प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2015
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

"साहित्य अब संकरी घाटी नहीं, एक विस्तृत मैदान है" - आशा पाण्डे ओझा
 
 
 
 
"मैं सिर्फ कर्म करने में विश्वास करती हूँ, बिना फल की इच्छा किये। मेरा मानना है आप अपनी रचना प्रक्रिया में संलग्न रहें, आज नहीं तो कल कोई आपके विचारों से सहमत होगा, सराहेगा, उसें आत्मसात करेगा। किसी के तो काम आएगा, आपके शब्दों का नीड ! आप बस बुनते जाओ ! मैं बड़ी किताबों में छपने या सम्मान पाने की होड़ में भी शामिल नहीं होना चाहती। बस एक तरह से  आत्मसंतुष्टि के लिए लिखती हूँ । एक रेगिस्तानी अभावों में पला होता है, तो कम का ही आदी होता है ! आपने कुछ हासिल करने के लिए अपने चरित्र व उसूलों को गिरवी रखा तो समझिये जो भी हासिल किया उसकी बहुत बड़ी कीमत चुका दी आपने और उसके लिए आपका अंतर आपको कभी माफ़ नहीं करेगा। अपने उसूलों से समझौता किये बिना, जितना जिस पथ पर चल पाऊँगी, चलूंगी .. अनवरत। मेरा मुकाम  है मेरी आन्तरिक ख़ुशी ! मेरे उसूलों के साथ जितना कुछ पा सकूं, उतनी ही ख्वाहिश ! माना आकाश में उड़ना आज हर किसी का   मकसद है .. पर इस उड़ान में कैसे छोड़ दूं मैं, अपनी स्नेह भरी धरती ! मैं उड़ना चाहती हूँ अपनों के संग अपनत्व के संग ... रंग बिरंगे पंख .. ऊँची उड़ान नहीं दे सकते .. ऊँची उड़ान के लिए जिन्दगी का अनुभव जरुरी है .. जिन्दगी मेरे इर्द गिर्द है .. जो देती है मुझे उड़ान का हौसला भी ... कभी ममता, कभी माधुर्य, कभी दया, कभी करुणा, कभी स्नेह, कभी वात्सल्य ! ढेर सारी जिम्मेदारियां उसके बीच छोटे-छोटे सपने जो बहुत दूर नहीं ले जाते मुझे अपनों से ! दिली ख्वाहिश है बस जितना स्नेह मिल रहा है उतना ही मिलता रहे सबका !"  यह कथन है, राजस्थानी पृष्ठभूमि में पली-बढ़ी चर्चित लेखिका और समाजसेविका आशा पाण्डे ओझा जी का ! 
अपने प्रदेश और उसके बाहर भी कई पुरस्कारों से सम्मानित आशा जी, कई वर्षों से महिलाओं और छात्राओं के उत्थान के लिए महत्वपूर्ण क़दम उठाती रही हैं। इन्होंने स्कूली दिनों से ही सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेना प्रारम्भ कर दिया था और वहीँ से इनकी लेखनी भी  पल्लवित होने लगी थी ! इनके पति की सरकारी नौकरी और स्थानांतरण के कारण इन्हें विभिन्न स्थानों में निवास का अवसर मिला, इनकी दो  प्यारी बेटियों भी हैं, अम्बुधि और पयोधि ! लेखन और समाज सेवा के अतिरिक्त आशा जी फोटोग्राफी और पर्यटन में भी विशेष रूचि रखती हैं। आशा जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को जानने के लिए आइये पढ़ते हैं हमारी संपादक प्रीति 'अज्ञात' से उनकी अनौपचारिक बातचीत के कुछ अंश -
 
प्रीति 'अज्ञात' -  किस घटना ने आपको उद्वेलित किया और आपकी लेखनी से पहली रचना जन्मी ? 
आशा पाण्डे - जब मैं आठवी कक्षा में थी तब हमारे गाँव की एक लड़की को दहेज़ के लिए जला
कर मार दिया गया था। उस घटना ने मुझे उस छोटी सी उम्र में भी बहुत झकझोरा। पूरे गाँव में ही दहेज़ लोभियों के खिलाफ एक आन्दोलन-सा चला। कई मंचों से उसका विरोध हुआ, गोष्ठियां हुई, मुझे उन आन्दोलनकारियों ने मंच से अपनी बात रखने के लिए जगह-जगह आमंत्रित किया। मेरी प्रधानाध्यापिका जी ने मुझे कुछ लिख कर बोलने के लिए, एक घंटा अपने ऑफिस में बैठा कर अतिरिक्त टाइम दिया, उस रोज मेरी कलम से पहली कविता जन्मी 'दहेज़ का दैत्य',जो ग्यारहवीं में एक पत्रिका में छप भी गई। उसी दौरान एक आलेख भी छपा 'विधवा विवाह और हमारा समाज'  यह दो रचनाएं इसलिए याद है कि यह बहुत चर्चा में रही, पर तब लेखन को साहित्य की तरह नहीं बल्कि स्कूल की गतिविधि की तरह लिया। प्राइवेट पढ़ते हुए लॉ भी कर लिया। लॉ के बाद, पापा ने प्रेक्टिस करने के मकसद से, जोधपुर भेज दिया। पर मन कहीं-न-कहीं से कवि  था सो साहित्य में रमता रहा, रचनाएँ लिखती रही।
 
प्रीति 'अज्ञात'- लेखन कार्य , बहुत ही सुक़ून और आत्म-संतुष्टि देता है।  संभवत: इसीलिए न होते हुए भी, इसमें 'समय' कभी आड़े नहीं आता ! क्या आप भी यही सोचती हैं ?
आशा पाण्डे- हाँ, प्रीति जी ! मैं आपकी बात से पूर्णत: सहमत हूँ। कोर्ट में प्रेक्टिस करते हुए ही मैंनें हिंदी में प्रथम श्रेणी से एम .ए भी कर लिया। आज लिखते-लिखते लेखन की वो आदत
हो गई कि लेखन मेरे  मन का खालीपन भरता है। मन को सुकूं मिलता है। मेरे भीतर जब कोई अभाव कसमसाता है तब शायद रचना जन्म लेती है, मुझे पता नहीं चलता यह अभाव क्या है पर कोई रिक्तता होती है, कुछ उद्द्वेलित करता है। इन भावों की आत्यंतिक उत्कटता और विचारों का सघन प्रवाह मेरे शब्दों को आगे बढ़ाता है मेरी कलम में उतर आता है। कभी शब्द मुझमे थिरकन पैदा कर देते हैं,कभी जड़ बना देते हैं मुझे । क्षण -क्षण सघनतर होते हुए, विचारों के बादलों को बरसने से रोक नहीं पाती हूँ तो कलम उठानी ही पड़ती है, समय किसी तरह निकाल ही लेती हूँ।
 
प्रीति 'अज्ञात'- यूँ तो रचनाकार का ह्रदय संवेदनशील होता है और उनकी क़लम लगभग हर विषय पर ही सहजता से सृजन करती है ! परन्तु फिर भी हरेक की एक पसंद भी होती है, जिसमें लिखना उन्हे हमेशा ही सुहाता रहा है। आपके साथ भी ऐसा ज़रूर होता होगा ! 
आशा पाण्डे- मूलत: मेरी रचनाएँ समसामयिक विषयों पर ज्यादा होती है। हमारी सोच पर तत्कालीन रिस्थितियों का भी प्रभाव रहता है। कुछ रचनाकार सदैव निजी व स्वतंत्र सोच व्यक्त करते हैं। कुछ परिस्थितिवश सोच बदलते  भी  हैं। रिस्थितियों  का प्रभाव लेखक वर्ग पर भी पड़ता ही है आखिर हैं तो वो भी सामाजिक जड़ों की ही देन। इसलिए सामाजिक मुद्दे मेरी रचनाओं के विषय ज्यादा बनते हैं ,पर प्रेम कविता लिखने में खुद को बहुत सहज पाती हूँ। प्रेम जो मानव की स्वाभाविक प्रक्रिया है और संसार को खूबसूरत बनाता है ! प्रेम जब रगों में दौड़ने लगता है, नफरतें सुप्त हो जाती हैं। प्रेम से पूर्ण हृदय क्रोध से तो भर सकता है, क्षणिक आवेश में भी आ सकता है  पर विनाश किसी का नहीं कर सकता । दूसरी बात यह भी है कि मेरे द्वारा लिखी प्रेम कविताएँ पाठकों द्वारा ज्यादा सराही गई तो अब वही लिखती हूँ ज्यादा ।
 
प्रीति 'अज्ञात'- आप, छंदमुक्त कविता के अलावा और किस विधा में लिखना पसंद करती हैं ?
आशा पाण्डे- छंद मुक्त कविता के अतिरिक्त व्यंग ,शोधपत्र , कहानी,आलेख लिखना मुझे अच्छा लगता है पर मैंने हाइकु ,दोहा ,गीत ,ग़ज़ल ,निबंध सब लिखा है। सब में आनंदित महसूस करती हूँ  हिंदी के साथ साथ राजस्थानी में लिखना भी उतना ही सुकून भरा है मेरे लिए।
 
प्रीति 'अज्ञात'- आप राजस्थानी और हिंदी, दोनों ही भाषाओँ में लिखती हैं, तो किस भाषा में आप ज्यादा सहज महसूस करती हैं ?
आशा पाण्डे- मैं हिंदी, राजस्थानी दोनों के साथ बहुत सहज हूँ। दोनों ही मेरी रगों में है बल्कि बचपन छत्तीसगढ़ में बीता तो पढने समझने में छत्तीसगढ़ी भी मेरे लिए सहज है। बस अभी तक लिखा नहीं है, इसमें। राजस्थानी में भी छुटकर बहुत लिखा है पर अभी तक कोई संग्रह नहीं आया। अब अगली तैयारी वही है।
 
प्रीति 'अज्ञात'- आपके पहले साझा काव्य-संग्रह का अनुभव कैसा रहा ? प्रकाशन की सलाह किसने दी ? किस तरह का सहयोग मिला ? कुछ स्थापित रचनाकारों द्वारा नए लेखकों को हतोत्साहित भी किया जाता रहा है, उनके बारे में आपका क्या कहना है ? 
आशा पाण्डे- एक बार 'राजस्थान पत्रिका' के साहित्य अंक में जाने माने साहित्यकार जबरनाथ पुरोहित जी का बहुत प्यारा गीत छपा। जिसके बोल आज तक मेरे कानों में ठहरे हुए  हैं - 
"गगन चुम्बी प्रसादों में मन में पलते
अवसादों में मेरा मन घुटता जाता
मुझको मेरा आँगन दे दो"
उस गीत के नीचे जबरनाथ जी सर के फोन नंबर  भी थे। मैंने बिना किसी हिचकिचाहट के एक प्रशंसक की तरह उन्हें फ़ोन किया। पता नहीं कैसे, उनको मेरे बातचीत के लहजे से पता चल गया कि मैं भी लिखा करती हूँ.. पूछा "आप भी लिखती हैं ना ? " "जी सर! पर  कोई खास नहीं ,मैं अपनी संतुष्टि भर के लिए लिखती हूँ .., पर जो लिखती  हूँ एक बार आपको दिखाना चाहती हूँ ..। "
उन्होंने कहा  "जब भी जोधपुर आओ  घर जरुर आना .. ,व अपनी डायरियां लाना ..!"
कोई एक माह बाद जोधपुर जाना हुआ। उनसे रूबरू मिलने का पहला मौका भी। सर ने बड़ी आत्मीयता से स्वागत किया। डायरियां अपने पास रख ली।  दो दिन बाद फ़ोन आया "काफी अच्छा लिखती हैं आप, किताब क्यों नहीं निकलवाती ?"
मैंने कहा" सर, मुझे नहीं पता कैसे छपती है? कहाँ से छपती हैं ..?" उन्होंने मेरी कविताओं पे टिक लगा दिए कोई महीने भर बाद वापस गई तब बीकानेर के अंशु पब्लिशर्स से खुद बात की, मेरी बात करवाई व कहा यह कविताएँ टाइप करा कर या हाथ से साफ़ लिख कर एक पाण्डुलिपि तैयार करलें ..
और कभी समय निकाल कर  बीकानेर चली जाएँ। उनके इस आत्मीय सहयोग की वजह से मेरा पहला कविता संग्रह 'दो बूँद समुद्र ' आया। उसकी भूमिका भी जबरनाथ जी सर ने लिखी थी उसके विमोचन में भी आये। उन्ही से मैंने सीखा कि कोई भी नवोदित साहित्यकार आपके सामने अगर उम्मीद भरी नजर से देखे तो आप उसें कभी अनदेखा न  करें, उसके कन्धों पर आत्मीयता का हाथ रखें। वो आपकी अगली पीढ़ी है जिसके भीतर आप जिन्दा रहोगे,न  रहने के बाद भी। जैसे जबरनाथ जी सर का नाम आज भी है मेरे ज़हन में..सदा रहेगा !
 
प्रीति 'अज्ञात'-  स्त्रियों के लिए विवाह के बाद लेखन-कार्य कभी आसान नहीं हो पाता ! असंख्य सवालों-जवाबों के दौर से ऊबकर या यूँ कहूँ कि टूटकर, अक़्सर ही वो अपने लेखन को कहीं पीछे छोड़ आती है ! पर लेखन, फिर भी साथ नहीं छोड़ता और अवसर पाते ही पुन: कुलबुलाने लगता है ! आप भी इस दौर से अवश्य ही गुजरी होंगी ! यदि उचित समझें तो, हमारी महिला लेखिकाओं के लिए, अपनी बात साझा करें !
आशा पाण्डे - वैसे तो ज़िन्दगी किसी के लिए आसान नहीं है परन्तु फिर भी नारी के लिये कुछ ज्यादा मुश्किल है। कहने को सृष्टि की रचयिता  है नारी ..पर इसके हाथ में स्वयं की डोर नहीं !ज़िन्दगी के  विभिन्न किरदार निभाती हुई खुद के अस्तित्व से ही अनजान रह जाती है।  दूसरों को
सदा बेहतर राह दिखाने वाली खुद दिशाविहीन ही रहती है, अपने रिश्ते नाते, संवारती, समेटती खुद कितना टूट चुकी है खुद ही नहीं  जानती।  सहनशीलता, ममता ,त्याग  इन गुणों की दुहाई दे दे कर, उसें हमेशा आगे बढ़ने से रोका गया ,बात बिन बात टोका गया ! वो खुद भी कभी घर के  टूटने के भय से, कभी लोक लाज की वज़ह से, खुद को मिटाती रही, खुद से अनजान बनी रही। मैं भी कभी खुद के सपनों को नहीं जी पाई थी, मैंने भी जिन्दगी को एक लम्बे विराम के बाद फिर से जीना शुरू किया !अपने फ़र्ज़ और जिम्मेदारियों की भीड़ में चुपके -चुपके सिसकती अपनी ख्वाहिशों की सिसकियां सुनी। अपने टूटते हुए सपनो की आह महसूसी, सोचा ये मर गये तो ज़िन्दगी की लाश ढो कर भी क्या फ़ायदा !चलो औरों के लिये जीते-जीते ही, कुछ साँसे अपने लिये भी ले ली जाये। मैंने लॉ किया पापा की ख़ुशी के लिये मैं तो थी कवि हृदया !
ख्वाबों की पक्की ज़मीन पर मेरा  मन कल्पनाओं के सुन्दर घर बनाता रहता है, हर वक्त मेरी कल्पनाएँ सुन्दर सृष्टि का ,सुखद भविष्य का ,अति प्रिय वर्तमान का सृजन किया करती है | बचपन से ही अति भावुक थी  और इसी भावुकता की वजह से मन यथार्थ को बर्दाश्त नहीं कर पाता और इस जीवन उदधि में अनगिनत कल्पनाओं की तरंगे हिलोरें मारती रहती है, अनजाने दर्द में रोती है, अनजानी खुशी में खुश होती है | कवि मन कल्पनाओं के सुन्दर आकाश में उड़ता, सच और झूठ   के धरातल पर कितना टिकता ! मैंने वक़ालत छोड़ी ससुराल वालों की ख़ुशी के लिये, लिखना छोड़ा अपने  घर -परिवार को बेहतर तरीके से संभाल पाने के लिये पर शादी के बाद तो दस साल पूरी तरह से लिखना छोड़ दिया क्योंकि ससुराल वाले इसें ठीक नहीं समझते थे। पति समझाते भी ..जिसें जो सोचना है वो सोचता रहे तुम वो करो जो तुम्हे सुकूं देता हो पर उनकी बात समझते-समझते दस साल लग गये । हिम्मत जुटाते-जुटाते अरसा गुज़र गया । इस बीच जाने कितने ख़याल जल -जल कर बुझे होंगे, कितनी कल्पनायें जग -जग कर सोई होगी, कितने अहसास मिट गए होंगे !अंदाज़ा लगाना मुश्किल है। पर मुझे ठीक से याद है जितना वक़ालत छोड़ कर दुखी नहीं हुई, उतना टूटी थी जब अपनी लेखनी का गला दबाया था ! लेखनी जो की मेरी धडकनों में बसती थी ! मेरी प्राणवायु थी उसके बिना दस साल गुजारे मैंने, आज सोचकर ही तड़प उठती हूँ । औरों की खुशी के लिये खुद को मिटा देना समझदारी नहीं बल्कि कमजोरी है। ऐसे समझोते कभी मत करो जो आपके वजूद को मिटा दे ! आज जब पति, बच्चों व दोस्तों की प्रेरणा से फिर लिख रही हूँ तो लग रहा है सच जीना
सार्थक हुआ है । गुजरा वक्त लौट कर तो नहीं आता पर एक दरवाज़ा उस तक पंहुचता तो है  ..वक्त के बिम्ब झांकते हैं उस दरवाजे से ..अपने आपको पूर्ण होता हुआ देख कर एक इत्मीनान की सांस लेते हैं।
 
प्रीति 'अज्ञात'- जी, आपके एक-एक शब्द से सहमत हूँ। आपने अनजाने में न जाने कितनी स्त्रियों के अहसासों को अभिव्यक्ति दी है, अभी ! अपने अस्तित्व के साथ समझौता करना, स्वयं को समाप्त कर देने जैसा ही है। ये बात 'नारी' जितनी जल्दी समझ ले, उतना ही बेहतर..... क्योंकि आपके सुख से दुखी होने वाले लोग तो कोई-न-कोई वज़ह फिर भी ढूंढ ही निकाल लेते हैं और कुंठाग्रसित होकर आक्षेप या तानों से बाज़ नहीं आते ! आप सचमुच ख़ुशक़िस्मत हैं कि आपके, 'अपने' आपको प्रोत्साहित  करते हैं ! उन्हीं के लिए, अपनी पसंदीदा कविता कहें!
आशा पाण्डे - खुद की रचनाओं में से पसंद-नापसंद छांटना..कितना दुष्कर है  जो कुछ लिखती हूँ दिल से लिखती हूँ। दिल से निकला सब कुछ, दिल के करीब ही होता है पर कुछ छोटी-छोटी रचनाएँ यहाँ रखना चाहूंगी -
"अपने मरने के बाद/किसी को/दान में दे जाना चाहती थी/मैं अपनी आँखें/ ताकि
मेरे मरने के बाद भी/देख सके/इस खूबसूरत जहान को/ये मेरी आँखे/पर अब नहीं
देना चाहती किसी को/किसी भी कीमत पर/मैं अपनी आँखें/यह बहता लहू/ये सुलगते
मंजर/मेरे मरने के बाद भी/क्यों देखे /बेचारी मेरी आँखें"

"नव पिढी तुम इस देश का संबल बनो /माहौल कीचड़ है तो क्या,तुम कमल बनो "
"ना दुत्कारो/ रात का अँधेरा /कहकर मुझको /जन्मता मेरी ही कोख से
तुम्हारे घर का उजाला"
"मोम को आंच जरा दी तो पिघल जाएगी /जिस तरह से ढालोगे लड़की को वो ढल जाएगी"
अपने किरदार को आइना दिखाते रहिये /सूरत वतन की खुद ही बदल जाएगी "
"हर क़दम एक डर-सा लगता है /आदमी क्यूं शरर सा लगता है"
"मुहब्बत /दीपशिखा /नदी का प्रवाह /तीनों में कितनी है समानता / जब तक मिट
ना जाये अस्तित्व /थमने का नाम नहीं लेती /तीनो"

और अब तक लिखी कुल छह कहानियों में कहानी 'ढिगली'  भी मेरे दिल के बहुत करीब है 
 
प्रीति 'अज्ञात'-  आप कई वर्षों से सामाजिक कार्यों में संलग्न हैं, उनके बारे में बताएं। 
आशा पाण्डे - समाज सेवा का दौर तो एक तरह से स्कूल से ही शुरू  गया था क्योंकि यह आदत पापा-मम्मी में भी थी। पापा ने ओसियां में एक संस्था बनाई थी, जिसमें उन अभावग्रस्त बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी उठाना व सरकार से मदद दिलाना उस संस्था का उद्देश्य था ,जो बच्चे अभावों के चलते पढाई बीच में छोड़ देते थे । पापा नहीं रहे संस्था बाकि लोग कैसे चलाएंगे नहीं जानती पर पापा के मकसद जो भी थे, वो मेरी सामर्थ्य के अनुसार पूरा करने का हर संभव प्रयास करुँगी। जैसलमेर, पोकरण में मेरा लेखन कम हो पाया व समाज सेवा के दौर ने गति पकड़ी .वहां के कलेक्टर साहब श्री कृष्ण कान्त पाठक जी भी हमें हर काम में जोड़ते। एक दिन बुला कर पूछा पाण्डे जी मेरा विचार है विवाह पंजीकरण का कैप लगाया जाए। आप एक दिन में कितने रजिस्ट्रेशन करवा पाएंगी मैंने कहा सर हजार .. और सचमुच हमने एक दिन में एक हजार आठ रजिस्ट्रेशन करवा दिया। उस केम्प में यह जैसलमेर की जनता के सहयोग से संभव हुआ, मीडिया का भी पूरा  सपोर्ट रहा। 

प्रीति 'अज्ञात'- स्त्रियों और प्रतिभाशाली छात्राओं को प्रोत्साहित करने के लिए किये गए प्रयासों की विस्तृत जानकारी दें। 
आशा पाण्डे - एक तो खुद छोटे गांव, ओसियां से होने की वजह से बचपन से आसपास देख रही थी कि लड़के-लड़की में हर घर में बहुत भेद-भाव बरता जाता है, मन इस बात का विरोध करता था पर जब पोकरण व जैसलमर पति की पोस्टिंग हुई तब जाना जैसलमेर जिले में कन्या भ्रूण हत्या का प्रचलन शायद पीढ़ियों से रहा है/था, वो आज भी कायम है इस बात को मैंने महसूस किया। कन्या भ्रूण हत्या रोकथाम के लिए भी, पोकरण जैसलमेर में  काम करने के कुछ छोटे-छोटे प्रयास किये  2006 से प्रतिभावान कन्याओं , व महिलाओं के सम्मान का सिलसिला शुरू किया वहां के लोगों के यह ध्यान में लाने के लिए कि बेटियां, बेटों से कम नहीं है।उसका असर भी हुआ। दूसरे कार्यक्रम में तो वहां की महिलाएं खुद आगे आकर मेरी मदद करने  में जुट गईं । मैं पांच हजार निकालती तो चार अन्य महिलाएं भी उसमें जुड़ती, कहती हमारा भी हिस्सा रखो, अच्छा कार्यक्रम करो।मैंने चार साल खूब काम किया, मैं मानती हूँ कि लोगों में जागरूकता भी आई।
 
प्रीति 'अज्ञात'- सुना है,आप जो भी आयोजन करती हैं , उसके लिए कभी अनुदान नहीं लेतीं। इस बारे में कुछ कहें। 
आशा पाण्डे - हाँ मैं अब कुछ आयोजन करती हूँ तो किसी से सहयोग नहीं लेती। जैसलमेर, पोकरण में कार्य करते हुवे अच्छे अनुभवों के साथ बुरा अनुभव भी हुआ। कुछ लोग पांच सौ या हजार  का सहयोग करके आपको खरीदने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोगों से बचने का तरीका आप उतना ही काम करो जितना आपकी जेब अनुमति दे। मैं बहुत स्पष्टवक्ता भी हूँ, गलत लोगों को झेल नहीं पाती, अत: जितना खुद से कर पाऊँगी, करती जाऊँगी।
 
प्रीति 'अज्ञात'- पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद में भी आपकी काफ़ी रूचि रही है !
आशा पाण्डे - जी, वैसे तो मेरा विद्यार्थी जीवन बहुत सामान्य-सा ही था ,परन्तु साथ ही दूसरे क्रियाकलापों जैसे खेल-कूद ,सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हमेशा मैं अव्वल रही । हाई जम्प,लॉन्ग जम्प और खो-खो में तो राज्य स्तर तक तीन बार चयन हुआ लेकिन विडंबना यह रही कि घर के बुजुर्गों की सहमति नहीं बनने से ,बाहर बहुत दूर खेलने नहीं भेजा गया। हालाँकि जोधपुर तक तो जितनी बार जरूरत पडी अकेले भेजा। देखा जाय तो बुजुर्गों का डर वाजिब भी था। नर्सरी से लेकर ग्याहरवी तक कुल पांच स्कूलें बदलीं, उसके बाद कॉलेज, सभी में सांस्कृतिक कार्यक्रमों एवं खेल-कूद में प्रतिनिधित्व किया । नवमीं कक्षा के बाद तो पढाई को भी उतना ही महत्वपूर्ण समझा, उससे पहले तो खेल-कूद में इतने व्यस्त रहते थे कि परीक्षा की बस खानापूर्ति भर ही होती थी। पर बहुत कम समय के लिए पढ़ कर भी नंबर ठीक ठाक आ जाते थे तब अदिकतम अंक 60/62 प्रतिशत बना पाते थे बच्चे .. 55 के आस पास मैं भी ले ही आया करती थी ।
 

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- प्रीति अज्ञात
 
रचनाकार परिचय
प्रीति अज्ञात

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हस्ताक्षर (43)कविता-कानन (1)ख़ास-मुलाक़ात (9)मूल्यांकन (2)ग़ज़ल पर बात (1)ख़बरनामा (12)व्यंग्य (1)संदेश-पत्र (1)विशेष (2)'अच्छा' भी होता है! (2)फिल्म समीक्षा (1)