पानी भी खरीदना पड़ेगा।
 
अब तो लोगों का पानी निकालने के लिए पानी पाउच भी उपलब्ध है। किसी ज्ञानी ने ठीक ही कहा था कि तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा।
स्वच्छ पानी के नाम पर करोड़ों की हेराफेरी .............पर कहाँ जाता है पानी? कई बस्तियों के लोग पानी का घन्टों इन्तजार करते हैं। हमारा मन होता है कि उन पानी वाले नेताओं के कान पकड़कर उन बस्तियों में ले जाएं और कहें कि विकास का ढिंढ़ोरा पीटते हो तो ज़रा चुल्लू भर पानी की व्यवस्था कर दो, जिसमें हम डूब मरें क्योंकि आपके तो पानी है नहीं। आप तो इतने बेशर्म हो कि आपको कैसा भी पानी मिले, आपकी सेहत पर तो कोई फर्क पड़ेगा नहीं क्योंकि फर्क तो उसको पड़ता है जिसके पास पानी हो।
और आप देखिए! मानुस के चेहरे का पानी भी सूख रहा है, जिसके कारण उसके चेहरे की स्किन रूखी हो गई है और वह बेचारा/बेचारी अपने चेहरे का पानी लौटाने के लिए पानी बेचकर क्रीम का उपयोग कर रहा है। आखिर चेहरा ही तो उसकी पहचान.....उसकी सुन्दरता ......उसका सब कुछ है।
 
अब जनाब चरित्र की क्या बात करें....चरित्र का पानी तो कब का उतर चुका है। बेईमानों ने किसी को नहीं बक्सा तो एक बेचारे पानी की क्या औकात है। अब इस ज़माने में यदि रहीम जी होते तो कहते-
 
रहिमन पानी बेचिए, बिन बेच्यां सब सून।
पानी राख्यां नीं उबरै, मोती मानुस चून।।

- बसन्ती पवांर
 
रचनाकार परिचय
बसन्ती पवांर

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