फरवरी 2020
अंक - 57 | कुल अंक - 57
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्याँकन

किन्नर समाज की विसंगतियों का मुकम्मल दस्तावेज: आधा आदमी
- संदीप 'सरस'


 



उफ़्फ़फ़....इतनी मानसिक, शारीरिक और सामाजिक यंत्रणा!
यकीन नहीं होता यह हमारे ही तरह मनुष्य योनि में जन्म लेने वाले किन्नर समाज के लोग हैं, जो किसी शारीरिक अक्षमता के चलते इतनी उपेक्षा, इतनी वितृष्णा झेलने के लिए अभिशप्त हैं। यकीनन सक्षम कलमकार 'राजेश मलिक' के उपन्यास का नाम भले ही 'आधा आदमी' है लेकिन वह किन्नर समाज की विसंगतियों का मुकम्मल दस्तावेज है।


आप आरोप लगा सकते हैं कि उपन्यास में अश्लील प्रसंगों, वीभत्स गालियों की भरमार है लेकिन आपको स्मरण रखना होगा कि आप उस समाज की विद्रूपताओं को क़रीब से जानने की कोशिश कर रहे हैं, जहाँ सलीका, शिक्षा, शिष्टाचार और सभ्यता जैसे शब्द मायने नहीं रखते और हमारे सभ्य समाज ने किन्नरों के प्रति जैसा दुर्भावनापूर्ण व्यवहार सदैव किया है, उसमें आप उनसे इससे बेहतर की उम्मीद भी नहीं कर सकते।

इस उपन्यास को पढ़ते हुए कई बार सारा आकाश उपन्यास की यादें ताजा हो जाती हैं, जिसे वरिष्ठ कथाकार राजेंद्र यादव और मन्नू भंडारी ने संयुक्त रूप से मिलकर लिखा था। एक ही पृष्ठभूमि पर विभिन्न संवेदनात्मक फ्रेमों में की गयी दास्तानगोई एक अद्भुत प्रयोग था। ऐसा ही प्रयास राजेश मलिक करने में काफी हद तक कामयाब रहे। उन्होंने किन्नरों के जीवन को शब्द स्वर देने का प्रयास किया, वहीं साथ-साथ वर्तमान सामयिक सन्दर्भों को भी विमर्श से रेखांकित करने में बख़ूबी सफल रहे।

यकीनन आधा आदमी उपन्यास लेखक की प्रखर संवेदनशीलता का नमूना है और थर्ड जेंडर के अभिशप्त जीवन की मुखर व्यथा कथा है। एक अभागे दीपक के दीपिकामाई बनने के सफर की दर्दनाक कहानी है। उपन्यास को पढ़ते हुए एक गिजगिजा-सा एहसास आपके ज़ेहन में पैवस्त हो जाता है। यही है कलमकार की जीत और यही है उसके लेखन का अभीष्ट। उपन्यास पढ़ते हुए जितनी घृणा आपको थर्ड जेंडर की जीवन शैली से होती है, उससे कहीं ज्यादा घृणा होती है उनके प्रति समाज के घटिया रवैया से।

किन्नरों के जीवन की पड़ताल करते हुए और दीपिका माई के जीवन के उतार-चढ़ावों को रेखांकित करते हुए यह उपन्यास थर्ड जेंडर समुदाय के जीवन का जीवंत आख्यान कहा जा सकता है। सच तो यह है कि हमने, हमारे समाज ने अपने और किन्नरों के बीच जितनी गहरी रेखा खींची है, उसी अनुपात में वह किन्नरों के जीवन शैली उनके रहन-सहन उनके रीति-रिवाजों में झाँकने के लिए उत्सुक भी रहता है।

उपन्यास में दीपिका माई की डायरी के माध्यम से समलैंगिकता के आगाज़ से किन्नरत्व के अंजाम तक का वीभत्स सफर धीरे-धीरे आगे बढ़ता है। आर्थिक विपन्नता में दीपक का संघर्ष, समाज के विभिन्न तबकों द्वारा उसका दैहिक शोषण, पारिवारिक दबाव में उसका विवाह और अंततः परिस्थितिजन्य किन्नरत्व की स्वीकार्यता। यकीन मानिए कि उपन्यास आपको विद्रूपताओं और विसंगतियों के बीहड़ जंगलों में विचरण हेतु विवश कर देगा। अंतिम दिनों में दीपिका माई का स्वास्थ्य ख़राब हो जाता है और उसके सभी पूर्व प्रेमी, सारे चेले उसे छोड़कर चले जाते हैं। जिस दीपिका माई ने पहले अपने परिवार के लिए, अपनों के लिए अपना जीवन होम कर दिया, अंतिम क्षणों में अकेली रह गयी और बहुत ही दुःखद अंत हुआ।

हालाँकि दीपिका माई की लाश के साथ किया गया समाज द्वारा दुर्व्यवहार अतिशयोक्ति भरा असहज लगता है क्योंकि समाज की संवेदनाएँ भले ही इस वर्ग के लिए मर चुकी हैं लेकिन कानूनी और व्यावहारिक रूप से ऐसा संभव नहीं दिखता। लेकिन मार्मिक क्लाइमैक्स के लिए लेखक की कल्पना शक्ति को छूट लेने की इजाज़त मिलनी चाहिए। उपन्यास के नायक दीपिका माई से आप एक क्षण को घृणा कर सकते हैं और दूसरे क्षण उससे सहानुभूति कर सकते हैं, लेकिन उसे नजरअंदाज नहीं कर सकते। यह पात्र हमारे समाज का वह मवाद भरा नासूर है, जिसे हम यूँ ही उपेक्षित नहीं कर सकते। उसकी साफ-सफाई और उपचार बेहद ज़रूरी है।

एक बात तय है संविधान में भले ही थर्ड जेंडर के लिए कोई प्रावधान बना दिया जाए लेकिन इस वर्ग को भारतीय समाज की स्वीकार्यता प्राप्त करने में अभी समय लगेगा। समाज के अवचेतन मस्तिष्क में बैठा गहरा उपेक्षा, हेयता भाव किसी कानूनी बैसाखी के सहारे किन्नर समाज के साथ न्याय नहीं कर सकता। जब तक सामाजिक नैतिक मान्यतानाएँ पूर्वाग्रह से ऊपर उठकर मनुष्यता के धरातल पर सहज नहीं होती हैं, तब तक कोई कानून इस समस्या के व्यापक समाधान के लिए कारगर नहीं साबित हो सकता।

उपन्यास लेखक राजेश मलिक जी एक बहुआयामी व्यक्तित्व से संपृक्त हैं और कला, अभिनय व साहित्य में पूरी ऊर्जा के साथ पूरी रचनात्मकता के साथ सृजनशील हैं। वे इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने वंचित तबके की पीड़ा को शाश्वत स्वर प्रदान किया है। समाज के अस्पृश्य वर्ग के निजी जीवन में झाँकने का साहस किया है। मुझे विश्वास है कि उनका यह उपन्यास 'आधा आदमी' थर्ड जेंडर से जुड़े विमर्श में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा और किन्नर समुदाय की विषमताओं से सीधा संवाद करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।


समीक्ष्य पुस्तक- आधा आदमी
विधा- उपन्यास
लेखक- राजेश मलिक
प्रकाशक- मनीष पब्लिकेशन, दिल्ली
संस्करण- प्रथम (2018)
मूल्य- 650/-
पृष्ठ- 300


- संदीप सरस

रचनाकार परिचय
संदीप सरस

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