जनवरी 2020
अंक - 56 | कुल अंक - 56
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ज़रा सोचिए

शिक्षा का मानी ज़िम्मेवारियों से पलायन नहीं
- प्रगति गुप्ता


काफ़ी अरसे बाद आज मिसेज तोमर को अपनी बेटी दिव्या के साथ अपने सेंटर की सीढ़ियों पर जब मैंने चढ़ते देखा तो अनायास ही मन में विचार आया कि इतने समय बाद मिसेस तोमर के आने की क्या वजह हो सकती है क्योंकि कई साल पहले तक उनके आने की एक वजह थी कि उनके ससुर; जिनकी नियमित जाँचें हमारी लैब से ही हुआ करती थी।
तब अक्सर ही दिव्या कभी अकेले तो कभी माँ के साथ तकनीशियन को अपने दादा जी का सैंपल लेने के लिए बुलाने आती थी। घर काफ़ी नज़दीक होने से स्टाफ को भी सैंपल लाने में कोई असुविधा नहीं होती थी और शाम तक परिवार का कोई भी सदस्य आकर दादा जी की रिपोर्ट्स ले जाता था।
यह क्रम क़रीब पाँच से छः वर्ष चला, बाद में सुनने में आया कि दादा जी का देवलोकगमन हो गया है तो इन सबके नियमित रूप से आने-जाने का क्रम टूट गया था।


मिसेज तोमर को जब मैंने रिसेप्शन की बजाय मेरे ही चेंबर की तरफ आते हुए देखा तो मुस्कुराकर उनसे कहा, “कैसी हैं आप मिसेज तोमर? काफ़ी लम्बे समय बाद आपको देख रही हूँ।’’
वास्तविकता तो यह है अगर कोई डॉक्टर अपने क्लिनिक पर किसी मरीज़ से यह पूछे कि आप बहुत दिनों बाद दिखाई दिए तो बहुधा ही इसके मायने ग़लत ही ले लिए जाते हैं कि पता नहीं कैसा डॉक्टर है, जो चाहता है हम बीमार हों और इनके पास दिखाने आएँ।
बस इसी बात को सोचकर मैंने मिसेज तोमर से इतना ही पूछा और उनके उत्तर का इंतज़ार करने लगी।


"कुछ नहीं मैम; इधर से गुज़र रही थी तो सोचा आपसे मिलती चलूँ चूँकि आजकल दिव्या मेरे पास ही थी, सोचा आपसे इसको भी मिलवाती चलूँ।" मिसेज तोमर बोलीं।
"जब आप लोगों का जाँच के लिए सेंटर पर आना होता था, उस समय दिव्या तो इंजिनियरिंग कर चुकी थी और किसी एडवांस कोर्स के लिए हिन्दुस्तान के बाहर जा रही थी न!" मैंने मिसेज तोमर से पूछा।
"हाँ! मैम, इसके कोर्स ख़त्म होने के बाद आज से दो साल पहले इसकी शादी भी बहुत धूमधाम से की हमने पर इसका मन नहीं लगा ससुराल में, तो पिछले एक साल से यह हमारे पास ही है।” मिसेज तोमर यह बोलकर चुप हो गयी।


अब न चाहते हुए भी मैंने दिव्या की ओर देखकर पूछ ही डाला, "क्या हुआ था दिव्या?"
"कुछ नहीं आंटी, बस मुझे अच्छा नहीं लगा वहाँ। वो लोग मेरे लायक नहीं थे।" दिव्या ने जवाब दिया।
"तुम ये कैसे कह सकती हो वो तुम्हारे लायक नहीं थे! यह भी तो हो सकता है कि तुम उनके लायक न हो। मुझे कुछ विस्तार से बताओगी तो शायद मैं समझ पाऊँ तुम्हारी परेशानी को।" कुछ ऐसा बोलकर मैं दिव्या के चेहरे के आते-जाते भावों को पढ़ने की चेष्टा करने लगी। जाने क्यों मुझे लगा उसको मेरी बात परेशान कर गयी।


"क्या हुआ दिव्या?" मैंने पूछा।
"आंटी, मैं इतनी पढ़ी-लिखी लड़की हूँ। मेरा एक अपना आर्थिक सबलता से जुड़ा हुआ स्तर है। क्या ऐसा हो सकता है कि मैं किसी के लायक न होऊं।" कुछ ऐसा बोलकर दिव्या चुपचाप मेरे मुँह को ताकने लगी।
"बेटा! तुम शायद मेरी यह बात इस तरह नहीं समझ पाओ। तसल्ली से बैठकर मुझे एक-एक कर जब सारी बातें विस्तृत बताओगी, तब मैं तुमको बताऊँगी मेरे कहने का क्या तात्पर्य था।" मैंने दिव्या को कहा।
"आंटी! विनय से शादी के बाद कुछ समय तक तो सब बहुत अच्छा चला। हम लोग खूब घूमते-फिरते, खाते-पीते बहुत अच्छा समय था हमारा। पर कुछ समय बाद ही छोटी-छोटी बातों पर हमारा कलह होना शुरू हुआ। जैसे कि ऑफिस जाने से पहले कौन किस काम को करेगा, घर खर्च में कौन पैसे देगा और भी बहुत कुछ। अब आप ही बताओ आंटी, मैं इतना कमाती हूँ क्या मैं घर के वह काम भी करुँगी, जो एक बाई भी कर सकती है।
आंटी मैंने कभी अपने घर पर ही ऐसे कोई काम नहीं किये क्योंकि मम्मी के यहाँ पूरे दिन के नौकर थे। मुझे तो रसोई से जुड़े काम करने ही नहीं आते और फिर मैं क्यों सीखूं यह सब जबकि मेरा सैलरी पैकज विनय से कम तो नहीं।” यह सब बोलकर दिव्या चुप हो गयी।


अब सबसे पहले तो मैंने मिसेज तोमर की तरफ देखा क्योंकि मैं उनकी प्रतिक्रिया से भी अवगत होना चाहती थी। उनकी आँखों में उतर आई नमी मुझसे छिपी न रह सकी चूँकि मैं चाहती थी वो कुछ बोले पर उन्होंने न बोलकर भी शायद बहुत कुछ कह दिया।
शायद मिसेज तोमर अपनी वयस्क लड़की के सामने उसकी ग़लतियों को या कहाँ वो क्या–क्या ग़लत सोच और कर रही हैं, उसको नहीं बोलना चाहती थीं ताकि उनको किसी भी तरह की विपरीत स्थिति का सामना न करना पड़े।


बहुधा जब बच्चे आत्मनिर्भर हो जाते हैं तो उनको माँ-बाप की बातें समझ नहीं आती हैं। उनका यूँ अचानक आज दिव्या को मेरे पास लाना और उसकी समस्या को बताकर चुपचाप सुनना बहुत कुछ कह रहा था।
मैंने दिव्या के सामने तो उनको सिर्फ यही कहा मिसेज तोमर आप मेरे से मिलने आती रहा कीजिये, आपसे मिलकर अच्छा लगता है। फिर मैंने अपनी बात दिव्या से कहना शुरू किया।
"दिव्या! मैं बेहद ख़ुश हूँ बेटा कि तुम पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर हो और मैं चाहती हूँ कि तुम दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की करो। पर तुम्हारी कुछ बातें मुझे समझ नहीं आ रही, जिनको मैं बताना और तुमको जानना चाहूंगी। तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई का सबसे ज्यादा किसको फायदा है? क्या सिर्फ़ पढ़ाई-लिखाई से परिवार की ज़रूरतें पूरी हो जाती हैं? तुम अपनी सैलरी से बाई तो लगा सकती हो पर खाना बनाने और खिलाने में बाई के भाव तुम्हारे अपने भावों और अपनों के प्रति भावों से मेल खायेंगे?
क्या हम सभी स्त्री हों या पुरुष; रसोई जैसी महत्वपूर्ण जगह पर बगैर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवाए, सभी कुछ नौकर और बाइयों पर छोड़ सकते हैं या जो हमारा मेहनत का रुपया है, उसको आँख बंद करके उन लोगों पर लुटा सकते हैं, जिनकी मदद सिर्फ रुपयों से जुड़ी है। मैं यह नहीं कहती तुम सारा समय रसोई को दो पर आज के समय में स्त्री हो या पुरुष दोनों को ही किसी भी फ्रंट पर काम करने की आदत होनी चाहिए क्योंकि आपका कमाया हुआ आपके अकाउंट को तो भर सकता है पर परिवार को आपकी और आपके भावों की ज़रूरत होती है।
अब आती है बात कि स्त्री या पुरुष में जो ज्यादा फ्री होता, वही सब मैनेजमेंट देखता है या अपनी-अपनी काबिलियत के हिसाब से परिवार को चलाया जाता है पर हाँ, स्त्री हो या पुरुष; अगर कोई अपने कमाए हुए को अपने अहम् का हिस्सा बनाकर यह सोचे कि अगर हम कमा रहे हैं तो और कोई भी जिम्मेवारी हमारी नहीं तो इस बात को सही नहीं माना जा सकता।


दिव्या आपके माँ-पापा ने आपको आत्मनिर्भर बनने के लिए ही उच्च शिक्षा की व्यवस्था की पर अगर आज तुम उनसे पूछोगी तो वे भी यही कहेंगे कि अपने घर परिवार को संभालना तुम्हारी प्राथमिक जिम्मेवारी है। दिव्या हम कितने भी शिक्षित हो जाएँ कितना भी कमाएँ हम सभी को बहुत कुछ संभालना होता है बेटा। मैं चूँकि आपके पति विनय से नहीं मिली हूँ पर उसको भी यही कहना चाहूँगी, आप दोनों की शिक्षा सिर्फ़ रुपया पैसा कमाने से ही नहीं जुड़ी है बल्कि पढ़ाई-लिखाई व्यक्ति को सूझ-बूझ से सब निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करती है। बस सोचने के तरीके बदलने होते हैं। बहुत छोटी-छोटी बातें हैं।

अगर माँ-पापा के यहाँ आपने कुछ नहीं किया तो उसकी वजह थी आपका पढ़ना। पर अगर आपने उस समय भी काम करना सीखा होता तो रसोई भी बोझ नहीं लगती बेटा। सोच कर देखो।
शिक्षा का मानी ज़िम्मेवारियों से पलायन नहीं है बेटा! विनय हो या तुम भावों से जीओ और भावों के लिए। विनय हो या तुम अहम् को एक तरफ रखकर सोचना शुरू करो। सब बहुत सुन्दर दिखेगा। आज समर्थ आप दोनों ही हैं, पढाई को अहम् का हिस्सा बनाकर नहीं बल्कि समझदारी का हिस्सा बनाकर निर्णय लो। अबकि बार जब विनय से मिलना हो, उसको भी मेरे पास लाना। मिलना चाहूँगी उससे। बहुत देर से मेरी बातें सुनते-सुनते दिव्या सुबकते हुए बोली, "आंटी मम्मी भी यही कहती हैं पर क्या मैं ही ग़लत हूँ?”


नहीं, तुम ही ग़लत हो यह कब कहा बेटा मैंने! पर सोचना शुरू करो बेटा। कलह से एक समझदार व्यक्ति ही आसानी से निकल सकता है और समझदारी के लिए सिर्फ पढ़ाई-लिखाई ही ज़रूरी नहीं होती। जो भी निर्णय लो; कुछ समय के लिए यह भूल जाओ कि तुम बहुत रुपया कमा रही हो बल्कि यह सोचो कि एक अच्छी ज़िन्दगी प्रेम के साथ कैसे चलाई जा सकती है क्योंकि प्रेम के लिए भावों से जुड़ने की ज़रूरत होती है।"
"हाँ आंटी! मैं समझ रही हूँ कोशिश करुँगी सब अच्छा हो जाये मुझे आपकी जब भी ज़रूरत हुई आप मदद करेंगी न!"
"हाँ, बेटा ज़रूर। तुम ख़ुश रहोगी मेरे लिए यही बहुत आनंद से जुड़ी बात है बेटा।”


अपनी बात ख़त्म कर मैंने मिसेज तोमर की तरफ देखा, जिनके मौन में मुझे धन्यवाद नज़र आ रहा था। कई बार माँ-बाप का समझाया हुआ बच्चे ग़लत तरीके से लेते हैं और इसी वजह से माँ-बाप बच्चे को समझाने में असमर्थ रहते हैं। बच्चों को लगता है माँ-बाप उनको समझना ही नहीं चाहते।
दोनों के जाने के बाद बहुत देर तक मैं यह सोचती रही कि माँ-बाप बच्चों को एजुकेशन उनको समर्थ बनाने के लिए देते हैं और वो कभी नहीं चाहते कि बच्चे बाक़ी बातों को उपेक्षा करें। जिनकी वजह से समस्याएँ आती हैं। लड़का हो या लड़की उसके लिए कोई भी काम हेय नहीं होना चाहिए। मिलजुल कर ही हर बात के समाधान निकलते हैं। अगर शिक्षा समझदारी न दे तो व्यर्थ है, सोच कर देखिये ज़रूर।


- प्रगति गुप्ता