प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अक्टूबर 2015
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कलम की नोंक से ख़तरनाक इरादों को तोड़ने की आस बंधाती एक कविता: के.पी. अनमोल

आज के विषाक्त दौर में हमारे आसपास धर्म/ मज़हब के नाम पर हो रहे ख़ून-ख़राबे ने जहाँ इंसानियत के वजूद पर तलवार लटका रखी है, वहीं धर्मनिरपेक्षता और भाईचारे की उम्मीदों को भी धुँधला कर दिया है। एक ऐसे समय में जहाँ पूरी दुनिया में अपने मज़हब का झंडा लहराने के नाम पर कहीं भी, कभी भी, किसी का भी सर कलम कर दिया जा रहा है, बेगुनाह मासूमों से लेकर बेसहारा अपाहिजों को भी नहीं बख्शा जा रहा है, वहीं अपने धर्म के मूल स्वरूप से ही बेख़बर सिर्फ उसके नाम को अपना हथियार बनाकर कुछ लोग उद्दंड मचाये हुए हैं, इसी समय में कुछ बुद्धिजीवी और कलमकार अपनी कलम की नोंक से इनके ख़तरनाक इरादों को तोड़ने की आस लेकर अपने लेखन धर्म को निभाने में भी जुटे हैं।
ठीक ही तो है, असल में कलम से ज़्यादा असरदार कोई भी हथियार नहीं है। हाँ, ये सच है कि इसका प्रभाव धीमी गति से होता है, लेकिन जब यह अपना असर दिखाती है तो विसंगति को जड़ से उखाड़ भी देती है।

आज रचना-समीक्षा में मैं आपके समक्ष कुछ ऐसा ही उद्देश्य लिए एक कविता पर बात करना चाहूँगा, जो पाठक के सामने एक बहुत बड़ा प्रश्न छोड़ जाती है। 'आज का प्रश्न बड़ा बेचैन है' शीर्षक की इस कविता में रूड़की (उत्तराखण्ड) निवासी युवा कवयित्री अनामिका कनोजिया 'प्रतीक्षा' एक कथा-चित्र के माध्यम से हमारे बीच एक प्रश्न छोड़ती हैं, जो पाठक के मानस-पटल को झकझोर कर रख देता है।
एक युवती जो संकुचित मानसिकता वाले परिवार के बीच पली-पढ़ी है, जिसे धर्म का मतलब बहुत सारी विकृतियों के साथ समझाया गया है। पैदा होते ही जिसे धार्मिकता के नाम पे कट्टरता से परिचित कराया गया है, अन्य धर्म और उसे मानने वाले लोगों से दूर रहना सिखाया गया है। उसे एक भगदड़ में ख़ून से लथपथ होने पर अपने ही सम्प्रदाय के हज़ारों लोगों की उपेक्षा के बीच एक विधर्मी द्वारा बचाया जाता है। इस पर उस युवती के सामने बचपन से थोपी गयी धारणाएँ आकर खड़ी हो जाती हैं और वह निर्णय नहीं कर पाती कि सच क्या है, वह ज़हर जो उसे घुट्टी की तरह पिलाया गया है या वह अनुभव जो उसने अपनी आँखों से देखा है?

कविता के माध्यम से कवियत्री ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि वह शक्ति जो इस सृष्टि का सञ्चालन करती है, जिसे मनुष्य ईश्वर, ख़ुदा, गॉड अथवा अन्य कई नामों से पुकारता है, वह अलग-अलग ना होकर एक ही है और सभी मनुष्य उसके समक्ष बराबर हैं। यह सिर्फ हमारी कल्पनाएँ हैं, जो हमने उसे विभिन्न धर्मों, जातियों और ऐसे ही कई खाँचों में बाँट रखा है।

"पैदा हुई है वो एक हिंदू के घर
तो कैसे कर लेती दोस्ती
किसी मुस्लिम से
बहुत अच्छे से समझा था उसने
मुस्लिम का टच
मतलब धर्म का विनाश"

पंक्तियों के द्वारा कवयित्री ने हमारे समाज में सदियों से पैठी एक भ्रांति को उजागर किया है। किसी अन्य धर्म अथवा जाति के व्यक्ति को छूने मात्र से धर्म का विनाश हो जाता है, इस धारणा से शायद ही कोई अपरिचित होगा।

"धर्म मतलब वो
जो बंद है
घर के कोने में बने उस
छोटे-से मंदिर में"

पंक्तियों के माध्यम से अनामिका जी संकुचित सोच पर व्यंग्यात्मक लहज़े में बहुत गहरा कटाक्ष करती हैं। ऐसी मानसिकता वाले लोगों के लिए उनका ईश्वर/ख़ुदा किसी ख़ास जगह तक ही सीमित होता है। फिर उसके सर्वव्यापी होने का क्या मतलब?

"आज का प्रश्न बड़ा बेचैन है
उसे समझ नहीं आ रहा है कि
उसका धर्म नष्ट हुआ है
या मजबूत
उसे बचाने वाला मुस्लिम, ईश्वर है
या ईश्वर मुस्लिम भी है...?"


एक विधर्मी द्वारा गोद में उठाकर हॉस्पिटल पहुँचाने और अपना जीवन बचाने पर युवती इस पशोपेश में है कि विधर्मी के 'टच' से आज उसका धर्म नष्ट हुआ है या समय पर सहायता मिलने की वजह से धर्म पर विश्वास बढ़ा है! वह समझ नहीं पा रही कि सच क्या है? उसे बचाने वाला वह विधर्मी ही उसका ईश्वर है या ईश्वर उसकी सोच से परे भी है?

एक बेबाक और साहसी अभिव्यक्ति के लिए कवियत्री को साधुवाद।



- के.पी. अनमोल




समीक्ष्य कविता- आज का प्रश्न बड़ा बेचैन है

हो रही थी बड़ी वो
जानने लगी थी धर्म
पूछने लगी थी मज़हब
समझ आने लगा था उसको
हिंदू या मुसलमान होने का मतलब
पैदा हुई है वो एक हिंदू के घर
तो कैसे कर लेती दोस्ती
किसी मुस्लिम से
बहुत अच्छे से समझा था उसने
मुस्लिम का टच
मतलब धर्म का विनाश

धर्म मतलब वो
जो बंद है
घर के कोने में बने उस
छोटे-से मंदिर में

एक रोज़ दादी ने बताया था उसे
कि उसके अंदर
जो मूर्ति है वो करती है
हमारी रक्षा हर मुसीबत से
वो आती है कोई न कोई
रूप धरके बचाने हमें

किंतु आज जब वो
खून से लथपथ पड़ी थी सड़क पे
तब नहीं आये वो रक्षा करने वाले
जिन्हें हर तीज-त्यौहार में
सब से पहले पूजा जाता था
जिनके भोग से पहले
नहीं मिलता था किसी को
पानी भी
जिनके लिए रखे थे उसने
कई व्रत और उपवास

आज उसका जीवन देन है
अब्दुल्ला की
जिसने अपनी सफेद नमाज़ी पोशाक की    
चिंता न करते हुए
बचाई है उसकी जान
दिया है नया जीवन
उठाया है उसे समेटकर दोनों बाहों में
और भागा है लेकर
उसे पैदल ही हॉस्पिटल
बिना किसी एंबुलेंस या टेक्सी का
इंतज़ार किये

शिवरात्रि के मेले में
मची भगदड़ में घायल हुई थी वो
जब नमाज़ को जाते
अब्दुल्ला ने उसे देखा
तो बिना अपने खुदा
और धर्म की परवाह करे
भर लिया है उसे
अंक (गोद) में
भागते हुए हज़ारों हिंदुओं के बीच से
उसके पालनहारी ने
उसे बचाने के लिए
धरा है
एक मुस्लिम का रूप
बड़े असमंजस में है आज
वो
सोच रही है
फिर से
धर्म और भगवान को

नहीं जान पा रही है
कि सच क्या है
आज का प्रश्न बड़ा बेचैन है
उसे समझ नहीं आ रहा है कि
उसका धर्म नष्ट हुआ है
या मजबूत
उसे बचाने वाला मुस्लिम, ईश्वर है
या ईश्वर मुस्लिम भी है...?


- के. पी. अनमोल
 
रचनाकार परिचय
के. पी. अनमोल

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