जनवरी 2016
अंक - 10 | कुल अंक - 56
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कहानी
कहानी- स्वयं के घेरे
 
 
अर्चिता की कार  चली जा रही थी बाधा रहित हवा से बातें करती, ऐसी ही तो उसकी जिंदगी की गाड़ी भी चल रही थी, हवा में उड़ती मस्त खिलखिलाती,मस्ती से भरी ।उसकी जिंदगी की गाड़ी की स्टीयरिंग उसके वश में थी, वो जिधर चाहती थी गाड़ी उधर ही जाती थी।
मात्र सत्रह साल की ही तो थी जब उसका चयन इन्जीनियरिंग कालेज में हो गया था ,जब  अर्चिता का हैदराबाद की कानफे्िरन्संग मे चयन हो गया तो उसकी  खुशी का ठिकाना न रहा।पर मन ही मन उसे घर से दूर जाने का भय भी सता रहा था। मम्मी पापा से दूर रहने की कल्पना ही उसे रुला रही थी। एक बार तो उसका मन हुआ कि छोड़ दे और अपने शहर के ही किसी कालेज में प्रवेश ले ले । पर क्या करती भविश्य का प्रष्न था । घर से जाते समय वह कितना रोई थी ,तब पापा ने समझाया था ’’ तू तो मेरी बहादुर बेटी है, बेटा जीवन की राह संघर्श से भरी होती है औेर जीवन में सफल होने के लिये ,आगे बढ़ने के लिये साहस करना पडे़गा।‘‘
अर्चिता जब हाॅस्टल के कमरे में पहुंची तो वार्डन ने उसे बताया कि उसका कमरा नम्बर 34 है और उसके साथ  श्रेश्ठा कपूर रहेगी। यह सुन कर अर्चिता का मूड खराब हो गया। कोई कैसे दिन रात किसी अनजान के साथ रह सकता है ?इम्पाॅसिबिल !उसे याद नही कि किस आयु से उसका अपना अलग कमरा है ।वो मम्मा पापा की अकेली बेटी हेै, बचपन से अकेले अपने कमरे में सोती रही है ,उसकी हर चीज अपनी अलग रही है । उसके कमरे में अपना टीवी था जब उसका मन होता,तो जो चैनल मन होता देखती, जब मन होता पढ़ती, देर रात तक मोबाइल पर दोस्तों से बातें करती,वो तो केवल तौलिया लपेट कर ही बाथरुम से आ जाती जिधर मन होता जैसे मन होता कपड़े रखती ऐसे मे किसी और के साथ कैसे रहा जा सकता है । श्रेश्ठा के साथ रहने की सोच कर भी उसे टेंशन हो रहा था । कमरे में जाते समय अर्चिता सोच रही थी कि पता नही कैसी होगी उसकी रूम मेट ं।जब ढूंढते हुए वह कमरा नम्बर 34 में पहुंची तो  श्रेश्ठा अपना सामान लगा रही थी।
अर्चिता ने कहा’’ मैं अर्चिता गिडवानी बैंगालूरु से‘‘ श्रेष्ठा से परिचय हुआ तो कुछ घंटों में दोनो इतनी खुल गयीं मानो वर्शों से जानती हांे ।पर दोस्ती अपनी जगह और साथ रहना अपनी जगह। अर्चिता बिल्कुल ंिबंदास थी, उसे किसी की परवाह नही थी ,जो मन आये करती थी उसको देर तक सोने की आदत थी और श्रेश्ठा सुबह जिम जाती थी। वह पांच बजे ही खटर पटर करके अर्चिता की नींद डिस्टर्ब कर देती। अर्चिता रात में पढ़ना पसंद करती तो श्रेश्ठा को रात में लाइट जलाने पर नींद नही आती । अर्चिता को हर समय लाउड म्यूजिक पसंद था वह कमरे में चलती भी तो संगीत की धुन पर थिरकती हुई और श्रेश्ठा को षांति पसंद थी। रोज ही दोनो का किसी न किसी बात पर झगड़ा हो जाता। किसी तरह दोनों ने एक साल काटा क्योंकि बीच मे कोई परिवर्तन उनके हाॅस्टल के नियमानुकूल नही था ।
     साल समाप्त होते होते अर्चिता ने मम्मी पापा से शिकायत कर करके उनकी नाक में दम कर दिया, अंततः उन्होने उसके रहने के अकेले कमरे के लियेे आवेदन दे दिया ।  एकल कमरा महंगा था तो क्या हुआ लाडली बेटी अर्चिता की कठिनाइयों को देखते हुये मम्मी पापा को अधिक आर्थिक बोझ उठाना ही था।अकेला कमरा ले कर ही अर्चिता को चैन मिला वह अपनी सुविधानुसार जागती सोती पढ़ती ।अपने हिसाब से कमरे में सामान रखती ।
     धीरे धीरे हास्टल का जीवन उसे रास आने लगा था। यहां तो घर से भी जादा स्वतंत्रता थी । फस्र्ट इयर में अर्चिता , मम्मी पापा और घर को जितना मिस करती थी अब वैसा नही था। समीकरण बदलने लगे थे पहले उसका मन हर छुटटी में घर की ओर भागता था ,मम्मी पापा समझाते थे ’’ बेटा इससे तुम्हारा पढ़ाई का नुकसान होगा ‘‘
ंपर दूसरा साल आते आते उल्टा हो गया, मम्मी पापा कहते आ जाओ ,तो उसे हर बार घर न जाने का कोई न कोई बहाना ढूंढना पड़ता । हांलाकि उसका इंतजार कर रहे मम्मी पापा से झूठ बोलना ासे अच्छा नही लगता पर  यहां कालेज में आपस की प्रतियोगिता का सामना करने के लिये बढ़ता पढ़ाई का दबाव और साथ ही नई दुनिया का आकर्शण उसके अपराधबोध को दबा देते।
       यूं ही कब सात सत्र बीत गये पता ही न चला ,कैम्पस चयन के लिये कम्पनियंा आनी षुरु हो गयी थंी ।इस बार तो दीवाली पर भी जाना टल गया ।दीवाली के अगले दिन मम्मी का भावुक सा मेल आया ।उन्होने लिखा था कि ’तुम्हारे बिना बिल्कुल अच्छा नही लगा जैसे ही तुम्हारे इन्टरव्यू का सिलसिला समाप्त हो कुछ दिन के लिये आ जाओ।‘ 
     अर्चिता भी सोच रही थी कि एक बार किसी अच्छी कम्पनी में उसका चयन हो जाये तो कुछ दिनों के किये घर पर आराम करेगी और मम्मी पापा के साथ समय बितायेगी।
  अचर््िाता में  मेधा ,असाधारण व्यक्तित्व ,आत्मविश्वास का संयोग था उस पर से सभी सत्र में उत्कृष्ट अंक भी आये थे।कालेज के सहपाठी, प्रोफेसर सभी का मानना था कि सबसे अच्छा अवसर तो अर्चिता को ही मिलने वाला है। उनका अंदाज गलत न था, अर्चिता का चयन ’लार्सन एण्ड टुब्रो‘ में हो गया था, उसकी प्रसन्नता का ठिकाना न था उसने तुरंत मम्मी पापा को फोन किया।
’’ मम्मी मेरा सेलेक्शन बेस्ट पैकेज देने वाली कम्पनी में हुआ है‘‘,
   यह सुन कर मम्मी की तो  प्रसन्नता के आवेग में आवाज ही रुद्ध हो गई पापा ने गर्व से कहा ’’ बेटा आई एम प्राउड फादर ‘‘ ।
        जब अर्चिता ने बताया कि उसकी कम्पनी की एक ब्रांच बैंगालूरु में भी है तो बेटी को तरसते मम्मी पापा को मानो मन मंागी मुराद मिल गई हो ।उन्होने कहा ’’ बेटा शायद ईश्वर हम पर मेहरबान है तुम बस यहीं की पोस्टिग ले लो ‘‘।
अर्चिता बहुत प्रसन्न थी मम्मी पापा की खुशी देख कर उसे लग रहा था मानों उसने कोई अमूल्य निधि पा ली हो ।अपने छात्र जीवन से विदा ले अर्चिता आज अपने घर वापस आ गई ।
 
 अपनी सफलता की यात्रा के बारे में सोचते सोचते घर का गेट आ गया अर्चिता ने चीं की आवाज के साथ तीव्र गति से दोैडती गाड़ी का ब्रेक दबाया और साथ ही कार के हार्न  चार पांच बार दबाकर मम्मी को घड़बड़ा दिया ।
किचेन से लगभग दौड़ लगाती हुई मम्मी ने झींकते हुए कहा ’’ अरे थोड़ा सब्र करो इतनी दूर आने में समय लगता है, हार्न बजा बजा कर पूरा घर सिर पर उठा लिया ‘‘।
’’अरे मम्मा ये जेट युग है फ़ास्ट लाइफ में ही फ़न है । ‘‘अर्चिता ने मस्ती में कहा और सीधे फस्र्ट गियर से थर्ड गियर ले कर गा़ड़ी झम्म से ला कर पार्क कर दी ।
       पहले दिन जब वह नौकरी के लिये निकलने लगी तो मम्मी ने दही पेड़ा खिलाया ।अर्चिता को मीठा वैसे ही नही पसंद उस पर पेड़ा तो बिल्कुल नही उसने मंुह बनाया तो  मम्मी ने कहा’’ यह शुभ होता है जीवन की इतनी बड़ी शुरुआत करने जा रही हो तो मुह तो मीठा होना ही चाहिये‘‘।
यहां तक तो ठीक था पर जब मम्मी ने रोली का टीका लगा दिया तो अर्चिता अपनी खीज रोक नही पाई ’’क्या मम्मी वेस्टर्न ड्रेस के साथ  आफिस में टीका लगा कर जाएंगे कुछ तो सेाचा करिये ‘‘।
’’पर बेटा यह शुभ है ‘‘।
’’शुभ माई फुट आफिस के कुछ नार्म होते हेैं ,अब टाॅवेल दीजिये तो पोछें ,आल रेडी देर हो गई है ‘‘।
    उसका मूड आफ हो गया।वह पहले दिन मम्मी से ऐसे बोलना  नही चाहती थी पर क्या करे उन्हे भी तो समझना चाहिये कि कारपोरेट के कुछ नाम्र्स होते हैें ।
शाम को जब वह आफिस से लौटी मम्मी को खुश करने के लिये आते ही उनके गले लग गई और बचपन की तरह कान पकड़ कर बोली ’’सॅारी।‘‘
मम्मी हंस पड़ी तनाव दूर हो गया ।
    अचर््िाता सुबह ब्लैक टी पीती थी पर मम्मी को यह बात किसी भी हालत में गले न उतरती कि इस आयु में ही दूध चीनी छांेड़ दे ।इतने दिमागी काम के बाद ़तो सेहत के लिये खाली दूध की चाय पीनी चाहिये।वेा उसके मना करने पर भी रोज दूध की चाय बना देतीं,उसकी एक न सुनतीं।
      उस दिन एक महत्वपूर्ण मीटिंग थी  उसे आफिस में देर हो गई , इस बीच पापा ने कम से कम चार बार फोन किया, उसको कितनी शर्मिंदगी हुई ,पता नही पापा क्यों नही समझते कि वो अब बच्ची नही है । हैदराबाद में तो ज्यादातर वह  आफिस के बाद दोस्तों के साथ काफी पी कर गप्प मार कर आराम से घर आती थी ।यहां तो तुरंत घर भागती है नही तो मम्मी पापा फोन करना शुरु कर देंगे।मीता और सलिल ने तो उसका नाम ही ’मम्मास बेबी‘ रख दिया था । 
     एक  दिन वह अपने कमरे में गाना सुन रही थी कि पापा ने आवाज दी ’’ बेटा तुमसे मिलने कोई मिस्टर रवीश मल्होत्रा आये हेंै।‘
’ओह गॅाड वो तो भूल ही गयी थी कि उसके बॅास ने आज आने को कहा था ‘।उसने पापा से कहा ’’ पापा आप उनको बैठाइये, मैें आती हूं ।‘‘
जब वह आयी तो पापा मिस्टर मल्होत्रा से पूछ रहे थे ’’अच्छा तो आप दिल्ली के हेंै, मैें भी वहीं का हूं, मेरा पुश्तैनी घर चांदनी चैक के पास है ।‘‘
अचर््िाता को पापा का इस तरह उसके बॅास से पर्सनल होना अच्छा नही लगा ।उसने बात को काटते हुये कहा ’’सॅारी सर आप को वेट करना पड़ा।‘‘
’’नही नही इट्स आल राइट‘‘।
’’अरे बेटा मिस्टर मल्होत्रा दिल्ली के ही हेंै‘‘।
अर्चिता बात बदलना चाह रही थी और पापा समझ ही नही रहे थे। वह समझ रही थी कि रवीश पापा की कम्पनी में इजी हो कर बात नही कर पा रहे हेंै ।उसने पापा को इशारा करने की कोशिश की पर पापा समझ ही नहीं पा रहे थे ।
      उस दिन पापा पूरी देर वहंी बैठे रहे, वो क्यों नही समझते कि उनके सामने उसके फ्रेंड्स असहज अनुभव करते है। बाद में जब पापा पर नाराज हुई तो बजाये बात समझने के वो उल्टे उस पर ही नाराज हो गये।कहने लगे ’’ मैने ही तुम्हे सब कुछ सिखाया और आज मैें ही आउट डेटेड हो गया ‘‘?
  पापा तो पापा मम्मी जो सदा ही उसकी बात समझती थी अब उन्हे भी पता नही क्या हो गया है ,मम्मी अभी भी उससे पहले वाली अर्चू की तरह ही व्यवहार करती हैं ,हर बात में बीच में आ जाती हैं । उस दिन वो वह नहा कर निकली तो  मम्मी उसके मोबाइल में मैसेजेस देख रही थीं अर्चिता ने लपक कर मोबाइल छीन लिया और  कहा ’’मम्मा हाउ कैन यू डू दिस?‘‘ तो कहने लगीं ’’अरे मुझसे क्या छिपाना मम्मी हूं तेरी, मंा तो बेटी की दोस्त होती है ।‘‘
 अर्चिता उन्हे कैसे समझााती कि मम्मी मम्मी ही होती हैं एक सीमा के बाद उनसे बातें शेअर नही की जा सकतीं ।आज कल अपनी मित्र मंडली में तो वो लोग गाली दे कर बात करते हैं यही  आज का बिदास स्टाइल है ,अब मम्मी के सामने तो वो सब नही बोल सकते न?
   यहां तो अगर रवीश करण या विशाल से लम्बी बात कर लेती तो वो कहती ’’ बेटा अगर तुम्हे पसंद है तो बताओ मैं उसके घर वालों से बात करूं।‘‘
       अर्चिता कितनी बार उन्हे समझा चुकी थी कि ये सब केवल मित्र हैं ।अब तो पापा भी उसे शादी के लिये पीछे पड़े रहते हैंैे ।एक दिन हद ही हो गई उसने अलमारी खोली तो पाया कि अलमारी किसी ने डिस्टर्ब की है । वह चीख पड़ी,’’ मम्मी आपने मेरी अलमारी छुई है ?‘‘
’’हंा कितनी तो उलझी थी, तुझे तो समय नही मिलता, मैेंने सोचा मैं ही ठीक कर दूं ‘‘‘‘गुस्से में अर्चिता ने पूरी अलमारी उलझा दी।
’’मम्मी मैं अब छोटी बच्ची नही हूं, प्लीज मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो।‘‘
अब उसे अनुभव हो रहा था कि यहां पोस्टिंग ले कर उसने कितनी बड़ी भूल की । जब मीता ने सुना तो उसने उसे अलग घर लेने की सलाह दी और एक दिन मम्मी पापा के हर बात में इन्टरफेयरेंस से परेशान हो कर अर्चिता ने एपार्टमेंट ले ही लिया ।
      मम्मी पापा के लिये यह एक बहुत बड़ा धक्का था । जिस बेटी के लिये उनका पल पल न्योछावर था, वह उसी शहर में अलग घर ले कर रहेगी।जिसमें उनकी एक एक सांस बसती है उसके लिये वो अवांछित हो गये हैं ।यद्यपि घर छोड़ते  समय उनका उतरा चेहरा, अर्चिता को द्रवित कर रहा था पर उसे स्पेस चहिये था अतः उसने अपनी भावनाओं पर ताला लगा कर नये घर में शिफ्ट कर लिया । 
       मम्मी पापा अब जब कभी मिलते  तो उसकेा विवाह के लिये जोर डालते। अर्चिता बिगड़ जाती, एक दिन उसने कह ही दिया ’’ अब मेंै बड़ी हो गई हूं प्लीज मुझे मेरे हिसाब से जीने दीजिये , मैं किसी बंधन में नही बंध सकती, ‘‘। उस दिन के बाद मम्मी पापा ने उसके जीवन के  बारे में बोलना छोड़ दिया, बस कभी कभी उसका हाल पूछ लेते । 
        इधर कुछ दिनों से अर्चिता और मलय की दोस्ती कुछ जादा ही हो गई थी।, अर्चिता ने एक दिन बातों बातों में उससे कहा ’’ मलय तुम्हे नही लगता कि हम लोग एक दिन भी न मिलें तो मिस करते हेंै‘‘
’’ हां आज कल हम लोग एक दूसरे की कम्पनी कुछ जादा ही इन्जाय करने लगे हेंै,पर कहीं तुम हमारे साथ शादी वादी के सपने तो नही देखने लगी हो?‘‘
’’ नो वे ‘‘अर्चिता ने तपाक से कहा।
मलय ने नाटकीय ढंग से सीने पर हाथ रख कर कहा ’’थैंक्स गाड,मैं तो डर गया था कि मेरा शादी का मूड न देख कर तुम मिलना ही छोड़ दोगी‘‘। 
’’कम आन तुमने मुझे वही टे्रडिशनल बोर समझा है क्या? बल्कि मुझे तो डर था कि कहीं तुम शादी का राग न ले बैठो और सपने देखने लगो कि मैं सुबह सुबह आदर्श ं वीबी की तरह चाय ले कर तुम्हे उठाउंगी‘‘।दोनो खिलखिला कर हंस पड़े ।
 
      अन्ततः दोनो  ने बिना बंधन के साथ रहने का निर्णय किया।कितना सुविधाजनक लगता था मलय के साथ रहना, न सास ननद कर झंझट न दूसरे के हिसाब से समझौते की समस्या।दोनो ने रहने के  पहले ही तय कर लिया था कि दोनो एक दूसरे के जीवन में दखल नही देंगे और मलय ने इस शर्त को पूरी तरह ईमानदारी से निभाया था।उनके कमरे अलग अलग थे कोई किसी के कमरे में नही जाता था ।जब दोनो को उनकी स्वाभाविक इच्छा पूर्ति करनी होती पास आते फिर अपना काम, अपना जीवन। एक घर में रह कर भी दोनो अजनबी की तरह रहते । दोनो के कॅामन मित्र आते, तो कभी कभी उनके अपने अपने मित्र भी आते।पर इधर न जाने क्यों कुछ बार से जब मलय की लड़की मित्र आतीं और वो लोग मलय के कमरे में देर तक हंसते खिलखिलाती तो अर्चिता को सहन नही होता।वह चाह कर भी कुछ नही की पाती आखिर उसी ने तो अपनी अपनी स्वतंत्रता,और दूसरे के जीवन में दखल न देने की शर्त रखी थी ।
           न चाहते हुए भी उसका मन एक बंधन में बंधा जा रहा था ,प्यार के बंधन में । पर उसका अहम् यह सच स्वीकार नही करना चाहता था फिर उसी ने तो शर्त रखी थी बड़ी बड़ी बातें की थी निज स्वतंत्रता को ले कर । उसने मलय को प्यार के बंधन में बांधना चाहा पर वह तो उड़ता पंछी था उसे यह स्वीकार नही था।
           इधर मलय की मित्र रागिनी प्रायः आने लगी थी ।उस दिन जब वह रात में भी रुक गई तो बात अर्चिता के लिये असहनीय हो गई वह रागिनी की उपस्थिति में ही बिगड़ गई ।एक बार जो बहस शुरू हुई तो बात इतनी बढ़ी  कि मलय उसी समय अपना सामान ले कर उसे  छोड़ कर चला गया । 
      इस आघात के बाद उसे मम्मी पापा की बहुत याद आयी, मन किया कि उनके पास चली जाये।जब  से वह मलय कि साथ रहने लगी उन लोगों उन लोगो ने उससे नाता ही तोड़ ंिलया था।पर उसे विश्वास है कि वो उन्हे मना लेगी ,पर वो ये भी जानती है कि मम्मी पापा के साथ रहने लगी  तो उनकी रोका टोकी और वर्जनाओं को झेल नही पाएगी उससे तो अकेली ही भली। .......................... 
 वह सो ही रही थी कि  मेाबाइल बज उठा उसने आधी नींद में मोबाइल उठाया, उधर से मनी की आवाज थी ,’’हैप्पी बर्थ डे टू यू......‘‘
यह सुन कर अर्चिता चैंक गई। ‘क्या आज 15 सितम्बर है?‘
उसका कोई रिस्पान्स न पा कर मनी ने कहा’’क्या हुआ तू ठीक तो है न‘‘? ’’
 अर्चिता ने चैंक कर कहा ’’ हां हां थैंक्स ‘‘
’’और बता कहां पार्टी रखी है ?‘‘
’’ पार्टी ?वो क्या बतायें यार, आज मैं आफिस की मीटिंग में ं व्यस्त हूं ।‘‘उसने मनी से तो बहाना बना दिया पर सच तो यह था कि उसे याद ही नही था कि आज 15 सितम्बर यानि कि उसकी बर्थ डे है ,कहां रात के बारह  बजे से ही उसके दोस्तो के फोन का तांता लग जाता था और हंगामा शुरू हो जाता था  ंऔर आज वह इतनी व्यस्त हो गई है कि उसे स्वयं ही याद नही कि उसका बर्थ डे है।सारे मित्र अपनी अपनी दुनिया में व्यस्त हो गये हैं यहां तक कि मम्मी पापा ने भी फोन नही किया। 
      आज वह चालीस  की आयु में कम्पनी की सी ई ओ है , उसके पास नाम है पद है ,सुख सुविधा की सारी चीजें हैं वो सदा ही अपनी बर्थ डे पर शानदार पार्टी देने के लिये जानी जाती है ,पर पता नही क्यों आज उसका पार्टी ,दोस्त, हंगामे का मन नही हुआ। आज उसका आफिस भी जाने का मन नही हुआ उसकेा कहीं  कुछ खोया हुआ सा लग रहा था ।उसने फोन पर अपने आफिस में कुछ निर्देश दिये अपने सारे मोबाइल स्विच आफ किये, बाई को छुट्टी दे दी और बिस्तर में जा  कर लेट गई  ।
  तभी काल बेल बजी, अर्चिता सुन कर भी लेटी रही ,पर जब बेल बजती ही रही तो हार कर खीज कर उठी।उसने दरवाजा खोला तो मम्मी पापा थे ।मम्मी ने आते ही कहा ’’क्या बात है आज तू आफिस नही गई,तझे विश करने के लिये काल किया तो मोबाइल भी आफ था, तबियत ठीक है न?‘ 
 ’’ हां मम्मी सब ठीक है बस आराम का मूड था‘‘,’
’’ भगवान भला करे , मुझे चिन्ता हो गई थी, इस लिये आ गई । वैसे तो तेरी पार्टी वार्टी होगी, तुम लोग कान्टीनेन्टल खाना खाओगे। पर आज तेरा जन्मदिन था, मन नही माना, बचपन में तुझे कचैड़ी और खीर पसंद थी तो बना लाई, अगर इच्छा हो तोे यह भी चख लेना‘‘। फिर कुछ ठहर कर बोलीं ’’बस तेरा मोबाइल नही उठा तो  चिन्ता हो गई थी सो आ गई ,अब तू आराम कर मैं चलती हूं ‘‘।
 मम्मी मुड़ी ही थीं कि अर्चिता के मन ने उसे चेताया ’’ अर्चिता  दूर कर ले अपना अकेलापन ,मम्मी पापा को रेाक ले ‘‘ उसका हाथ आगे बढ़ा ही था कि उसके मस्तिष्क ने घुड़की दी ’’ भूल गई पुराने अनुभव अब क्या तू रह पाएगी उनके साथ ‘‘और उसके स्वयं के घेरे को तोड़ने के लिये बढ़े़े हुए हाथ शिथिल हो गयें। 

- अलका प्रमोद

रचनाकार परिचय
अलका प्रमोद

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कथा-कुसुम (4)