प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2015
अंक -38

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

समय की दहलीज़ पर... दस्तक !

आज 'अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस' के अवसर पर 'हस्ताक्षर' का प्रवेशांक आप सभी को समर्पित है। यूँ तो हर दिन स्त्री का ही होता है। वो एक ममतामयी माँ बनकर, अपने बच्चों के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर देती है तो भाई की प्यारी बहिना बनकर अपने हिस्से की वस्तु भी उसे वर्षों से देती आयी है। प्रेयसी के रूप में अपने प्रिय के लिए सारी दुनिया से लड़ जाती है और पत्नी बन, अपना पीहर छोड़ एक नए जीवन में बेझिझक प्रवेश कर जाती है। वो सहनशील है तो शक्तिसंपन्न भी, स्नेह का पर्याय है  पर आवश्यकता पड़ने पर मौत से भी जूझ जाती है, स्वाभिमानी है पर अपनों के लिए हमेशा झुकती आयी है, उसे अपने कर्त्तव्यों  का पूरा भान है लेकिन वो अपने अधिकारों के लिए सचेत भी है। 

 
नारी की महत्ता में न जाने कितने ग्रन्थ लिखे गए, इसके हर रूप की चर्चा भी सदियों से होती आयी है। नारी 'सृष्टा' है , जननी है, उसके बिना सब कुछ अपूर्ण, कल्पनातीत है। नारी है तो नर है, ये भी सर्वविदित, सर्वमान्य सत्य है ! लेकिन एक सच यह भी है कि आज के प्रगतिशील समाज में भारतीय नारी जहाँ ऑटो रिक्शा चलाती है, ट्रेन ड्राइवर है, बस-कंडक्टर , दुकानदार, डॉक्टर , इंजीनियर, कलेक्टर, मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति तक पहुँच चुकी है वहीँ आज भी उसका शोषण बदस्तूर जारी है। हर क़दम पर उसे अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ता है। दु:खद ये भी है कि इस लड़ाई की शुरुआत, प्राय: घर से ही होती है।
 
आज की नारी ने जितनी प्रगति की है, उसकी दुर्गति भी उस हिसाब से उतनी ही हुई है। वो आज भी असुरक्षित और अमानुषिक व्यवहार की शिकार है। पुरुषप्रधान समाज के चलते, देश में हो रहे कन्या भ्रूण हत्या जैसे जघन्य अपराध  हमारा सिर शर्म से झुका देते हैं। छेड़छाड़, अपहरण, बलात्कार, यौन शोषण और ऐसे कितने ही दुष्कृत्यों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है।  दुर्भाग्य की बात है कि ऐसे में कई राजनेता, 'पुरुषों' को अपनी सोच बदलने की बजाय स्त्रियों को घर पर बैठने की सलाह दे रहे हैं , यानि वे यह मानकर ही चलते हैं कि स्त्रियां बाहर निकलेंगी, तो अपराध होगा ही ! कितनी हास्यास्पद, घृणात्मक और शर्मनाक सोच है इनकी ! ग़र ऐसा है, तो क्यों न बदलाव के तौर पर पुरुषों को ही घर बैठा दिया जाए ! खूब तरक्की भी होगी और भय का नामोनिशान मिट जाएगा !
 
'महिला दिवस' के अवसर पर बहुत कार्यक्रम होते हैं, जहाँ उनकी प्रशंसा में बहुत कुछ कहा-लिखा जाता है। 'फेमिनिज्म' पर चर्चाएं होती हैं पर असल में ये है क्या ? क्योंकि इसका इस्तेमाल, हर युग में, हर तबके में , हर ओहदे पर बैठे लोगों द्वारा अलग-अलग विधियों से अलग-अलग प्रयोजनों के लिए किया जाता रहा है। देखने लायक बात यह भी है कि इस शब्द का सर्वाधिक दुरूपयोग स्त्रियों ने ही किया है।  'स्त्रीत्व' के नाम पर खुद की महानता के गुणगान और हर बात में पुरुषों को दोषी ठहरा देना निहायत ही गलत है। पहले और अब की परम्पराओं में फ़र्क़ आ चुका है और सोच में भी।  हाँ, नारी के मूलभूत गुण जैसे लज्जा ,श्रृंगार ,सहनशीलता, ममत्व, उसका कोमल और मृदु स्वभाव अब भी सुरक्षित है. परिवर्तन गर हुआ है तो यही, कि अब उसे अपनी समस्याओं पर बोलना आ गया है, झिझक खुलती जा रही है,वो multitasking करना भी जान गई है। लेकिन हर बात में झंडा फहराते हुए मोर्चा निकाल देना और बेफिजूल की नारेबाज़ी सही नहीं लगती ! अबला,असहाय,निरीह अब पुराने गीत हैं।'आंसू', होते तो असल हैं पर उन्हें हथियार की तरह इस्तेमाल न किया जाए तो बेहतर ! मेरे हिसाब से 'स्त्रीत्व' यही है कि हम अपने मूलभूत गुणों को संरक्षित रखते हुए, हर वर्ग को उसके हिस्से का मान दें और जरुरत पड़ने पर अपनी बात भी पूरी कौम(पुरुष) पर दोषारोपण किये बिना कह सकें। क्योंकि हमारी और आपकी दुनिया में बहुत अच्छे और सुलझी सोच वाले पुरुष भी हैं, ये तो हम सभी मानते हैं। और ये भी एक कटु सत्य है कि अत्याचार पुरुषों पर भी होते हैं, जिन्हें वो कह नहीं पाते ! 
 
विज्ञानं का नियम है , किसी वस्तु को दबाने पर वो दुगुनी शक्ति से उछलती है.  कुछ ऐसा ही स्त्रियों के साथ भी हुआ है। कुछ वर्षों में यह भी सामान्य हो जायेगा, तब तक चर्चाएं चलती रहें, दिवस मनाये जाते रहें। लेकिन इस तरह के विमर्श में पुरुषों को भी अवश्य आमंत्रित करें। जैसे हम लोग हर बात में उन पर निबंध लिख बैठते हैं, उन्हें भी ये सुअवसर मिलना चाहिए। आजकल की युवा पीढ़ी की सकारात्मक सोच, समाज के लिए बहुत उम्मीदें पैदा करती है। हमें आशान्वित रहना होगा कि कुछ वर्षों में स्त्री-पुरुष के बीच का युद्ध ही समाप्त हो जाएगा, और दोनों एक दूसरे की सत्ता को मान देते हुए, आपसी मतभेद होने के बावजूद भी इस सच्चाई को स्नेह से स्वीकार कर सामंजस्य बैठा पाने में सक्षम होंगे ! फिर न अलग से महिला दिवस मनाने की आवश्यकता होगी और न ही पुरुष दिवस ! पर तब तक के लिए, आज का दिवस मुबारक़ हो !
 
होली के रंगों का असर अभी गया नहीं होगा, गुझिया की मिठास कहीं बाक़ी होगी, किसी नाराज़ दोस्त ने बढ़कर गले लगाया होगा, किसी ने अपना बन ग़ैर को अपनाया होगा। तभी तो गुलाल ने मौसम में रूमानियत बिखेरी है अभी, ऋतुराज भी बौराया-सा लगता है, कितनी सुन्दर छटा है और चमकीला आसमाँ। ऐसे में अपने पहले क़दम के साथ, समय की दहलीज़ पर दस्तक देने, आप सभी के स्नेह और शुभकामनाओं का आकांक्षी, आ ही गया.......... 'हस्ताक्षर' ! 
 

- प्रीति अज्ञात
 
रचनाकार परिचय
प्रीति अज्ञात

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