जनवरी 2020
अंक - 56 | कुल अंक - 57
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

क़हर और ज़हर

क्या तुम जानते हो
क़हर क्या होता है?
चलिए, छोड़िए
यही बता दीजिए
कि ज़हर क्या होता है?

यदि क़हर की बात पर
तुम्हारे ज़ेहन में आ रहा है भूकम्प,
बाढ़, सुनामी या बवण्डर का कोई दृश्य
तो यकीनन ज़हर के ज़िक्र पर
दिल में आ रहा होगा
रसायनों की शीशियाँ,
फिनायल की बोतल और
सल्फास की गोलियों जैसा ही कुछ
पर यह आधा ही सच है
क़हर और ज़हर के बारे में।

अपनी बात कहते हुए कविता में
यदि तुम्हे मैं मुस्कुराने या सोचने को
मजबूर नहीं कर पा रहा
और मेरी बात तुम्हारे कानों से होकर
नहीं जा पा रही तुम्हारे दिलों तक
तो यह कविता ज़हर है मेरे लिए
और मुझे ऐसे ज़हर के क़हर से बचना चाहिए।


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तुम नाराज़ मत होना मेरी दोस्त

तुम नाराज़ मत होना मेरी दोस्त!
तुम नाराज़ मत होना
कि आजकल मैं तुमसे ज़्यादा
आधी रात को उस समय को सोचता हूँ
जिसमें रोटी की कीमत से पेट का भविष्य तय होता था
तुम सुनकर सिहर मत जाना
कि अब पेट की कीमत से रोटी का भविष्य तय होता है।

तुम नाराज़ मत होना मेरी दोस्त!
तुम नाराज़ मत होना
कि आजकल मैं तुम्हारी आँखों से ज़्यादा
देश-दुनिया की ख़बरों पर नज़र गाड़े रखता हूँ
तुम नहीं जानती, दुनिया ईमान की बातें करते-करते
हमारी बेख़ुदी की छोटी-सी घड़ी में
हमारे वजूद पर तोहमत लगाने में ज़रा भी देर नहीं करती।

तुम नाराज़ मत होना मेरी दोस्त!
तुम नाराज़ मत होना
कि आजकल मेरी कविताओं में
तुम्हारी साफ़गोई के किस्सों की जगह
किसी बनिये-सा हिसाब-किताब लिखती ज़िन्दगी होती है
जिस दिन तुम्हें बड़ी रोशनियों के छलावों का इल्म होगा
तुम समझ जाओगी कि
सफ़ेद कागज़ों पर स्याही गिराना ज़रूरी क्यों होता है।

तुम नाराज़ मत होना मेरी दोस्त!
तुम नाराज़ मत होना
कि आजकल मैं ज़िरह की कलाई थामकर
तुम्हें बहस के दौर तक ले आता हूँ
जबकि सच यही है कि कुर्सियों को भी
लाशों पर टिकी हुई तशरीफ़
और झूठ का सहारा ली हुई पीठ की आदत पड़ गयी है
देखना! एक दिन तुम भी रोजनामचे में
साँसों को ग़लतियों की तरह दर्ज़ करने लगोगे।

तुम नाराज़ मत होना मेरी दोस्त!
तुम नाराज़ मत होना
कि आजकल मैं तुम्हारी चिबुक पर
चुम्बन धरने के खूबसूरत वक़्त में
किसान के धान का अनुमान लगाता हूँ
पर तुम्हारा ये जानना ज़रूरी है कि
एक भूखा चाँद को रोटी की तरह तकता है
और चाँद भूखे को राहु समझ छिपता है।

तुम नाराज़ मत होना मेरी दोस्त!
तुम नाराज़ मत होना
कि आजकल मैं तुम्हारे चेहरे की चहक देख
फ़रिश्तों की मुरव्वत का अफसाना नहीं लिखता
पर ये सब सिर्फ़ इसलिए है
ताकि बदतर होते समय की छाती पर
मुस्तकबिल के सुनहरे हस्ताक्षर लिये जा सकें।


- राहुल कुमार बोयल

रचनाकार परिचय
राहुल कुमार बोयल

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