प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर-दिसम्बर 2015 (संयुक्तांक)
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत
हठीला मन
 
दर्द मिला है, पर न माने, कैसा पागलपन है।
फिर से प्यार के सपने देखे, बड़ा हठीला मन है।।
 
सुधियों की घनघोर घटाएँ अन्तस पर छाती हैं,
उमड़-घुमड़कर बार-बार फिर नयनों तक आती हैं।
वो क्या जाने इन नयनों में रहता इक सावन है।
फिर से प्यार के सपने देखे,  बड़ा हठीला मन है।।
 
वह मेरे मन की राधा थी, मैं उसका मोहन था,
मोरपंख, माखन, मुरली सा रिश्ता वह पावन था।
कहाँ खो गई राधा, ढूँढ़े मन का वृन्दावन है।
फिर से प्यार के सपने देखे, बड़ा हठीला मन है।।
 
कैसे उसको हम बतलाएँ कितना प्यार किया है?
अपने जीवन का हर एक क्षण उसके लिए जिया है।
मेरे दिल में आज भी उसके दिल की ही धड़कन है।
फिर से प्यार के सपने देखे, बड़ा हठीला मन है।।
 
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 बंजारे- सा जीवन
 
बंजारे- सा जीवन अपना।
चलते रहना, चलते रहना।।
 
कस्बे-नगर, गली-चौबारे,
पाँव न थमते कहीं हमारे।
मंज़िल तो है केवल सपना।
चलते रहना, चलते रहना।।
 
कोई न अपना और पराया,
हमको बाँध सके न माया।।
सुख-दुख मिथ्या, मात्र वंचना।
चलते रहना, चलते रहना।।
 
सर्दी-गर्मी हो या वर्षा,
अपना मन हर हाल में हर्षा।।
धूप-छाँव-हिम-आतप सहना।
चलते रहना, चलते रहना।।
 
फूल मिले या शूल भरें हों,
राह में कष्ट भले बिखरें हों।।
सीखा हमने सबकुछ सहना।
चलते रहना, चलते रहना।।
 
दिल रोया, सपने टूटे हैं,
मधुघट नित हमसे छूटे हैं।।
मन की व्यथा कभी न कहना।
चलते रहना, चलते रहना।।
 
क्या खोया क्या पाया हमने,
शोक न हर्ष मनाया हमने।।
जो आया है, उसे गुज़रना।
चलते रहना, चलते रहना।।

- डॉ. लवलेश दत्त
 
रचनाकार परिचय
डॉ. लवलेश दत्त

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