नवम्बर-दिसम्बर 2015 (संयुक्तांक)
अंक - 9 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

उड़ान
पारुल पिछले एक घंटे से ऑनलाइन मेन्स वाचेस देख रही थी, उसने एक बार फिर से सारा हिसाब लगाया कि अपनी पहली सैलरी से माँ के लिए दो साड़ियाँ, भाई के लिए साईकिल लेनी है और इसके बाद उसके लिए एक घडी भी, जिसके साथ वो हर पल रहना चाहता है, उसका जन्मदिन जो है! 
पारुल राजपूत इक्कीस वर्ष की खूबसूरत और शांत-सी लड़की, भारत के लाखों लड़के-लड़कियों की तरह वो भी आई.ए.एस बनना चाहती थी, लेकिन उसके ग्रेजुएट होते ही एक हादसे में उसके पिता जी; माँ, भाई और उसे इस दुनिया में अकेला छोड़ कर चले गए. ज़िंदगी को चलाने के लिए माँ ने पास एक स्कूल में क्लर्क के रूप में काम करना शुरू कर दिया था और पारुल आसपास के बच्चो को पढ़ाने लगी थी. ज़िंदगी मुश्किल से ही सही लेकिन फिर से चल पड़ी थी.
 
कितनी खुश थी उस दिन पारुल, जब उसके पापा के दोस्त के लड़के ने उसे अपने ऑफिस में जॉब के लिए ऑफर किया था. टेलीफोन ऑपरेटर का काम था और बीस हजार की सैलरी. माँ को एक सहारा मिल गया था.
एक महीना कब बीत गया, पता ही नही चला. सर बहुत ख्याल रखते थे उसका. कोई गलती होने पर भी प्यार से समझाते थे, कभी-कभी पारुल सोचती कि अगर उसका बड़ा भाई होता तो बिलकुल सर के जैसा ही होता.
 
आज सैलरी डे था. पिछले पंद्रह दिन से पारुल सिर्फ़ यही प्लान कर रही थी कि पहली सैलरी में उसे किसके लिए क्या करना है! वो मुट्ठी भर पैसों से सबकी खुशियाँ खरीदना चाहती थी.
तभी फ़ोन की घंटी बजी और सर ने उसे अपने केबिन में बुलाया.
पारुल केबिन में आकर सर के सामने खड़ी हो गयी. उन्होंने उसे उसकी सैलरी का चेक देते हुआ कहा, "पहली सैलरी मुबारक हो,
पारुल"
"थेन्क यू सर"
 
"पारुल, एक काम करो. कल की छुट्टी कर लो और मेरे फ्लैट पर आ जाना" सर ने पारुल के कंधे पर हाथ रखते हुआ कहा.
अवाक्-सा होकर पारुल ने बोला "सर, मैं समझी नहीं"
"अरे वो क्या है न कि मेरी बीवी कुछ दिनों के लिए मायके गयी हुयी है, तो मैं चाहता हूँ कि तुम उसकी कमी पूरी करो", हाथ का दबाव बढ़ाते हुए सर ने बोला.
पारुल ने अपने गुस्से को दबाते हुये बोला "सर, माफ़ करिये मैं ऐसी लड़की नहीं हूँ" और उनका हाथ झटक दिया.
"देखो पारुल, ऐसी लड़की कोई नहीं होता है लेकिन हालात उसे बना देते हैं. तुम खुद ही सोचो जो काम कोई भी पाँच हजार में कर सकता है मै उसके लिए तुम्हें बीस हजार दे रहा हूँ. उसके बदले मुझे भी कुछ चाहिए न?" बहुत आराम से उन्होंने उसकी बोली लगा दी थी.
 
पारुल बहुत कुछ बोलना चाह रही थी, लेकिन शब्दों ने साथ छोड़ दिया था. दुनिया का एक और रंग सामने था. शायद आज वो 'गिव एंड टेक' के रिश्ते को समझ रही थी.
सर ने उसकी ख़ामोशी को सहमति मानते हुए फिर से कहना शुरू किया "सोच लो, तुम्हारा ही फायदा है. डरो मत! मैं तुम्हें बहुत आगे ले जा सकता हूँ. तुम अपने हिसाब से अपनी ज़िंदगी जी सकती हो. मेरी बात न मानने पर तुम और तुम्हारा परिवार फिर से उसी हाल में होगा. शुरू में अजीब लगेगा फिर तुम्हे इन सब की आदत हो जाएगी. आगे बढ़ना है तो हालात से समझौता करना सीखो"
पारुल ने सर की ओर देखा और मुस्कुरा उठी उसने एक फैसला कर लिया था.
 
पारुल बिना कुछ बोले बॉस के केबिन से निकल गयी. उसकी आँखों में आँसू थे और दिल में भरोसा टूटने का दर्द. कुछ पल बाद उसने खुद को वाशरूम में आईने के सामने खड़ा पाया. उसने अपने आँसुओं को पानी में मिला कर बहा दिया था. उधर पारुल का बॉस कल जब वो उसके साथ होगी, के सपने देखना लगा था. उसे पता था कि पारुल न नहीं कर सकती. आखिर आज तक पता नहीं, कितनी लड़कियों का उसने इस हाल में फायदा उठाया था. 
 
पारुल को बॉस के केबिन में जाते, फिर आँखों में आँसू लिए वाशरूम में जाते देख पूरे ऑफिस में खुसुर-फुसुर शुरू हो गयी थी. मैनेजर रितिका के होंठो पर दर्द को छुपाती एक मुस्कान आ गयी थी. वो पारुल में खुद को देख रही थी. दो साल पहले उसने भी तो इन्हीं हालातों में समझौता किया था और आज इस मुकाम तक पहुँचने के लिए न जाने कितनी बार अपनी आत्मा को कुचला था.
पारुल मुँह धो कर अपनी सीट पर आयी. अपने बैग से एक डायरी निकाली. ये वो डायरी थी, जो उसके पापा ने उसे उसके जन्मदिन पर दी थी. उसके पहले ही पेज पर पापा ने दो पंक्तियाँ लिखीं थीं जो मानो आज के ही लिए ही थी. पारुल ने उन पंक्तियों को पढ़ा एक बार, दो बार; तब तक जब तक वो आंसुओ के कारण धुंधला नहीं गईं.
"हार कर मंजूर मत करना समय का फैसला, जब तलक है साँस बाक़ी छोड़ना मत हौसला"
 
पारुल को पता था कि माँ को जॉब छोड़ने की बात बुरी लगेगी, लेकिन उसे यह भी पता था कि उन्हें तब गर्व होगा जब वो जानेँगीं कि उसने अपना जमीर नही बेचा. माँ का कुछ दिन और पुरानी साड़ियाँ पहन लेना, उसके कपड़े उतरने से ज्यादा अच्छा है. भाई का कुछ दिन और पैदल स्कूल जाना अपनी आत्मा के बोझ को ढोने से ज्यादा अच्छा है. उसको घडी देने से ज्यादा अच्छा है कि उस से वो हर बार नज़रें मिलाकर बात कर सके!
 
ज़रूरतें कम कर ज़िंदगी जी जा सकती है. ये बात मुश्किल है लेकिन नामुमकिन नहीं! वो और ज्यादा मेहनत करेगी फिर से तैयारी करेगी. अब वो वही जॉब करेगी, जहाँ उसे काबिलियत के लिए लिया जायेगा न की जिस्म के लिए.
उसे पता था, ये सब बहुत कठिन है लेकिन उसके हौसले के सामने ये सारी मुसीबतें एक दिन हार जाएँगीं; वो यह भी जानती थी.
रेसिग्नेशन टाइप करते समय पारुल के हाथ एक बार भी नही कांपे. उस लेटर को लेकर पारुल बॉस के केबिन में जाने ही वाली थी कि बॉस ने एक साथ सब को मीटिंग रूम में बुलाया. कोई नया प्रॉडक्ट लॉंच हुआ था, उसके बारे में मीटिंग थी. पारुल मीटिंग-रूम में सब से बाद में दाखिल हुयी. सर उसे देख एक अजीब-सी मुस्कान मुस्काये. पारुल भी मुस्कुरा दी. लेकिन वो मीटिंग-रूम की अपनी सीट पर नहीं रुकी. वो बॉस की सीट तक गयी और बोली.
 
"सर, एक मिनट"
"जी पारुल, बताएँ", अपने चेहरे पर कुटिल मुस्कान लिए सर उसकी तरफ मुड़े 
"थूऊऊ", सबके सामने पारुल ने बॉस के मुँह पर थूक दिया और बोली, "थू है मिस्टर. आदित्य तुम्हारी जॉब पर! तुम्हारी सोच पर और तुम पर! तुम्हें आदत नहीं होगी न, किसी मजबूर लड़की की न सुनने की. कोई बात नहीं, पहले तुम्हें ये अजीब लगेगा और फिर आदत पड़ जाएगी"
सब हैरान से पारुल को देख रहे थे और पारुल ने अपनी उड़ान की परवाज़ भर दी थी!

- मृदुल पाण्डेय

रचनाकार परिचय
मृदुल पाण्डेय

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