जनवरी 2020
अंक - 56 | कुल अंक - 57
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जो दिल कहे
कैलेंडर नहीं, जीवन भी बदलें।
 
हर वर्ष हम नव वर्ष की शुरुआत दूसरों को खुशी और समृद्धि की शुभकामनाएं देकर करते हैं। समृद्धि का सही लक्षण क्या है? समृद्धि का लक्षण मुस्कराहट है। समृद्धि का लक्षण संतोष है। समृद्धि कवन है मुक्ति, मुस्कान और जो कुछ भी अपने पास है, उसे निर्भय होकर आस-पास के लेगों के साथ बांटने की मनस्थिति। समृद्धि का लक्षण यह आस्था और आत्मविश्वास है कि जो कुछ भी मेरी आवश्यकता है, वह मुझे मिल जाएगा।
 
2020 का स्वागत एक वास्तविक मुस्कराहट के साथ करें, एक ऐसी मुस्कराहट जो भीतर से हो। कैलेंडर के पन्ने पलटने के साथ-साथ हम अपने मन के पन्नों को भी पलटते जाएं। प्रायः हमारी डायरी स्मृतियों से भरी हुई होती है। ध्यान दें कि पकी आने वाली तारीखें, बीती हुई घटनाओं से, बीते हुए समय से ‘कुछ सीखें, कुछ भूले और आगे बढ़े’।
नया साल कुछ सार्थक की तलाश का अवसर है। जीवन की सार्थकता समय रहते संभल जाने और जीवन के रहस्यों को समझने में है। गौर करें कि हमारे जीवन मे क्या-क्या है, जिसे सार्थक कह सकते हैं।
 
आदमी अपने अस्तित्व में आने के बाद से ही नयेपन के प्रति कौतूहल का भाव लिए रहा है। नया जॉब, नये कपड़े, नयी संपत्ति, नये संबंध आदि हमारी ऊर्जा एकदम से बढ़ा देते हैं। ऐसे ही, नये साल के आगमन की प्रतीक्षा हमारे भीतर एक तरह को ऊष्मा भर देती है। दिन कोई भी पुराना नहीं है। यदि हमारे पास अपने समय को पहचानने, उसे ठीक से देख सत्यने की दृष्टि हो, तो हमारा रोजमर्रा का जीवन सी उत्सव-सा हो सकता है। आइए, विचार करें कि शरीर, मन, हृदय और आत्मा के जिन चार स्तरों पर हमारा अस्तित्व है, नया साल किस तरह इनके लिए एक अनूठा अवसर हो सकता है।
 
यह शरीर है, तभी मन, हृदय या आत्मा का भी कोई अनुभव है। अगर हम अपनी दिनचर्या पर नजर डाले तो पाएंगे कि हमारा अब तक का जीवन इस शरीर के प्रति अज्ञानता में, मुर्छा में बीता है। शरीर की ओर हमारा ध्यान ही तब जाता है, जब हम बीमार पड़ते हैं। ध्यान रहे, कोई किसी से कितना ही प्रेम करता हो, लेकिन यदि असाध्य रोगों से लंबे समय तक घिरे रहे, तो धीरे-धीरे लोग विमुख होते जाएंगे। जीवन अनमोल है, बशर्ते आप स्वस्थ हों। इसलिए, विचार करें कि क्या इस वर्ष हमारा स्वास्थ्य अच्छा रहा है? क्या हमने स्वयं के बीमार पड़ने के कारणों पर गौर किया है?  नया साल इसके प्रति सजग रहने और अपने को ऊर्जावान बनाए रखने के संकल्प लेने का अवसर है। योग या प्राकृतिक चिकित्सा आदि के बारे में हम जो जानकारी जुटाते है या अपने परिचितों को गाहे-बगाहे जो ज्ञान देते हैं, उस पर स्वयं भी अमल करें। हम स्वस्थ रहेंगे, तभी हमारी सलाह को कोई गंभीरता से लेगा।
 
जीवन में जो भी परेशानियां हैं, वे सब प्रायः मन की ही हैं। हर कोई चाहता है कि दुनिया उसी के मुताबिक चले। यह संभव नहीं। नया साल मतभिन्नता के प्रति सम्मान का भाव रखने का एक अवसर है। महात्मा बुद्ध ने जो अष्टांगिक मार्ग दिया है, उसमें से अगर किसी एक हो ही चुनने का विकल्प हो, तो सम्यक् स्वीकार को ही चुना जा सकता है। हमारी मौलिकता क्या है और उसे बचाए रखने के लिए क्या हमने इस वर्ष कोई प्रयत्न किया है या अगले वर्ष ऐसी कोई योजना है? थोड़ा समय चिंतन-मनन के लिए रखें। इससे हमारा मन पुराना होने से बचेगा, और तब हमारा होना समाज के लिए भी सार्थक होगा। जिसका मन नया है, उसके लिए हर क्षण एक तरह का नयापन, एक उत्सुकता लिए होता है और वह रोजमर्रा की अपनी जिंदगी से ऊबता नहीं है। इससे पुरानी बातों को भूलना आसान होता है और हम दुखी होने से बचते हैं और स्वयं को कुछ पल के लिए भूलने के लिए किसी दूसरी दुनिया में जाने की जरूरत नहीं रह जाती।
 
हृदय का संबंध भावनाओं, आशाओं और कल्पनाओं से है। जिसका हृदय विकसित हो जाए, उसके लिए मन सेकेंडरी हो जाता है, क्योंकि विचार की तुलना में भाव अधिक गहरी बात है। सारे गहरे संबंध हृदय से जुड़े होते हैं और संबंधों का जो भी बिखराव है, वह हृदय की उपेक्षा के कारण ही है। हृदय का भोजन है- सत्यवादिता। गौर करें कि आप इस वर्ष कितने मौकों पर झूठ बोले? किसी ने न पकड़ा हो, तो भी आप खुद तो जानते ही हैं। झूठ की लत व्यक्ति को हृदयरोगी बना देती है। इसलिए, ऐसे काम से बचें। स्वस्थ हृदय ही सद्भावना से भर सकता है। सदभावना अगर स्वयं से ऊपर उठे, तो पुरे विश्व का कल्याण कर सकती है। विचारें कि क्या हम सोच के स्तर पर अपने परिवार से ऊपर उठ पाए हैं? क्या एक सभ्य नागरिक के तौर पर नये साल में समाज और देश के लिए कोई योगदान करने का भाव हमारे भीतर है? गौर करें कि पिछले वर्ष की शुरुआत हमने जिस जोश के साथ की थी, वर्ष का अंत आते-आते आखिर वह क्यों ठंडा पड़ गया? वे कौन-सी घटनाएं रहीं जिनसे जीवन का रोमांच जाता रहा? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम ही पुराने पड़ गए हों और आपके भीतर ही बदलाव की जरूरत हो? 
 
आत्मा का भोजन है प्रेम। और प्रेम कोई मांगने की चीज नहीं है। हम दाता बनें। कार्यस्थल पर हम अपने साथियों के साथ जोक साझा करते हैं, यहां तक कि अनजान लोगों के साथ भी बात करते समय हम सहज रहते हैं। लेकिन घर आते ही हमारा चेहरा लटक जाता है। वहां हम पहल नहीं करना चाहते, बल्कि दूसरों की पहल का इंतजार करते हैं। जैसे आप अप्रिय प्रसंगों को भूलना चाहते हैं, वैसे ही घरवाले भी उससे आगे बढ़ना चाहते हैं। पहल करने की आदत डालें। समीक्षा करें कि इस वर्ष आपके संबंधों की स्थिति क्या रही। इसलिए, हम संबंधों को समय दें। जैसे नये वर्ष के आसपास प्रकृति की उष्णता बढ़ने लगती है, ऐसे ही, नया वर्ष सभी संबंधियो-परिचितो से संवाद बढ़ाने का, संबंधों में गर्मजोशी भरने का जो अप्रिय बीता, उसे भूले और आगे की सुधि लें।
 
अपनी आंखें खोलें और देखें कि हमें कितना कुछ मिल हुआ है। इस नववर्ष पर यह ध्यान दें कि हमें क्या मिला है, इस पर नहीं कि हमें क्या नहीं मिल। यह कृतज्ञता लाता है। हम जितने कृतज्ञ होंगे, उतना अधिक हमे मिलेगा। इसके विपरीत हम जितनी शिकायत करेंगे, उतना ही हमसे ले लिय जाएगा। यीशु मसीह ने कहा था-  ‘जिसके पास है उनको और अधिक मिलेगा और जिसके पास नहीं है उनके पास जो भी है वह उनसे ले लिया जाएगा' इसका यही अर्थ है।
 
हस्ताक्षर वेब पत्रिका के संपादक मंडल, समस्त साहित्य शिल्पी एवं वेब पत्रिका के समस्त सुधिपाठकों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें......... 
 

- नीरज कृष्ण

रचनाकार परिचय
नीरज कृष्ण

पत्रिका में आपका योगदान . . .
विमर्श (12)जो दिल कहे (33)धरोहर (22)