प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जनवरी 2016
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख
प्रसाद दर्शन: नवीन सन्दर्भों में- राहुल देव
 
 
 
शिव के प्रसाद स्वरुप इस महान कवि का जन्म हुआ था और शायद इसीलिए उनका नाम जयशंकर प्रसाद पड़ा | जीवन के प्रथम चरणों में ही अपने प्रणिपल्लवों में लेखनी उठा लेना उसके आगामी विकास का परिचायक है | आज उनकी सार्थकता में किसे संदेह हो सकता है | आठ नौ वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने अमरकोश तथा लघु कौमुदी कंठस्थ कर ली थी | गृह कलह के कारण उनकी शिक्षा छूट गयी थी और वे आठवीं तक ही पढ़ सके | संभवतः विश्व के अधिकांश कलाकारों के साथ यही हुआ है | रवीन्द्र, कालिदास, होमर, दांते, और शेक्सपियर जीवन की पाठशाला में पढ़ते थे |
प्रसाद जी मूलतः चिन्तक हैं और उनके सारे चिंतन के केंद्र बिंदु में मनुष्य का कल्याण है | अपने साहित्य के माध्यम से चाहे उन्होंने राष्ट्रीय जागरण का सन्देश दिया हो, चाहे सामाजिक समस्याओं को सामने लाकर उनके समाधान का प्रयत्न किया हो और चाहे नारी प्रतिष्ठा, आर्थिक समता, मानवीय अस्मिता और सांस्कृतिक समरसता पर अपने विचार व्यक्त किये हों सर्वत्र वे सम्पूर्ण विश्व के लिए एक मानवतावादी भविष्य का स्वप्न ही संजोते रहे और अपनी इस सर्वमंगला एवं सार्वकालिक चिंतन दृष्टि के लिए वे आने वाली अनेक जन्मशतियों तक इसी श्रद्धा से स्मरण किये जाते रहेंगे |
प्रसाद जी का दर्शन मनुष्य की अजेय महत्ता पर आस्था टिकाने वाला दर्शन है- प्रत्येक मनुष्य अपरिमेय शक्ति से संपन्न है | यह शक्ति जीवन और समाज में ‘संरक्षण’ तथा ‘विकास’ के लिए ‘राग’ और तदाधृत ‘करुणा’ के नाम से जानी जाती है | मनुष्य की मनुष्यता ही उसकी शक्ति है | यदि आत्मवादी का कोई ईश्वर और प्राणकर्ता है तो उसकी यही आत्मनिष्ठ आनन्दोच्छालित शक्ति मानवता या मनुष्यता ही उसका मूल धर्म है | इसी की रक्षा से विश्व की रक्षा है, विकास है | ‘देवरथ’ में ग्राहस्थ प्रवृत्ति विरोधी अपनी वासनातृप्ति के लिए विचारों की सृष्टि करने वाले निवृत्तिमार्गी नरपिशाच वज्रमाती स्थविर को डांटती हुई सुजाता कहती है- ‘मैं तो मरूंगी स्थविर, किन्तु तुम्हारा यह काल्पनिक, आडम्बरपूर्ण धर्म भी मरेगा | मनुष्यता का नाश करके कोई भी धर्म खड़ा नही रह सकता |’
अमानवता का भय उपजाकर धर्म नहीं रह सकता | वह शमशान पर भी हरी मुलायम डूब बनकर मृत्यु और ध्वंस की छाती छेदकर उर्ध्वगामी दिशा में अंकुरित होगा | आज जब विज्ञान सभी व्यवधायक भौगोलिक दीवारों को तोड़कर मानव को एक साथ इकट्ठा कर रहा है तब यही शक्ति-महाशक्ति, जीवन के आकाशदीप को अनंत की धारा से जोड़ने वाली शक्ति राग या प्रेम के रूप में समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की स्थापना कर सकती है और विश्वबंधुता के चिरस्वप्न को  साकार कर सकती है | ‘सलीम’ नामक कहानी में प्रसाद ने धर्मोन्मादी सलीम के भी मन में उसके स्वभाव में परिवर्तन लाते हुए कहा है- ‘मनुष्यता का एक पक्ष वह भी है जहाँ वर्ण, धर्म और देश को भूलकर मनुष्य मनुष्य के लिए प्यार करता है |’ सलीम के भीतर की कोमल भावना, शायरों की प्रेम कल्पना चुटकी लेना लगी | वह प्रेम को ‘काफ़िर’ कहता था | प्रेम का शक्तिवादी दर्शन लेकर चलने वाला प्रसाद व्यष्टिसमष्टिवादी महाशक्तियों को, जो कि एक दूसरे को निःशेष करना चाहती हैं- उसमें समन्वय लाने वाला प्रसाद भारतीय पूर्वोक्त दृष्टि संपन्न ‘प्रसाद’ अपनी ‘सलीम’ नामक कहानी में (नंदराम के माध्यम से) कहता है- ‘ओहो हिन्दुस्तानी भाई ! हम लोग हिन्दुस्तान के रहने वालों को हिन्दू सा ही देखते हैं, तुम बुरा न मानना |’
‘इंदु’ की प्रस्तावना में प्रसाद जी कहते हैं- ‘सर्वसाधारण का अक्षय क्रमशः उन्नति और विश्वप्रेम साहित्य का अमृतमय महान फल है और यह सर्वव्यापी प्रेम ही मनुष्य का धर्म और मनुष्य का आदर्श अथवा लक्षण होता है और यही क्रमशः उन्नति और विश्वप्रेम मनुष्य को देवता बनाता है |’
निष्कर्ष यह है की प्रसाद जी के साहित्य में निहित उनका दर्शन शक्तिवादी है और आत्मवादी द्रष्टि से वही ‘राग’ का पर्याय है- वही मानवता मानव के स्वभाव का लक्षण है | उसकी प्रत्यभिज्ञा ही विश्वबंधुता, समता और स्वतंत्रता की सम्यक प्रतिष्ठा करा सकती है | हमारे संविधान का लक्ष्य इसी दृष्टि से चरितार्थ हो सकता है | यही दृष्टि तृतीय विश्व का नेतृत्व कर सकती है | विश्व की दो परस्पर विरोधी शक्तियों को समन्वित कर सकती है | प्रदीप की ज्वाला और वर्तिका राग के स्नेह ही के कारण प्रकाशमय रूप में समन्वित होकर आत्मविसर्जन द्वारा लोक के गंतव्यगामी मार्ग को आलोकित करता है, मानवता की धरा पर चरितार्थ करता है | प्रसाद का साहित्य इस दृष्टि से ध्वंस से संसार को बचाकर सर्जना की शिक्षा देता है और हमेशा-हमेशा के लिए प्रासंगिक हो जाता है | द्वेष राग का प्रतिपक्षी है फलतः ध्वंसात्मक और प्रेम सर्जनात्मक सद्भाव का वाहक |
‘प्रेम-पथिक’ में प्रसाद की संस्कारनिष्ठ सौन्दर्यदृष्टि सभी सुखात्मक-दुखात्मक संवेदनों के माध्यम से जीवन और जगत की महायात्रा के परमलक्ष्य के रूप में एक उदात्त अतीन्द्रिय महाभाव की ओर अग्रसर रही है जिसकी परमपरिणति आनंदवाद है | ‘प्रेम-पथिक’ और ‘एक घूँट’ से ‘कामायनी’ और इरावती तक सृजनयात्रा में भावयोगी प्रसाद की आनंदोन्मुखी विकासयात्रा के अनेक सूत्र बिखरे हुए हैं जिनके द्वारा उनके आनंदवाद की विभिन्न स्थितियों और दिशाओं का बोध संभव है |
प्रसाद की आनंदवादी जीवनदृष्टि की प्रथम झलक ‘प्रेम-पथिक’ में चर्चित उस आनंदभूमि में है जो प्रेमपथ का असीम तथ्य है-
‘इस पथ का उद्देश्य नहीं है श्रांत भवन में टिक रहना,
किन्तु पहुंचना उस सीमा पर जिसके आगे राह नहीं      
अथवा उस आनंदभूमि पर जिसकी सीमा कहीं नहीं !’
 
राग रक्त अरुणोदय सहसा हृदय गगन में संग हुआ
फ़ैल गया उत्साह सदृश अभिनव उज्जवल आलोक वहां
जिसमें प्रेम पथिक अपने आनंदमार्ग पर चल निकला !’
 
जीवन पथ की उजियाली में सजल हरियाली की खोज में आकुल प्रेमलता की अतृप्त लालसा भी इसी आनंद की ‘एक घूँट’ की पिपासा छिपाए है-
‘एक घूँट का प्यासा जीवन
निरख रहा सबको भर लोचन
कौन छिपाए है उसका धन-
कहाँ सजल वह हरियाली है ?’
आनंद प्रसाद की दृष्टि में जीवन का प्राणतत्व है, उसके बिना जीवन, जीवन ही नहीं है | ‘इरावती’ में आनंद! आनंद ! की ध्वनि मुखर करने वाले युवा बलिष्ठ ब्रह्मचारी के सन्देश में प्रसाद की इस आनंदभावना का उदात्त स्वर व्यक्त हुआ है-
“कौन से ऐसे कर्म हैं देवि ! जिन्हें हम आनंद की भावना से भस्म नहीं कर सकते ?”
आज के कुंठाग्रस्त, आतंकग्रस्त और जीवनमूल्यों के कोलाहली संकट के अस्त-व्यस्त युग में श्रेयमूलक प्रेय कर्मचेतना की प्रेरणा देने वाले प्रसाद के लोकमंगलपरक आनंदवादी दर्शन की प्रासंगिकता प्रत्यक्ष है |
प्रसाद ने अपने उपन्यासों में तत्कालीन जीवन के कुछ सीमित पहलुओं का तीव्र रूप में चित्रण किया, तो नाटकों तथा काव्यों में एतिहासिक, पौराणिक प्रसंगों को इस तरह नए रूप देकर उपस्थित किया कि उनके समान्तर सन्दर्भों से प्रेरणा प्राप्त की जा सके | अतः समकालीन परिप्रेक्ष्य में उनको समाज के यथार्थ चित्रकार, इतिहास पुरुषों के प्रसंगों के नए व्याख्याता एवं भारतीय संस्कृति  के प्रतिष्ठापक के रूप में देखा जा सकता है |
‘तितली’ में प्रसाद यह मानते हैं कि- “पश्चिम द्वारा निर्मित शरीर में भारतीय आत्मा की प्रतिष्ठा करनी होगी | इस प्रकार पूर्व और पश्चिम का समन्वय मानवता के नए स्रोत उन्मुख करेगा |”
मानव का उद्देश्य मात्र सामयिक समस्याओं या राष्ट्र की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करना नहीं है, वरन मानवजाति के लिए एक चिरंतन आदर्श जीवन निर्माण का पथ प्रस्तुत करना है | इसी का चरमोत्कर्ष रूप शाश्वत मूल्यों के महाकाव्य ‘’कामायनी’ में मिलता है |
प्रसाद साहित्य का प्रमुख प्रतिपाद्य आत्मपरक आनंदवाद है | इसी विचारधारा को लेकर उन्होंने बौद्धदुःखवाद का बड़े शब्दों में खंडन किया है | उनके ऐसे विचार ‘एक घूँट’ तथा ‘इरावती’ में प्रचुरता से उपलब्ध होते हैं |
प्रसाद की आरंभिक रचनाओं के संकलन ‘चित्राधार’ में ही आत्मवाद तथा आनंदवाद के दर्शन हो जाते हैं | ‘कानन-कुसुम’ में आत्मवादी चिंतन का विकास होता है | ‘झरना’ में कवि आत्मा के विकास पर बल देता है | ‘आंसू’ में वे माया की छाया में सत्यता का अनुभव करते हैं |
‘लहर’ में थोड़ी विस्मय एवं विमुग्धता की अनुभूति प्रतिष्ठित हुई है जो ‘कामायनी’ में अपने चरम पर पहुँच गयी है | प्रसाद जी ने उसे शैवदर्शन की पृष्ठभूमि में सुव्यक्त किया है | अंतिम सर्ग को उन्होंने ‘आनंद’ की संज्ञा दी है | प्रसाद जी के नाटकों में भी आत्मवादी जीवनदर्शन की अंतर्धारा प्राप्त होती है | ‘विशाख’ में वे एक साधु के मुख से कहलाते हैं कि आत्मा स्वयं आनंद रूप है | ‘राज्यश्री’ में सुरमा के एक गीतांश का आशय यह है कि जीव आत्मानंद न करके दुःखी होता है | ‘एक घूँट’ की तो रचना ही आनंदवाद की प्रतिष्ठा के लिए की गयी है | इसका नायक स्वयं आनंद ही है | वह कहता है-
“अंतरात्मा के उस प्रसन्न गंभीर उल्लास को इस तरह कदतिथि करना अपराध है |”
‘चन्द्रगुप्त’ में चाणक्य अपने को आनंद के समुद्र में शंतिद्वीप का अधिवासी ब्राह्मण कहता है | इस प्रकार प्रसाद की आनंदमूलक दृष्टि जगती में व्याप्त विषमता के अपावन कलुष को मिटाकर समरसता के पुण्य आलोक की दात्री है | निस्संदेह प्रसाद ने अपने साहित्य में दुःखदग्ध जगत के आनंदपूर्ण व एक अलौकिक स्वर्ग का एकीकरण करके आनंदवाद के रूप में विश्व को एक सर्वमंगलकारी दार्शनिक चिंतन की दृष्टि प्रदान की है |
‘कामायनी’ के रहस्य सर्ग में व्यक्ति की व्यक्तिगत विषमताओं का अनुशीलन करते हुए त्रिपुर के अवतारण के आधार पर समरसता का दार्शनिक विवेचन प्रस्तुत किया गया है | इच्छा, क्रिया और ज्ञान मन की शाश्वत प्रवृत्ति है जो क्रमशः सत्व, तम और रज गुण प्रधान है | सृष्टि के ये तीनों प्रबलतम तथ्य परस्पर विच्छिन्न होकर, एक दूसरे से हटकर वैषम्य की सृष्टि करते हैं | इनकी पृथकता का अपवारण होने पर शाश्वत और नित्यानंद का अभिषेक हो सकता है | अधिकारी और अधिकृत, शासक और शासित के मध्य सामरस्य स्थापित हो जाने पर विश्व में शांति का प्रसार हो सकता है | इस प्रकार प्रसाद की समरसता का प्रयोग आधुनिक असंतुलित जीवन का एक हल है |
विषमता की संकुचित अवस्था से निकलकर जीव समरसता की स्वतंत्रतावस्था को कैसे प्राप्त करे इस समस्या का समाधान प्रसाद ने ‘कामायनी’ में बड़े सुन्दर ढंग से किया है | प्रसाद का दर्शन केवल आध्यात्मिक दर्शन नहीं, वह व्यवहारिक भी है | उसके व्यवहारिक होने का कारण है उसमें वर्तमान युग की सामाजिक भावनाओं का ग्रहण और समर्थन |
प्रसाद जगत और ब्रह्म में अभेद देखते हैं पर अन्य दर्शन प्रकृति, पुरुष और ब्रह्म में एक बहुत बड़ा व्यवधान स्वीकार करते हैं | इसमें निश्चित है कि प्रसाद पर शैव दर्शन का प्रभाव भी पड़ा है | विश्व में वस्तुतः दो प्रकार के आनंदवादी होते हैं- प्रथम वे जो विकट परिस्थितियों के पड़ने पर तथा अनेक प्रकार की विघ्नबाधाओं के आ पड़ने की स्थिति में भी विश्व में तटस्थ रहकर उसका कल्याण करते हुए अपने मार्ग पर चलते हैं तथा दूसरे वे जो विश्व के प्रति अपना कोई दायित्व न समझकर स्वयं के आनंद में ही लीन रहते हैं |
प्रसाद जी प्रथम प्रकार के आनंदवादी हैं | गीता और मांडूक्योपनिषद के अनुसार श्रद्धावान व्यक्ति ही आत्मा के स्वरुप को पहचानकर आत्मानंद में लीन हो जाता है | इसके सन्दर्भ में प्रसाद का मनु जब तक श्रद्धा के संसर्ग में है, सुखी है परन्तु जैसे ही वह इड़ा के संपर्क में आता है, वैसे ही उसका पराभव होता है | श्रद्धा अर्थात हृदय की भूमिका आनंदप्राप्ति में महत्त्वपूर्ण है | फिर भी कुछ आलोचक इस स्थल पर प्रसाद को बुद्धि का विरोधी मानते हैं और उससे उनका विरोध प्रमाणित करने का प्रयास भी करते हैं | किसी व्यक्ति का हृदय जब तक श्रद्धालु है तो बुद्धि या ज्ञान उसमें स्वयं ही आ जाता है, क्योंकि बुद्धि श्रद्धा की अनुगामिनी है | गीता में कहा भी गया है- “श्रद्धावान लभते ज्ञानं”, मनु जब श्रद्धा को पाकर भी कुछ बुद्धिवादी बने भटक रहे थे तब प्रसाद ने उस समय हुंकार भरते हुए कहा था-
“तुम भूल गये पुरुषत्व मोह में, कुछ सत्ता है नारी की
समरसता सम्बन्ध बनी, अधिकार और अधीकारी की |”
फलतः यह प्रमाणित होता है कि प्रसाद जी बुद्धि के विरोधी नहीं हैं अपितु उसे श्रद्धा को अत्यधिक चमत्कृत करने एवं फलीभूत बनाने के लिए आवश्यक मानते हैं | बुद्धि कभी प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती वरन सहयोग दे सकती है | समरस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम शैवागम में ही हुआ है जिसमें शिव और शक्ति के परस्पर तादात्म्य सम्वैद्य से आस्वाद की भूमिका में समान रूप से अधीष्ठित है अर्थात आनंदवोध के समय दोनों समान हैं | यह समरसता ही भारतीय कला की आधारपीठिका है | प्रसाद ने इसी समरसता की स्थिति को कामायनी में चरम उपलब्धि की भूमिका के रूप में अपनी मान्यता दी है |
प्रसाद जी की कालजयी रचनाएं इस तथ्य का प्रमाण हैं कि वे भारतीय सांस्कृतिक परंपरा द्वारा स्थापित मानवमूल्यों के प्रबल समर्थक थे | प्रसाद जी विज्ञान की प्रगति के भी विरोधी नहीं थे लेकिन वह यह भी जानते थे कि विज्ञान मानव जीवन की सुख-शांति का संवाहक नहीं है, वह भौतिक समस्याएँ हल करा सकता है किन्तु मनुष्य की समस्त समस्याएं हल नहीं कर सकता, उसे जीवन के द्वंदों से मुक्ति नहीं दिला सकता |
आज का युग तनाव का, अलगाव का, संत्रास का, अविश्वास और संदेह का युग है | अहंकारी व्यक्ति विषयों के सुख के पीछे भाग रहा है, जिसका फल है परस्पर ईर्ष्या | सारे मनोवैज्ञानिक जेलसी अथवा ईर्ष्या को मानसिक अशांति का मूल मानते हैं | प्रसाद ने मानव की इसी दुर्बलता पर मनु के माध्यम से कठोर प्रहार किया है | श्रद्धा का स्नेह मनु की ईर्ष्या को शांत करने में सहायक है | मनु अंततः अपने खोखलेपन को स्वीकार करते हैं | श्रद्धा की सार्थकता मनु के इसी हृदयपरिवर्तन से है | यह हिंसा पर अहिंसा की, घृणा पर प्रेम की और अन्याय पर करुणा की जीत है | यही कामायनी और कामायनीकार की मनोवैज्ञानिक सफलता है |
‘कामायनी’ एक पौराणिक कथानक के आधार पर मात्र आनंदवादी दर्शन की प्रतिष्ठा का काव्य नहीं है वरन वास्तव में कामायनी की कथा सामंती व्यवस्था के विनाश, पूंजीवादी व्यवस्था के अविचार, व्यक्ति की अहंजन्य लिप्सा और जनतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए होने वाले संघर्ष की महागाथा है | असल में हमारे रसवादी, भाववादी आलोचकों ने ‘कामायनी’ के काव्य का आध्यात्मिक सरलीकरण कर उसे प्रत्यभिज्ञा दर्शन की अभिव्यक्ति का एक मनोवैज्ञानिक काव्य बनाकर रख दिया | पहली बार मुक्तिबोध ने ही जोर देकर कहा कि मनु न तो मात्र मन के प्रतीक हैं, न मानवमात्र का, मनु तो उस वर्ग के मनुष्य का प्रतिनिधि है जिसका शासन, सत्ता और ऐश्वर्य छिन गया है |
वस्तुतः प्रसाद साहित्य समग्र रूप में प्राणिमात्र की एकता का अमृतकलश है | उसकी एकता का मूलसिद्धांत है- सर्वत्र शुद्ध चेतन की व्यापक सत्ता | यह अद्वैत प्रतिष्ठा सर्वत्र भेदभाव की नाशक एवं समस्त सदाचारों की नींव है | वास्तव में किसी भी साहित्यकार के कृतित्व की प्रासंगिकता को पूर्णरूप से तभी जांचा जा सकता है जब हम वर्तमान ही नहीं, उसके अतीत के सन्दर्भों को भी देखें | ‘अतीत की वर्तमानता’ ही प्रासंगिकता की मूलप्रेरणा या धारणा है | प्रसाद सामाजिक दृष्टि से प्रवृत्तिवादी, साहित्यिक दृष्टि से रसवादी और दार्शनिक दृष्टि से आनंदवादी हैं | उनकी जीवनदृष्टि में तीनों का समाहार है | उनकी सौन्दर्यदृष्टि कोमल और उदात्त है-
“एक से एक मनोहर दृश्य, प्रकृति की क्रीड़ा के सब छन्द,
सृष्टि में सबकुछ है अभिराम, सभी में है उन्नति या ह्रास
बना लो अपना हृदय प्रशांत, तनिक तब देखो वह सौन्दर्य !”
जयशंकर प्रसाद पर नवीन दृष्टि से पुनर्विचार और उनके नाटकों पर निरंतर नए-नए प्रयोगों की अपेक्षा है | संवाद, समीक्षा और प्रदर्शनों द्वारा विषय और कला दोनों दृष्टि से प्रसाद के प्रत्येक नाटक पर विस्तार से विचार और रंगकार्य होना चाहिए | प्रसाद के ही नाटक इस सच्चाई के प्रमाण हैं कि हमारे विश्वविद्यालयों में नाटकों के अध्यापन और रंगमंच का कोई सम्बन्ध नहीं है | सबसे पहले तो प्रसाद को इस अवांछित समकालीन संकट से उबरने देना चाहिए | साहित्य और रंगमंच दोनों ही यह क्यों नहीं मानते कि प्रसाद एक चुनौती हैं और चेतावनी भी ?
प्रसाद साहित्य की प्रासंगिकता पर विचार करने से पूर्व हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अमर साहित्य सदैव प्रबुद्ध पाठकों की वस्तु रहा है | वस्तुतः काव्य या साहित्य का अधिकारी प्रबुद्ध पाठक वर्ग ही हो सकता है | अन्यथा काव्य को अतिसाधारणकता के स्तर पर उतरना होगा | जिस प्रकार ताजमहल या गुलाब की भौतिक उपयोगिता नहीं है लेकिन सहृदयों के लिए ये मूल्यवान है, उसी प्रकार प्रसाद साहित्य प्रबुद्ध एवं सुधी पाठकों के लिए प्रणीत हुआ है | वह मानव को आस्थावान एवं संस्कार संपन्न बनाता है और कला की साधना में लीन करता है लेकिन पाठक का सुपात्र होना आवश्यक है साधारण पाठक को यहाँ कुछ भी प्राप्त नहीं होता |
सबसे बड़ी बात तो यह है कि प्रसाद जी ने मानवमूल्यों की तलाश भारतीय चिंतन, इतिहास और साहित्य के बीच से की है; जो हिन्दू जाति मात्र का चिंतन न होकर समूची मानवजाति का चिंतन है | प्रसाद जी की और जो सबसे बड़ी विशेषता है वह यह है कि उन्होंने प्राचीनता के नाम पर घास-फूस इकट्ठा नहीं किया | उन्होंने रुढ़ियों, धर्म-बाह्यचारिता, अभिजात्यवादी मनोवृत्तियों और भेदवादी विचारधारा की जमकर आलोचना की | जहाँ करुणा, दया, क्षमा और अहिंसा की ज़रूरत है वहां उन्होंने बौद्ध दर्शन की आवश्यकता पर बल दिया और जहाँ अन्याय, अनीति, अत्याचार, शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाने की बात आयी वहां उन्होंने भारतीय दर्शन- कर्मवाद की जरुरत बतलायी |
प्रसाद प्रकृति, प्रेम और अंतर्वेदना की राहों पर चलते हुए जीवनदर्शन की खोज में तल्लीन रहे | ‘आंसू’ कृति में वैयक्तिक वेदना के साथ-साथ वे विश्व में करुणा को प्रसारित और स्थापित करना चाहते हैं | वे दुःख के स्थान पर अखंडआनंद को स्थापित करने का स्वप्न बार-बार संवारते रहे और कामायनी तक आते-आते कवि चेतनता की ओर अखंड आनंद की प्रतिष्ठा कर देता है | किसी भी काल और परिवेश में आनंद की स्थापना का यह सन्देश सार्थक भी है और उपादेय भी | प्रसाद जी इसी लक्ष्य के लिए एक महान साधक की तरह जुटे रहे | उनकी यह धारणा एक ऐसा सन्देश है जिसे प्राप्त कर कोई भी मनुष्य अपने जीवन को सार्थक बना सकता है |
आज के सन्दर्भ में प्रसाद जी उपादेयता प्रमाणित करने के लिए आप केवल उनकी एक कृति ‘कंकाल’ को ही ले लीजिये | इसमें सामाजिक विकृतियों, दंभों, पाखंडों, दलित वर्ग की समस्याओं और नारी की विवशताओं का जो चित्रण किया और उनका समाधान उपस्थित किये, वे आज भी हमारे सहायक हैं | अपनी निकटता के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि प्रसाद जी स्वयं मानवीय मूल्यों की प्रतिमूर्ति थे, अपने व्यवहार और आचार में भी | मानवतावादी तथा आनंदवादी उनका जीवनदर्शन है | भौतिक मूल्यों में मानव का आत्मसमर्पण, आत्मनिर्वासन और आत्मविसर्जन प्रसाद जी को बहुत वेदना देता था और साथ-साथ में कष्ट देतीं थीं मानव की भ्रांत अनुभूतियाँ, संवेदनाएं और रुग्ण मानसिकताएं इसीलिए उन्होंने विखंडित मानव को समन्वयवादी मानव और आनंदवादी मानव का सन्देश दिया और उसकी संकुचित श्रेयमूलक चेतना के स्थान पर श्रेयप्रेय मूलक चेतना को जगाया इसीलिए सूत्र रूप में हम कह सकते हैं कि प्रसाद तर्कपुरुष नहीं, प्रज्ञा पुरुष थे |
प्रसाद जी का साहित्य माँ वीणापाणि का का अनुपम प्रसाद है जिसे पाकर हृदय, मेधा और आत्मा सभी तृप्त हो जाते हैं | साहित्य के उस महासागर में आनंद और शांति की अथाह और अछोर जलराशि है | वह उस चाबी का गुच्छा है जिसमे आज की समस्याओं के समाधानरुपी चाबियाँ हैं | वह युग समाधान है |
वस्तुतः साहित्य की प्रासंगिकता का एक ही अर्थ होता है- बदलते हुए सामयिक सन्दर्भों में रचना से जुड़े हुए चिंतन की समीचीनता | प्रसाद जी का साहित्य प्रलय प्रवाह के मध्य हिमगिरि के उत्तुंग शिखर से किया गया अखंडनाद का शंखनाद है | वह मानवता के मंगल का महायज्ञ है, जिसका अक्षर-अक्षर मानवीय अस्मिता एवं आस्था की अक्षय आहुति है | उनका साहित्य शब्दकोष नहीं अर्थ का अविनाशी अमृतकलश है | उसका वर्ण-वर्ण रत्नाकर, पंक्ति-पंक्ति प्रभायन और छन्द-छन्द ब्रह्मानंद है | वह चिंतन का चन्दनवन, संवेदना का सावनघन और वाणी का अलंकरण है | अतः उसकी प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाना सर्वथा अप्रासंगिक है |
 
 
 
 
 
 
संदर्भ ग्रन्थ-
1- प्रसाद ग्रंथावली
2- कामायनी: एक पुनर्विचार (मुक्तिबोध)
3- मधुमती का प्रसाद विशेषांक (1989)
4- अखिल भारतीय विचार संगोष्ठी का प्रसाद परिशिष्ट (90)
5- काव्य- चित्राधार, कानन-कुसुम, महाराणा का महत्त्व, प्रेमपथिक, झरना, आंसू, लहर, कामायनी,
6- नाटक- करुणालय, राज्यश्री, विशाख, अजातशत्रु, कामना, एक घूँट, जन्मेजय का नागयज्ञ, चन्द्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, स्कन्दगुप्त, विक्रमादित्य
7- कहानी- छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आंधी, इंद्रजाल
8- उपन्यास- कंकाल, तितली और इरावती
9- निबंध- काव्य और कला तथा अन्य निबंध |

- राहुल देव
 
रचनाकार परिचय
राहुल देव

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