नवम्बर-दिसम्बर 2015 (संयुक्तांक)
अंक - 9 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

सुनो, ज़िंदगी!
तो तुमने मेरी डायरी पढ़ ही ली.. 
फ्लेट की तीसरी मंजिल के अँधेरे कमरे में खुली खिड़की के पास खड़ा अधेड़ पुरुष धीरे से बड़बड़ाया.... !
नननss नहीं तो ...सकपकाकर स्त्री स्वर कमरे में गूंजा 
सुधा ..?
इधर आओ..मेरे करीब 
ह्म्म्म्म्म 
सुनो......झूठ बोलकर खुद को मेरी नजरों में मत गिराओ. पुरुष ने अपने दोनों हाथों से सुधा का चेहरा अपने चेहरे के और करीब खींचते हुए कहा।
 
मैंने कोई झूठ नहीं बोला आपसे
मुझे पता है....तुम कभी झूठ नहीं बोल सकती मुझसे
कुछ देर रुक कर फिर से पुरुष बोला। 
तो तुम मिल आयी उससें ...??
न्न्न्नहि... हाँ 
हाँ ....मैं गयी थी उससें मिलने (कातर स्वर में सुधा ने कहा) 
कैसी है वो ..??
बीमार है जरा ..खांसी-जुकाम है और बस्स्स्स्स
 
बस्स, क्या?
बस्स्स यही कि, लिखती रहती है ...कुछ-न- कुछ 
कुछ-न- कुछ ..?? जैसे 
जैसे की विरह और मिलन के गीत, कुछ कवितायेँ,कहानियाँ 
और??
और... तुम्हारे बारे में
मेरे बारे में?
क्या वो मेरा नाम लिखती है, अपनी कविताओं में?
नहीं
स्पष्ट तो नहीं पर, मैंने कुछ उनका लिखा पढ़ा तो मुझे लगा कि ये सब तुम्हारे ही बारे में होगा !
ह्म्म्म्म्म ....
 
पर सुनो ....तुम्हे कैसे पता चला कि मैनें तुम्हारी डायरी पढ़ ली?? (इस बार सुधा ने हिम्मत कर के पूछा)
ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह
डायरी में कुछ मिला था तुम्हें? पुरुष ने पूछा। 
कुछ भी तो नहीं! हाँ, तुम्हारी धरोहर मिली थी डेढ़ गज लम्बी...वो लम्बा-सा, काला घना बाल सर का 
और तुमने वो बदल दिया?
नन्नहि तो मैंने नहीं बदला उसे .
तुम फिर झूठ बोलने की कोशिश कर रही हो सुधा .. पुरुष ने सख्ती से कहा। 
हाँ ..... बदल दिया मैंने उसे, पर सौतिया डाह से तो नहीं। 
मैं देख रही थी उसे कि कितना लम्बा बाल है ये, पर आखिरी सिरा पकड़ते- पकड़ते न जाने कैसे खिंच गया वो और टूट गया। मैंने बहुत कोशिश की उसे फिर से जोड़ने की मगर ......
 
हम्म्म्म 
और फिर तुमने बदले में उसके सिर का दूसरा एक बाल रख दिया ...और वो भी उसी शख़्स का जिसका कि ये पहलेवाला वाला बाल था। क्यों सही है न?
हाँ सही है। 
मगर ..आपको कैसे पता चला कि ये बाल उसी शख़्स का है?
तुमने नहीं देखा? इस बाल का अंतिम छोर मेहँदी लगने के कारण कुछ लाल था !
ओह्ह्ह .......
सुधा की मोटी-मोटी कजरारी आँखों में अब सावन बरसने लगा था। आखिर स्त्री थी, कैसे बर्दाश्त होता। कहीं-न-कहीं मन का कोई कोना रो रहा था। 
पर ..
'प्रेम' को समझती थी सुधा .....और 'प्रेम के मायने' भी!
 
सुधांशु और सुधा के दोनों बच्चे विवाह के बाद अपनी-अपनी नौकरियों में अलग-अलग शहर में सैटल (व्यवस्थित) हो चुके थे! इन दिनों सुधांशु और सुधा ही घर में अकेले थे। कुछ दिन बाद सुधा ने सुधांशु से अरुणिमा के घर जाने की बात कही।
सुधांशु कुछ न बोला। चुपचाप सुधा के साथ सामान बांधकर अरुणिमा के शहर चला आया। अरुणिमा ने दोनों का तहेदिल से स्वागत किया। अरुणिमा के घर रहते हुए सुधांशु का व्यवहार अजीब-सा होने लगा था। सुधा ने महसूस किया कि सुधांशु अरुणिमा के सामने अक्सर असहज सा हो जाता है। अरुणिमा भी सुधांशु से ज्यादा नहीं बोलती थी। दोनों की चुप्पी का कारण सुधा समझती थी। अक्सर वो सुधांशु को अरुणिमा के कमरे से अरुणिमा की लिखी कविताओं और कहानियों की किताबें लाकर देती जिन्हे देखकर सुधांशु असहज हो जाता था।
 
उस दिन....... करवा चौथ का दिन
सुधा और अरुणिमा नहा कर आँगन में अपने बालों को धुप में सुखा रही थी। सुधा बार बार अरुणिमा के घुठनों तक लटकते लम्बे केशों को देखती और फिर कुछ सोचती। 
क्या देख रही हो? अरुणिमा ने सुधा से पूछा 
कुछ नहीं दीदी ...वो आपके बाल अभी भी इतने ही लम्बे?
ओह्ह्ह, किसी-किसी को ईश्वर कुछ इस तरह से ही अनोखा कुछ दे देता है ...और बदले में ..
कहते कहते अरुणिमा रुक गयी....
सुधा भी बात को अनसुनी कर दुसरी तरफ पलट गयी।
 
देर रात... सुधांशु कुछ मिठाई और फल लेकर घर लौटा। चाँद अभी तक निकला नहीं था। शायद बादलों की ओट में छिप गया था कहीं। सुधा पूजा की थाली लेकर आँगन में कब की आ गयी थी। उसकी अधीरता बढ़ती ही जा रही थी। सुधांशु भी कपडे बदलकर आँगन में आ गया था। पर अरुणिमा का कहीं अता-पता नहीं था। जाने कहाँ चली गयी थी वो!
धीरे-धीरे, अँधेरा गहराने लगा था। सुधांशु और सुधा को भी अरुणिमा की चिंता सताने लगी थी। रह-रहकर सुधांशु के मन में बुरे खयालात आ रहे थे। अरुणिमा अब भी घर न लौटी थी।
 
आखिरकार सुधांशु और सुधा दोनों ही अरुणिमा को ढूंढने घर से निकल पड़े। पास ही के पार्क में पेड़ों की झुरमुट में अरुणिमा चुपचाप खड़ी दिखाई दे गयी। उसके हाथ में जल का भरा एक लोटा था।  शायद वो भी चाँद निकलने के इन्तजार में ही थी। 
दीदी....दीदी ....कहाँ आ गयीं, हमें छोड़ कर। अरे, साथ ही में पूजा कर लेते हम सब। 
चलिए, घर चलिए। हम सब वहीँ से चाँद को देखेंगे।  
अरे,नहीं...तुम लोग चलो..मैं आती हूँ, अभी (सकपकाती हुयी अरुणिमा धीरे से बोली )
अरे नहीं ...आप चलिए तो ...
चलो ना प्लीज ...इस बार सुधांशु ने कहा। 
अरुणिमा, सुधांशु को ना न कर सकी।
 
उस दिन..... आँगन में अरुणिमा और सुधा दोनों ने एक साथ चाँद की पूजा की। एक साथ चाँद को अर्क दिया। 
सुधा ने आगे बढ़कर सुधांशु के पाँव छुए। अरुणिमा चुपचाप खड़ी रही। कश्मकश थी कि वो भागकर अपने कमरे में चली जाये या समय के विधान के आगे सर झुकाये खड़ी रहे। 
इधर सुधांशु ने सुधा को आशीर्वाद देने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया ही था कि सुधा ने उस हाथ को आगे बढ़ने से रोक दिया। सुधांशु कुछ सोचता, उससें पहले सुधा खींचकर उसे आँगन में एक और ले गयी। 
कब तक? यूँ कब तक?
कब तक छिपते रहोगे, अपने आप से तुम..... हैं? 
मैं पूछती हूँ,कब तक? सुधा ने सुधांशु को झंझोड़ते हुए कहा। 
आखिर कब तक, तुम दोनों मौन हो कर एक दूसरे से जवाब मांगते रहोगे?
सुधांशु?
रुंधे गले से सुधा ने सुधांशु से पूछा.....प्यार करते हो ना मुझे?
सुधांशु ने सर हिलाया 
और अरुणिमा को?
बोलो सुधांशु?
बोलो?
सुधा का गला भर्राने लगा था।
 
प्रेम करते हो ..और प्रेम का सम्मान नहीं करते ! कैसे खुदगर्ज हो तुम! 
अरुणिमा को देखो। देखो इसे, इसे इंतज़ार है आज भी अपने प्रेम का!
मुझे तुम्हारे साथ देखकर भी ये संतुष्ट है....ब्याहता नहीं है, पर पूजती है तुमको। 
और तुम .....अपने आप से कब तक भागोगे सुधांशु कब तक?
जिद छोडो सुधांशु ...
थाम लो हाथ अरुणिमा का... तार दो उसे! मुक्ति दे दो उसे, इस श्राप से!
नहीं सुधा नहीं .....
मेरे बेटे...समाज के लोग ...
कोई कुछ नहीं कहेगा तुम्हें ....ये मेरा फैंसला है...एक ब्याहता स्त्री का फैंसला है!
(सुधा के शब्दों में दृढ़ता थी )
रही बात तुम्हारे बेटों की, तो यहाँ आने से पहले अरुणिमा और तुम्हारे बारे में उन्हें सब कुछ बता दिया था मैंने ....
लो ....जाओ ... आज मुक्त हो तुम मेरी तरफ से ....समाज की तरफ से
 
दीदी ...यहाँ आओ ....
सुधांशु ...भर दो मांग अरुणिमा की 
उस रात ....... अरुणिमा के कमरे में अरुणिमा और सुधांशु बरसों बाद एक हो गए थे। 
अरुणिमा, सुधांशु के कंधे पर अपना सर टिकाकर बीते दिनों के ख्यालों में डूबी हुयी गहरी नींद में ना जाने कब की सो गयी थी। 
और सुधा?
एक और जहाँ आत्मसंतुष्ट थी, वहीँ चाह कर भी वह अपने स्त्रीसुलभ रुदन को रोक नहीं पा रही थी। ना जाने क्यूँ?..........सुना तुमने?
 

- मदन सोनी

रचनाकार परिचय
मदन सोनी

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