प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर-दिसम्बर 2015 (संयुक्तांक)
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आदिवासी कहानी- भरत की माँ
टापरे का एक कमरा। रहने वाले चार प्राणी। टापरे के बरामदे में चूल्हा। लकडी जलाने से उलझती रहती माँ। पास ही खाट पर बैठकर मोबाईल चलाता बेटा। हमेशा उसमें ही लगा रहता। माँ के कुछ पुछने पर हाँ, हूॅ करता। काम पर जाता और मोबाईल चार्ज करवाकर आता। बहन की पढाई पर कभी -कभार ही ध्यान देता। पिता का रोज शराब पीकर आना। गालियां देना। कई बार माँ को पीटना। बहिन पर हाथ उठाना। खा कर सो जाना। यही है मां का संसार।
 
एक दिन माँ चुपचाप आकर भरत के पीछे खड़ी हो गई। भरत मोबाईल पर ट्विटर चला रहा था। अंग्रेज़ी में कुछ टाईप कर रहा था। अनपढ़ माँ को कुछ समझ में नहीं आया। भरत ने उसको देख लिया। माँ ने पूछा "बेटा, ये क्या लिखता रहता है मोबाईल में?" भरत ने हाथ पकड़कर माँ को खाट पर बैठा दिया। मोबाईल बंद कर बोला, "माँ तू तो जानती ही है कि हमारी जमीन पर चल रही है वह फेक्टरी जहां में काम करता हूॅ। सरकार ने बहुत कम मुआवजा देकर हमसे छीन ली थी और वहां से विस्थापित होकर हम यहाँ आए। पिताजी के पास कुछ काम नहीं रहा तो वे शहर जाकर मजदूरी करते हैं, जो मिलता है उससे तुमने बरसों यह गृहस्थी चलाई। पिताजी की मार सहन की। वे पहले ऐसे नहीं थे लेकिन जमीन अधिग्रहण से टूट गए। माँ यहाँ लाईट नहीं है जबकि हमारी पहले वाली जमीन पर ही बिजली बनती है। हमारी जमीन ले ली सरकार ने लेकिन हमें पीने का पानी तक नहीं दिया।"
 
भरत कुछ देर रूका फिर बोला, "माँ सरकार फिर एक कानून लाई, जिसमें किसान की जमीन लेने पर 4 गुना मुआवजा था, किसानों की 80 फीसदी सहमति जरूरी थी, वहीँ किसानों की सामाजिक स्थिति का अध्ययन भी था लेकिन अब मोदी सरकार ने इसमें से भी कुछ बातें समाप्त कर दी हैं या कमजोर कर दी हैं सिर्फ किसानों की जमीन लेने के लिए। वे यह जमीनें पूँजीपतियों को देना चाहते हैं। मैं इसके खिलाफ लड़ रहा हॅू।"
 
माँ को समझ में नहीं आया कि यह कैसे लड़ रहा है। ना तो नारे लगा रहा है, ना ही रैली कर रहा है और ना ही धरना। जब पहले जमीन का अधिग्रहण किया था सरकार ने, तो कितनी बार शहर गई थी वह, धरना दिया था, नारे लगाए थे, लाठियाँ चलाई थी पुलिस ने। उसे भी पीटा गया था फिर भी चली गई थी जमीन और अब यह भरत घर बैठे मोबाईल से लड रहा है? मां के आंखों मे प्रश्न देखकर समझ गया भरत, उसने मां के कंधे पर हाथ रखकर कहा, "माँ बदल गई है दुनिया और बदल गया है संघर्ष का तरीका। सरकार को फेसबुक, टिवटर पर लिखकर लाईक करके, रिट्विट करके ही अपनी ताकत बताने लगे हैं हम जैसे लोग। प्रधानमंत्री, मंत्री, अफसर, मीडिया सब के एकाउंट हैं, जहां हम अपनी बात कहते हैं, उनकी पढ़ते हैं। इस तरह देश मे वातावरण बनता है और सरकारें झुकती हैं।"
 
माँ ने प्यार से भरत को देखा। मेरा बेटा कितना होशियार हो गया है। हमारे जैसे किसी को पता भी नहीं और लड रहा है सब के लिए और मैं समझती रही यह टाईम बिगाड़ रहा है। माँ उठी भरत के लिए चाय बनाने लगी। उसे अपने बेटे का नाम सार्थक लगा। कथा में सुना भरत अपनी मां के कहने पर भी अपने भाई का हक देता है। माँ को लगा कि उसका बेटा मेरे जैसी कितनी ही माँ के लिए लड़ रहा है, जिनके दुख का कारण पति के पास कभी काम होना और कभी नहीं होता है और इसीलिए अवसाद मे पति उनसे मारपीट करते हैं। माँ को अपने बेटे पर गर्व हुआं।
उसने बेटे के हाथ मे चाय देते हुए उसके सिर पर हाथ फेरा और प्यार से देखा। भरत को माँ की आंखों के कोने भीगे लगे। उसकी अनपढ़ माँ भी समझ गई थी कि बेटा आधुनिक, प्रगतिशील, समझदार है, अपना नुकसान किए बगैर ही लड़ रहा है।

- भारत दोसी
 
रचनाकार परिचय
भारत दोसी

पत्रिका में आपका योगदान . . .
कथा-कुसुम (3)