प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2015
अंक -37

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

"साहित्य अब संकरी घाटी नहीं, एक विस्तृत मैदान है" - आशा पाण्डे ओझा (भाग-2)
 
 
 
प्रीति 'अज्ञात'- आप अपने पिता के बहुत करीब थीं और उन्हें अपना आदर्श भी मानती है, उनके व्यक्तित्व का आपके ऊपर कितना प्रभाव पड़ा और कैसे ?
आशा पाण्डे - वैसे तो मैं हर उस इंसान को अपना प्रेरणास्त्रोत मानती हूँ जिसमें जोश है, ज़ज्बा है, जूनून है ,जिद्द है ,ईमानदारी है उसूल हैं या जिससे मैंने अंशमात्र भी कुछ सीखा है,पर मेरे पिता बचपन से मेरे प्रेरणास्त्रोत रहे है और दिल के भी बहुत करीब भी। हमारे पापा, माँ के होते हुए भी माँ से भी ज्यादा हमारे प्रति माँ और पापा दोनों की भूमिका निभाते रहे। हर अच्छाई बुराई पर ध्यान देते, बुरा भला समझाते ! हमें कैसे उठना चाहिए ,बैठना चाहिए, बोलना चाहिए, हमारी स्कूल यूनिफार्म साफ़ सुथरी है या नहीं ? बैग व्यवस्थित हैं कि नहीं ? होमवर्क किया कि नहीं ? सब पापा ही देखते ! उस ज़माने में जब यह सब काम पुरुषों का करना बड़ा ही हीन दृष्टि से देखा जाता था पापा ने बिना हिचक किया ! पापा अच्छे कुक भी थे, सारी मनपसंद चीजें बना कर खिलाते .. पापा ने हम सात बहनों से कभी एक बार भी यह नहीं कहा इतनी बेटियां क्यों है ? पूरे गाँव में सबसे ज्यादा अच्छा हमें रखा गया, अपने सामर्थ्य से ज्यादा हमें सुख सुविधा देने की कोशिश की ! पापा बहुत दयालु पर हमेशा से ही बहुत अनुसशासन व उसूल पसंद रहे है। उनके दिए संस्कार ही मुझे जीवन पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं । बचपन से ही उन्होंने हम बहनों को अपने दवा के व्यवसाय से भी जोड़ा ताकि हम कुछ सीख पायें । उस ज़माने में जब लड़की का जन्मना भी बोझ व अपराध समझा जाता था लड़कियों को भेड़बकरी से ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता था ,पढाया लिखाया नहीं जाता था तब पापा हमारे प्रति बहुत प्रवाह ,सार संभाल,व प्रेम से भरे थे।  अपने मोटर साइकिल व स्कूटर की चाबी मुझे दे देते थे, जब लड़कियां घर से बाहर नहीं निकल पाती थी ,  मेरे बॉय कट बाल रखते जब लड़कियों को छोटी गूंथना अनिवार्य था ! जींस पहनाते, जब लड़कियां घाघरे ओढने में लिपटी रहती, इसके लिए उन्होंने अपने बुजुर्गों का, अपने रिश्तेदारों का,अपने समाज का विरोध भी सहा। पर कभी हारे नहीं, हर काम में हमें आगे कर देते। कभी अविश्वास नहीं दिखाया !आठवीं कक्षा से तो मैं स्कूल के पहले व बाद दोनों टाइम नियमित दो -दो घंटा दुकान  पर जाकर पापा का हाथ बांटती थी उनके साथ रह कर बहुत कुछ सीखा। सबसे बड़ी सीख ली उनसे विपरीत परिस्थितियों में भी कभी घबराना नहीं व उसूलों पर अडिग रहना, ऊपर से बहुत कठोर दिखने वाले पापा बहुत नर्म दिल थे, बिलकुल नारियल की तरह, वही हर पग पर मेरा आदर्श हैं मेरी प्रेरणा हैं ।
 
प्रीति 'अज्ञात'- सचमुच आपके पिता बेहद उम्दा व्यक्तित्व के स्वामी थे, आज भी हमारे समाज को ऐसे पुरुषों की, ऐसी सोच की अत्यंत आवश्यकता है। परिवर्तन की शुरुआत घर से ही होती है, आपके पिताश्री इसका एक बेहतरीन उदाहरण हैं ! पत्रिका परिवार उन्हें शत-शत नमन करता है ! 
आशा पाण्डे - धन्यवाद प्रीति जी ! पिता से जुड़ा हर पल संस्मरण है, कभी लिखूंगी उनकी बायोग्राफी ...मेरे दिल के बहुत करीब...अति करीब थे पिता .. पिछले पांच सात सालों
में मैं उनकी मां बन गई वो मेरे बच्चे .. ।पूछते थे तूं मेरी माँ है क्या ? मैं कहती, हाँ  पापा मैं आपकी मां हूँ अब। लेकिन एक दिन अचानक पापा चले गए ब्रेन हेमरेज के बाद 13 दिन हस्पताल में भर्ती पापा का पल-पल जाना देखा, अपने से हाथ छुड़ाना देखा .. उन दुखद पलों की कटु स्मृतियाँ अंतर को झकझोर देती है उनके जाने के बाद फिर सात आठ माह लेखन छोड़ा ..हँसना ..गाना ,गुनगुनाना सब छूटा , पर वक़्त का मल्हम  बड़े सा बड़ा घाव भर देता है।  घाव भरा तो नहीं पर मैंने उस पर एक परत व्यस्तता की चढ़ा ली सिर्फ पापा की आत्मा की शांति के लिए ।
 
प्रीति 'अज्ञात'-.आप पहले से ही सामाजिक कार्यकर्ता हैं।  इसके अतिरिक्त आप और किस तरह से योगदान करना चाहती हैं ?
आशा पाण्डे - देश और समाज के लिए अपनी सामर्थ्य से जितना योगदान कर सकती हूँ उतना जरुर करुँगी। उसके लिए निजता कभी आड़े नहीं आएगी पर देश, समाज से ऊपर उठकर मानवता के लिए सोचती हूँ। उसी के लिए हरदम तत्पर हूँ। जहाँ मानवता को बचा सकूं। देश ,समाज ,जाति,धर्म की सीमाओं से ऊपर उठकर मानवता प्रथम उद्देश्य .. फिर देश।

प्रीति 'अज्ञात'- आज का युवा-वर्ग के कहीं प्रगतिवादी और नई सोच का दिखता है तो कभी उनकी हरकतों से ह्रदय शर्मसार हो उठता है ! आप उनके लिए क्या सन्देश देना चाहेंगीं ?
आशा पाण्डे - आज के युवा वर्ग के लिए बहुत सी बातें हैं जो बेबाक कहना चाहूंगी। सबसे पहले कि वे किसी भी समाज से हों पर कट्टरता का त्याग करे। धर्म, क्षेत्र ,समाज के दायरों से बाहर निकलें। देश हित की सोचें, मानव कल्याण की सोचे और भारत के उन संस्कारों को सहेजे जिसकी वजह से पूरा विश्व भारत की तरफ आकर्षित होता आया है ,वो है स्त्री अस्मिता की रक्षा ,स्नेह, भाईचारा, मर्यादित आचरण .. जिसका इन दिनों लोप सा हो रहा है।
 
प्रीति 'अज्ञात'- देश में हिन्दी साहित्य के हालातों को लेकर आप कितनी आशान्वित हैं ?
आशा पाण्डे - हिंदी साहित्य के, बहुत सारी गुट बाजियों ,खेमों में बंटे होने  के बावजूद भी कहूँगी कि  हालात बहुत सुधर गए हैं। आज  साहित्य लेखन किसी की बपौती नहीं रहा, अब हर वह शख्स लिख सकता है ,जिसमे लिखने का हुनर है .. हर वो रचनाकार छप सकता है जो अच्छा लिखता है।
लेखन सीमाओं से मुक्त हुआ है। साहित्य अब संकरी घाटी नहीं, एक विस्तृत मैदान है जहाँ हर रोज़ नई प्रतिभाओं का मेला लगा रहा है मेले में आप अपनी क्षमता का प्रदर्शन कीजिये आपकी प्रतिभा स्वीकारी जायेगी। नई पीढ़ी तेजी से उभर कर सामने आ रही  है साहित्य  गाँव क़स्बा शहर ,जांतपांत क्षेत्र से भी मुक्त होकर बिना भेद भाव के एक स्तर पर खड़ा है। आज हर लेखक को  उनके अनुरूप मंच उपलब्ध हैं हिंदी में आज बहुत लेखन हो रहा है। गैर हिंदी भाषी राज्य भी हिंदी समझने लिखने पढने लगे हैं राष्ट्रभाषा के गौरव को समृद्ध करने ,पहचान दिलाने में सब एकजुट से नजर आने लगे हैं हालांकि राष्ट्रभाषा को राष्ट्रभाषा घोषित किये जाने के पीछे उस भाषा का साहित्य नहीं बल्कि यह देखा जाता है कि उस भाषा को कितने विशाल स्तर पर जन मानस द्वारा बोला, लिखा पढ़ा व समझा जाता है,परन्तु उस भाषा को विकसित व लोकप्रिय बनाने में साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उस दृष्टि से भी मैं आशान्वित हूँ !
 
प्रीति 'अज्ञात'- हमारी पत्रिका 'हस्ताक्षर' के लिए कोई सन्देश !
आशा पाण्डे - आप सब युवा पीढ़ी, 'हस्ताक्षर' सेजुड़े हो ! आपसे बहुत सारी उम्मीदें है, संभावनाएं हैं, आप साहित्य का भविष्य हो, आप लोगों की मेहनत, लगन व सोच आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बने ,ऐसे काम करना ! साहित्य के आँगन में  बिना किसी भेद भाव गुट बाजी व अखाड़ाबाजी  के उन्मुक्तता ,स्वच्छता से विचरना, इसे पावन बनाये रखना !
 
संक्षिप्त परिचय :-
आशा पाण्डे ओझा
जन्म स्थान: ओसियां( जोधपुर )
शिक्षा : एम .ए (हिंदी साहित्य) ,एल एल .बी
जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय ,जोधपुर (राज .)
प्रकाशित कृतियाँ :
1. दो बूंद समुद्र के नाम  ( काव्य) 2. एक  कोशिश रोशनी की ओर (काव्य )
 3. त्रिसुगंधि (सम्पादन ) 4 ज़र्रे-ज़र्रे में वो है (नज़्म ) 5 वक़्त की शाख से ( काव्य)
शीघ्र प्रकाश्य:
1.  वजूद की तलाश (संपादन ) 2.  पांखी (हाइकु  संग्रह )
 
देश की विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं व इ पत्रिकाओं  में कविताएं ,मुक्तक ,ग़ज़ल
,क़तआत ,दोहा,हाइकु,कहानी , व्यंग समीक्षा ,आलेख ,निंबंध ,शोधपत्र , समीक्षा निरंतर
प्रकाशित

सम्मान -पुरस्कार  :- कवि  तेज पुरस्कार जैसलमेर ,राजकुमारी  रत्नावती
पुरस्कार  जैसलमेर ,महाराजा कृष्णचन्द्र जैन स्मृति सम्मान एवं पुरस्कार
पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी शिलांग (मेघालय ) साहित्य साधना समिति पाली एवं
राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर द्वारा अभिनंदन ,वीर दुर्गादास राठौड़
साहित्य सम्मान जोधपुर ,पांचवे अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विकास सम्मलेन
ताशकंद में सहभागिता एवं सृजन श्री सम्मान,प्रेस मित्र क्लब बीकानेर
राजस्थान द्वारा अभिनंदन ,
मारवाड़ी युवा मंच श्रीगंगानगर राजस्थान द्वारा अभिनंदन , संत कवि
सुंदरदास राष्ट्रीय सम्मान समारोह समिति  भीलवाड़ा राजस्थान  द्वारा
साहित्य श्री सम्मान ,सरस्वती सिंह स्मृति सम्मान पूर्वोत्तर हिंदी
अकादमी शिलांग मेघालय ,अंतराष्ट्रीय साहित्यकला मंच मुरादाबाद के
सत्ताईसवें अंतराष्ट्रीय हिंदी विकास सम्मलेन काठमांडू नेपाल में
सहभागिता एवं हरिशंकर पाण्डेय साहित्य भूषण सम्मान ,राजस्थान साहित्यकार
परिषद कांकरोली राजस्थान  द्वारा अभिनंदन ,श्री नर्मदेश्वर सन्यास आश्रम
परमार्थ ट्रस्ट एवं सर्व धर्म मैत्री संघ अजमेर राजस्थान के संयुक्त
तत्वावधान में अभी अभिनंदन ,राष्ट्रीय साहित्य कला एवं संस्कृति परिषद्
हल्दीघाटी द्वारा काव्य शिरोमणि सम्मान ,राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर
एवं साहित्य साधना समिति पाली राजस्थान   द्वारा पुन: सितम्बर २०१३ में
अभिनंदन सलिला संस्था सलुम्बर द्वारा  सलिला साहित्य रत्न  सम्मान 2014

 संपर्क : 07597199995 
E mail I D [email protected]
ब्लॉग ashapandeyojha.blogspot.com

 


- प्रीति अज्ञात
 
रचनाकार परिचय
प्रीति अज्ञात

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