फरवरी 2020
अंक - 57 | कुल अंक - 57
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्याँकन

दुष्यंत कुमार की परंपरा को आगे बढ़ाता संग्रह: कुछ निशान काग़ज़ पर
– डॉ. शुभा श्रीवास्तव


 



किसी भी लेखक के पास अपना क्या होता है, सिर्फ शब्द। जिसके निशान काग़ज़ पर क़लम छोड़ देती है। यही शब्द इतिहास बनते हैं और लेखक के कर्म की गवाही देते हैं। 'कुछ निशान काग़ज़ पर' ऐसी ही स्वर्णिम गवाही देती है। ग़ज़ल की यह पुस्तक अपने आप में बड़ी अनूठी और आकर्षक है। सबसे पहली विशेषता, जो मुझे इस गजल संग्रह में दिखी वह है- इसका सहज व सरलपन। एक साधारण पाठक बिना उर्दू के ज्ञान के भी इन ग़ज़लों से सहजता से जुड़ जाता है। के. पी. अनमोल की यह बहुत बड़ी ख़ासियत है। ग़ज़लों के अंत में उर्दू शब्दों के अर्थ दिए हुए हैं, जो साधारण पाठक के लिए ग़ज़लों को और सुगम बनाते हैं। एक साधारण पाठक, जिसे उर्दू का ज्ञान नहीं है वह भी इन ग़ज़लों को उतने ही प्रेम से पढ़ता है, जितने प्रेम से एक उर्दू का पाठक। हालाँकि इन ग़ज़लों में उर्दू के शब्द बहुत कम आए हैं और हिंदी भाषा की ही प्रधानता है। वास्तव में यह दुष्यंत कुमार की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए दिखती हैं।

प्रकृति की दृष्टि से अनमोल की ग़ज़लें अपना एक अलग ही मुकाम बनाती हैं। प्रकृति के उपादानों को इतनी संवेदना के साथ अनमोल जी रखते हैं कि पाठक का दिल अनायास ही उनके शब्दों को बोल उठता है–

ये पत्तियों पे जो शबनम का हार रक्खा है
न जाने किस ने गले से उतार रक्खा है


प्रकृति से संबंधित ये ग़ज़लें वास्तव में गले का हार ही हैं। प्रकृति हमारे जीवन का अभिन्न अंग है पर हम निरंतर इससे दूर होते चले जा रहे हैं। क्या हो जब पेड़-पौधे हमारे बारे में सोचेंगे? तब यह प्रश्न सिर्फ अनमोल के सामने ही नहीं हैं बल्कि हर रचनाकार और हर पाठक के लिए है। अगर पेड़-पौधे सोचेंगे हमारे बारे में तो शायद संवेदना के स्तर बदल जायेंगे। अनमोल की कुछ पंक्तियाँ इसी ओर इशारा करती हैं। वैसे प्रकृति का अनूठा और नवीन रूप हमें अनमोल की ग़ज़लों में दिखाई देता है। यहाँ पर पेड़ भी प्रश्न करते हैं और कहते हैं–

खड़े ऊँचाइयों पर पेड़ अक्सर सोचते होंगे
ये पौधे किस तरह गमलों में रहकर जी रहे होंगे

अचानक ठंड से ए.सी. की उचटी नींद तो सोचा
परिंदे ऐसी गर्मी में झुलस फिर रहे होंगे


अनमोल जी की ये पंक्तियाँ उनकी संवेदनात्मक अनुभूति को अभिव्यक्त करती हैं। जीवन की व्यापकता और गहराई इसी दृष्टि में है कि हम स्वयं और अपनी रचनाओं को इन चिंताओं से जोड़ें और इससे होने वाले मानव जाति के नुक़सान के प्रति पाठक को सचेत करें। ये पंक्तियाँ अनमोल जी की मानवतावादी संवेदना को व्यक्त ही नहीं करतीं बल्कि पाठक को आगाह भी करती हैं। इस संग्रह में इस तरह के शेर कई स्थलों पर आए हैं, जो अपनी वैचारिकता के कारण लंबे समय तक याद किए जाएँगे। वास्तव में प्रकृति से जुड़ा हर रचनाकार अपनी संवेदना के कारण लंबे समय तक याद किया जाएगा नहीं तो दुनिया के झंझावात हर रचनाओं में देखने को मिलते हैं।

यथार्थ को देखना अलग बात है और उसको ग़ज़लों में पिरोना एक अलग बात है। एक ग़ज़लकार के लिए सबसे मुश्किल यही है कि वह यथार्थ से आँखें चुरा भी नहीं पाता है और कठोर शब्दों का चयन भी नहीं कर पाता है। इस दृष्टि से अनमोल जी अपना अलग मुकाम रखते हैं। अनमोल जी की यथार्थ की अभिव्यक्ति उनको आधुनिकता से जोड़ती है। यथार्थ चाहे सामाजिक हो या राजनीतिक, आर्थिक हो या मनोवैज्ञानिक अनमोल की गजलें उसकी हर परत को खोलती चलती हैं। यथार्थ के कई रूप उनकी ग़ज़लों में स्थान-स्थान पर आए हैं। यथार्थ की कठोरता हमें इन ग़ज़लों में दिखाई तो देती है पर शब्दों का प्रयोग कोमल है। ग़ज़ल विधा अपने आप में कोमलता लिए हुए रहती है पर अनमोल की ग़ज़लें कठोरता और कोमलता का सम्मिश्रण हैं।

अनमोल जी एक सजग ग़ज़लकार हैं, जो पैनी दृष्टि रखते हैं और यथार्थ को अलग दृष्टिकोण से देखते हैं। एक उदाहरण हम देख सकते हैं, जो अपनी पृथकता को बख़ूबी बयान करता है–

 
बगल में डालकर थैली यह बच्ची
नहीं पढ़ने, कमाने जा रही है


यहाँ कमाना शब्द पाठक के हृदय में एक हल्की-सी चुभन उत्पन्न करता है। एक तरफ शब्द है बच्ची और दूसरी तरफ शब्द है कमाना, दोनों का सम्मिश्रण पाठक के भीतर एक अजीब-सा उद्वेलन उत्पन्न करते हैं। ज़ाहिर सी बात है हम अपनी आँखों के आगे और रचना में भी आदर्श देखना पसंद करते हैं पर अनमोल जी आदर्श पर नहीं चलते हैं, वे यथार्थ पर चलते हैं।

'कुछ निशान काग़ज़ पर' संग्रह में सिर्फ ग़ज़लें ही नहीं, बल्कि उनका संपूर्ण वातावरण उपस्थित हुआ है। वातावरण निर्माण की दृष्टि से अनमोल अपने आप में विरले हैं। इस वातावरण में कहीं व्यंग्य नहीं है पर अपनी बात को कहने का पूर्ण सामर्थ्य अवश्य है। अनमोल कोई बात व्यंग्य में तंज़ की तरह नहीं करते हैं बल्कि बड़ी सरलता से अपनी बात को प्रस्तुत करते हैं। यही सरलता इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता है। यह सरलता भाव की ही नहीं भाषा की भी है।
अनमोल एक तरफ प्रेम में राधा-कन्हाई को ले आते हैं तो तुरंत दूसरी ओर बूढ़ी आँखों पर नज़रें गड़ाते हैं। प्रेम में जहाँ वह अपनी अभिव्यक्ति में कहते हैं–


राधा काहे मुरली की दीवानी है
मुरलीधर को आज तलक हैरानी है


वहीं, दूसरी तरफ एक मध्यवर्गीय यथार्थ है, जिसमें प्रेम की धार सूख गई है। उसका वर्णन है–

बाप नहीं रो पाता बेटों के आगे
बूढ़ी आँखों में भी कितना पानी है


ये दोनों उदाहरण यथार्थ और प्रेम के उदाहरण हैं, जिनमें दो विरोधी बातें हैं। परन्तु यह विरोध ही तो अनमोल जी की विशेषता है। प्रेम का यही वैविध्यपूर्ण चित्र खींचना ग़ज़लकार का काम है। इस चित्रण में बेचैनी है, जो मिस्रो में ही नहीं; पाठक में भी आ जाती है।

प्रेम से ही दुनिया का हर मनुष्य जुड़ता है। मानवतावादी संस्कार और संस्कृति को अनमोल अपने शेरों में बड़ी नज़ाकत से शामिल करते हैं। संस्कारों के धागे कब मनुष्य के इर्द-गिर्द बंध जाते हैं, उसे पता ही नहीं चलता है। रचनाकार तो उसे देखता भी है और लिखता भी। ऐसे स्थलों पर अनमोल भाषा में प्रतीक का चयन करते हैं और कोमल शब्दों में इसे बांधते हैं। एक उदाहरण देखिए–


हैरत है पीपल की शाखों से कैसे अरमां
पतले-पतले धागों में आकर बंध जाते हैं


रचना की कई पर्तें होती हैं, इस ग़ज़ल की भी कई पर्ते हैं। अब आप चाहे पाठक बनिए; चाहे समीक्षक या ख़ुद रचनाकार, शेर को महसूस कीजिए और विचार कीजिए। ज़ाहिर-सी बात है आप दाद दिए बगैर नहीं रह पाएँगे।

एक रचनाकार के रूप में अनमोल को अपनी क़लम का उत्तरदायित्व पता है। वह कहते हैं–


क़लम का काम नहीं सिर्फ हवा में ही उड़े जाने का
यह कौन शब्दों की मीनार उठाने में यकीं रखता है


अनमोल जी की क़लम को यह भी एहसास है कि आज हमारे समाज में धर्म, जाति के नाम पर कई दीवारें खड़ी हैं। एक रचनाकार ही इन दीवारों को ढहाने की अपील कर सकता है क्योंकि इसके बीच की राजनीति या यह कहें वास्तविकता सिर्फ रचनाकार को पता होती है। सच की इस पर्त को खोजना और उस सच की अभिव्यक्ति करना अनमोल बख़ूबी जानते हैं। वह कहते हैं–

ज़ात-मज़हब कुछ नहीं बस, बाँटने का काम है
जो मनुज को बांट दें ऐसा ख़ुदा अच्छा नहीं

तू समझता है मुझे और मैं समझता हूँ तुझे
फिर हमारे बीच कोई तीसरा अच्छा नहीं


पर यह तीसरे की पैठ शहरों में पहले ज़्यादा थी, अब यह हवा गाँव में भी फैल रही है। अब गाँव; जो अपनी ख़ूबी के लिए जाना जाता था वह धीरे-धीरे धूमिल हो रहा है। अब शहरी अकेलापन अजनबीपन गाँव में भी प्रवेश कर गया है। अनमोल को हिंदुस्तान की इस बदलती बयार का एहसास है और उनकी निगाहें भी इस ओर हैं। उनकी क़लम अपना काम कर रही है। वह कह रही है–

गाँव को भी शहरी जीवन दे गया
कौन इतना अजनबीपन दे गया

एक गज टुकड़ा ज़मीं का देखिए
भाई को भाई से अनबन दे गया


भावों का वैविध्य अनमोल जी को अन्य गजलकारों से अलग खड़ा करता है। पूरे संग्रह में स्त्री के हर पक्ष को एक पुरुष रचनाकार स्त्री के नज़रिए से चित्रित करे; यह अपने आप में बड़ी बात है। स्त्री के हर रूप बेटी, बहन या प्रेमिका पर अनमोल ने लिखा है और बेबाक लिखा है। पुरुष स्त्री के द्वारा अपनी सारी सक्षुधा को पूर्ण करना चाहता है। उस स्त्री के प्रति बेबसी का भाव अनमोल नहीं रखते हैं पर उन्हें पता है कि उनका यह भावना रखने पर भी कहीं न कहीं बेबसी व्याप्त तो है ही। एक शेर देखें–

बेटी की खैर एक दो माँगों के ही एवज
टाला भी कैसे जाए जमाई का फैसला


पर यह ज़माना हमेशा आक्षेप स्त्री पर ही लगाता है। ऐसे नाज़ुक क्षण और नाज़ुक सोच को अनमोल बहुत गहराई से महसूस करते हैं। वह कहते हैं–

बेटियों को कुछ नज़रें ग़लतियाँ समझती हैं
मोतियों की क़ीमत कब सीपियाँ समझती हैं

इमारत के बगल में एक शजर पर चिड़िया बैठी है
हक़ीक़त में नहीं ऐसा ये इक तस्वीर कहती है


इस ग़ज़ल संग्रह की भाषा बेहद कसी हुई है। कल्पना और भाव का सम्मिश्रण इस ग़ज़ल संग्रह को औरों से अलग बनाता है। अनमोल के सपाट कथन भाषा को और गहरी चोट करने की शक्ति देते हैं। भावों की अनुगामी भाषा बड़ी सुंदर और अभिव्यक्ति में सक्षम है। आम और सहज व्यक्ति की ग़ज़ल आम व सहज भाषा में लिखी/कही गई है। शिल्प तो उसका अनुगामी है ही। शिल्पगत वैशिष्ट्य पर ध्यान भाव और भाषा के बाद आता है। विषय और भाषा का कसाव अनमोल की सबसे बड़ी विशेषता कही जा सकती है। ग़ज़ल विधा को समृद्ध करने में अनमोल का योगदान स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा। इनकी मनोवैज्ञानिक तथा सूक्ष्म दृष्टि ग़ज़ल विधा को संपन्न बनाती है।





समीक्ष्य पुस्तक– कुछ निशान काग़ज़ पर
विधा– ग़ज़ल
लेखक– के. पी. अनमोल
प्रकाशन- किताबगंज प्रकाशन, गंगापुरसिटी, राजस्थान
मूल्य– 195 रूपये


- डॉ. शुभा श्रीवास्तव

रचनाकार परिचय
डॉ. शुभा श्रीवास्तव

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