प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2015
अंक -49

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

पुरुषों पर क्यूँ नहीं लिखते...!
अभी-अभी सोशल मीडिया के हवाले से ख़बर पढ़ी कि एक बुज़ुर्ग दंपत्ति विदेश में बस रही अपनी संतानों से लम्बे समय तक नहीं मिल पाने का ग़म जीते थे।  सो, उन्होंने अपनी 35 साला शादीशुदा ज़िन्दगी में तलाक़ का विकल्प लाकर उनको हैरत में डाल दिया। बच्चे भी आनन-फानन में आकर कहने लगे, कि जब तक हम घर न आ जाएँ, आप दोनों आगे कुछ भी तय मत करना और वे कल ही अपने माँ-बाप के पास आ रहे हैं। और, इधर वृद्ध पिता खुश होकर अपनी स्त्री को सुनाने लगा कि इस बार हमारी सालगिरह पर दोनों बच्चे घर आ रहे हैं, वो भी अपने खर्च पर! कहने का सार यह है कि प्यार जहाँ से हो, जिसके लिए हो, परिस्थिति से संचालित होता है और जो प्यार, सहिष्णुता घर के सदस्य साथ होकर दे जाते हैं, उनका पर्याय कहीं और बड़ा ही दुष्कर है। बूढ़े माता-पिता ने भी इस कमी को अरसे तक जिया और फिर उम्र, अनुभव और उसूल को ताक पर रख अपनों के संग जीने की इच्छा पैदा की एवं उसके लिये हर सम्भव उपाय भी लगाये।
 
प्यार जताने के लिए कोई भी उपाय कभी ग़लत नहीं होता, जबकि प्यार पाने के मामले में कई शर्तें हो सकती हैं और बहुधा होती ही हैं। हमारे परिवेश में ज़्यादातर प्यार स्त्रियों और विपरीत लिंगियों के केंद्र बिंदु में ही सिमटा रहा है और पूरा ब्रह्माण्ड इसी लक्ष्य की प्राप्ति में तरह-तरह के बहानों से दुनिया को सजाता रहा है। 'प्रेम' हर पहल का प्रथम बिंदु रहा है और उसकी चरम सीमा भी स्वयं प्रेम ही है, बाक़ी सारे निकाय इसके मध्य बस रास्ते ही हैं।
पूरा संसार 'स्त्री- प्रेम' को हर रूप में दर्शाता रहा है। आप किताबों में, स्कूल-कॉलेज में, फिल्मों में, दोस्तों में, समाज में, घर में देख लें; पर इन सबके बीच पुरुषों का नैसर्गिक प्रेम जो उसका पौरुष जनता है, इतना गौण हो गया है कि उसकी चर्चा किसी सन्दर्भ में कहीं मिलती ही नहीं। पुरुषों का यह प्रेम उसके पुरुषार्थ से निकलकर हर उस सन्दर्भ में घुट-घुटकर जीता रहा है, जिससे भी वो कभी या जितनी बार भी जुड़ा। पुरुषों का यह प्रेमभाव 'स्त्री- विमर्श' के खोखले सेमिनार में हमेशा इतना दब्बू और भीरू साबित हुआ कि स्त्री- विमर्श की चर्चाएँ भी ज़ाया ही हुईं।
 
महिलाओं की सहनशीलता और भावुक स्वभाव उनको इस मंच की साम्राज्ञी भले ही बनाता हो, पर क्या कलुषित विचारों और भावों से भरी स्त्रियों से कभी, किसी का साक्षात्कार कहीं नहीं हुआ है? यद्यपि यह ज्वलंत प्रश्न बिल्कुल भी नहीं हो सकता, पर पुरुषों के प्रेम को दोयम दर्ज़े से चिह्नित करना उनके सुप्त और सहृदय प्रेमभाव को कुचलना है और यही कई घरों की जाने-अनजाने तस्वीर बन गई  है।
 
पुरुषों का उच्छृंखल भाव अपने आस-पास की आबो-हवा में घुल-मिलकर भी अपने परिवार की मर्यादा का उल्लंघन होने से रोकता है, क्योंकि यहाँ उसके जीवट भावों का चरम-बिंदु है। पूरी दुनिया में घूम-फिरकर, अंतत: वो यहीं लौटकर आता है, इसे उसकी कमज़ोरी कहें या कोई अनंत जुड़ाव कि वो घर के सदस्यों के बीच ही ख़ुद को श्रेष्ठ समझता है और उस मर्यादा के निर्वाह में ख़ुद को स्थापित करता रहता है। 'पौरुष' अगर है, तो यही है, जहाँ वो स्त्री-भाव-सा लज्जा का आवरण त्याग देता है, क्योंकि उसने किसी स्त्री के पास ख़ुद को जी-जीकर ही इसे सीखा है और अपने चरित्र में चस्प किया है।
 
पुरुषार्थ का यह अनंतिम बिंदु है जिसकी रूपरेखा में वो अपना परिवार, समाज और अपनी सभ्यता गढ़ता है और उसमें अपनी क़ाबिलियत साबित करने के लिए हमेशा बहाने ढूँढता है। यह उसका पौरुष है जो साहचर्य की मूक माँग पैदाकर अपना छद्म आवरण गढ़ने की ख़ुशी जीता है और स्त्री-आरोहण की हवाओं में मुस्कराकर साँस लेता है।
हर बात से इतर, एक पुरुष अपना परिवार चाहता है और उसके सदस्यों संग अपनी ज़िन्दगी ख़ुशगवार बनाने में गलत रास्तों से होते हुए भी वहीँ आकर सुकून पाने का वहम जीता है।
 
ढकोसलों के कम्बल में घुटता अगर यही 'पुरुषार्थ' है तो यही सही!

- अमिय प्रसून मल्लिक